शब्द लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
शब्द लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, अक्टूबर 6

चक्र से बाहर

चक्र से बाहर 


आने दो यादों के बादल 

छाने दो भावों के बादल, 

वर्तमान का नभ अनंत है 

तिरने दो शब्दों के बादल !


उड़ें हवा संग, हों काफ़ूर 

बहकर यहाँ से जायें दूर, 

नीला गगन स्वच्छ निर्मल पर 

सदा अचल, रहे अडिग हुज़ूर !


तुम भी तो कुछ उसके जैसे 

कहाँ ख़त्म होती है सीमा, 

हर पल नया रूप धर आये 

दिखे न परिवर्तन, हो धीमा !


माना जाह्नवी अति पुरातन 

जल इस क्षण में नया आ रहा, 

एक चक्र में घूमती सृष्टि 

हो जो बाहर, वही देखता !


शनिवार, अगस्त 9

चलते जाना ही है मंज़िल

चलते जाना ही है मंज़िल 


भेद-भाव सारे ऊपर हैं 

नीचे सम-रसता की धारा, 

जाति, धर्म ओढ़े ऊपर से 

नहीं बनें वे दुर्गम कारा !


कलम हाथ में अगर न थामी 

शब्दों को दे कौन सहारा, 

यादों की कंदील जल रही 

पथ पर करती सहज उजारा ! 


चलते जाना ही है मंज़िल 

दूर कहाँ है? निकट किनारा 

दिल की दिल में ही रह जाती  

देखो किसी ने पुन: पुकारा !


बटन दबाते आती बिजली 

जगमग जैसे घर हो सारा, 

याद ह्रदय में पावन जिसने 

दिपदिप मन का आँगन बारा ! 


सोमवार, जून 30

नीलगगन सा जो असीम है

नीलगगन सा जो असीम है


शब्दों से आहत होता मन 

शब्दों की सीमा कब जाने,

शब्द जहाँ तक जा सकते हैं 

मात्र वही स्वयं को जाने ! 


नीलगगन सा जो असीम है 

अंतर का आकाश न देखा, 

दिल को रोका चट्टानों से 

खिंच गयी जिन पर दुख रेखा ! 


एक ऊर्जा हैं अनाम सभी

क्योंकर इतना मोह नाम से, 

नाम-रूप बस छायायें हैं 

बिछड़ गयीं जो परम धाम से !


वैखरी, मध्यमा, पश्यंती  

के पार परावाणी बसती, 

माँ शारदा नित्य महिमा में 

वीणा हाथ में ले  विहँसती ! 


गुरुवार, मई 1

मिलन

मिलन 


जो ख़ुशबू बन साथ चला है 

उस से ही हर ख़्वाब पला है 


जीवन का जो सार दे रहा 

वही मधुर आधार दे रहा 


सीधा-सच्चा जिसका पथ है 

मिट जाती हर इक आपद है 


सारे शब्द दूर जा बैठे 

सुरति जहाँ दिल में आ पैठे 


गुंजन कोई गूँज रही है 

शुभ प्रकाश की नदी बही है 


 यामा-दिवस भेद मिटता है 

चारों याम मिलन घटता है 


मंगलवार, अप्रैल 15

खो गये वे शब्द सारे

खो गये वे शब्द सारे 


खो गये वे शब्द सारे 


नाव हम जिनकी बनाकर 

पहुँच जाते थे किनारे !


अब यहाँ लहरें व हम हैं 

डूबने में कहाँ  ग़म है, 

छू लिया जिसने तली को 

संस्तर हो गये बेगाने !


खो गये वह शब्द सारे 


नीड़ जिनसे हम बनाकर 

श्रम मिटाकर शरण धारे !


अब यहाँ विस्तृत गगन है 

उड़ें जिसमें यह लगन है, 

पा लिया जिसने फ़लक को 

नीड़ हो गये बेगाने !


खो गये वे शब्द सारे 


ढाल जिनकी हम बनाकर 

झेलते थे दंश सारे ! 


अब यहाँ केवल ख़ुशी है 

महकती सी ज़िंदगी है, 

पा लिया है तोष जिसने 

युद्ध हो गये बेगाने !


