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शनिवार, अगस्त 25

सपनीला मन


सपनीला मन


शब्दों का एक जखीरा
बहा चला आता है
जाने कहाँ से...
शब्द जो ठोस नहीं हैं
कितने वायवीय पर कितने शक्तिशाली
देह दिखती है
मन नहीं दिखता
विचार जो नहीं दिखता आज
कल देह धरेगा
सूक्ष्म से स्थूल की यात्रा चलती रहेगी...
देह के बिना भी हम हैं
शब्द क्या ये नहीं बताते
शब्द.. जो एक ऊर्जा हैं
जिन्हें आकार हम देते हैं...
अव्यक्त को व्यक्त करते आये हैं हम युगों से
अब वापस लौटना है
स्थूल से सूक्ष्म की ओर....
हम देह की तरह रहते हैं
और मन..
 अनजाना ही बना रहता है जीवन भर
खुद की पहचान किये बिना
गुजर जाती है उमर
देह से जुड़ी है हर बात
सुबह से शाम तक
मन नींद में मुखर हो जाता है
सपनों में घटता है आधा जीवन
जिसे सपना ही तो है.. कहकर
भुला देते हैं हम !