मंगलवार, मार्च 18

भेद न उसका जाना जाता

भेद न उसका जाना जाता
लगता है ख़ुद नाच रहे हैं 
पर सब यहाँ नचाये जाते, 
भ्रम ही है  सब बोल रहे हैं 
कोई बुलवाता भीतर से !
 
शब्द निकलते अनचाहे ही
अनजाने ही भाव उमड़ते, 
 कोई और जगाने वाला
कर्म यहाँ करवाये जाते !

जब तक कोई हो न बाँसुरी 
तब तक काटा-छीला जाता, 
 जब तक शून्य नहीं हो जाता 
तब तक मनस तराशा जाता !

कर्म कहें या दैव उसे हम 
उसके हाथों की कठपुतली, 
कुछ भी नहीं नियंत्रण में है 
  चालबाज़ियाँ सभी व्यर्थ ही !

 पल में हुआ धूल धुसरित वह 
अभी गगन पर जिसे बिठाया, 
ज्ञानी-ध्यानी माना मन को
अज्ञानी सा कभी दिखाया !
 
मेधा कितना ज़ोर लगाये 
भेद न उसका जाना जाता, 
‘मैं’ को तजे बिना जीवन में 
सच का सान्निध्य नहीं  मिलता !


बुधवार, मई 15

उस सन्नाटे के पीछे तब

उस सन्नाटे के पीछे तब


जहाँ शब्द साथ न देते हों 

जब सूना-सूना अंबर हो, 

घन का कतरा भी नहीं एक   

जो ढक लेता है सूरज को !


उस ख़ालीपन को जो भर दें  

भावों का भी अभाव लगता, 

उस सन्नाटे के पीछे तब

जाकर उस अनाम से मिलना !


पीता कोई भर-भर प्याला

जीवन की मदिरा है बँटती,

खड़ा उजाला चंद कदम पर

हो रात अँधेरी कितनी भी !


गुरुवार, जुलाई 6

अव्यक्त

अव्यक्त 

कविता फूटती है 

मन की भाव धरा पर 

सिंचित होती है जब वह 

प्रेम बुंदकियों से 

प्रेम  ! जो फैला है 

कण-कण में परमात्मा की तरह 

पर मिलता नहीं 

तपे बिना 

गहन अभीप्सा की अग्नि में !

कविता भाषा नहीं है  

भाषा की आत्मा है 

जो छुपी रहती है 

अलंकारों और उपमाओं के आवरण में 

एक सूक्ष्म भाव है यह 

जो छू जाता है 

अंतस् को 

ऊष्मा ले जहाँ से 

वाष्पित होता हुआ 

उमड़ आता है

 नि:श्वास  बनकर

और कभी-कभी 

आकार ले लेता है शब्दों का 

वरना तो 

उड़ जाता है आकाश में

अव्यक्त ही !  


शनिवार, अप्रैल 15

एक सच


सच 


छिपा होता है 

सच स्वप्नों में भी 

और  दिखाई दे जाता है झूठ

हक़ीक़त में कभी 

  कितना सच है स्वप्न मृत्यु का

क्योंकि अवश्यंभावी है वह 

और स्वप्न जान पड़ता है 

उसके बाद का जीवन !



एक 


दो मन एक सा सोचते हैं 

दुनिया के दो हिस्सों में 

क्योंकि आये हैं 

एक ही स्रोत से 

एक है उनका उद्देश्य 

 निर्धारित किया है

 जो नियति ने

 एक से शब्द निकलते हैं 

मिलने पर मुख से मित्रों के कभी-कभी 

क्योंकि एक है वाणी का स्रोत भीतर 

हर शै एक ही ओर इशारा करती है 

ख़ुशी का स्वाद एक है 

जिसे लोग चखना चाहते हैं !


शुक्रवार, फ़रवरी 10

चुनाव

चुनाव 


शब्दों का एक जखीरा है वहाँ

हाँ , देखा है मैंने 

 ध्वनि एक,  जिससे उपजे शब्द अनेक 

एक  शै के भिन्न-भिन्न नाम 

उनमें से कुछ चुन लिए मैंने 

प्रेम, विश्वास और हंसी 

करते हुए शब्द ब्रह्म को प्रणाम 

शायद अनजाने में ही 

तुमने चुने होंगे 

युद्ध, सन्देह और पीड़ा 

तभी पनपी हैं दुःख की बेलें 

तुम्हारे आंगन में 

और यहाँ सुरभित फूलों की लताएँ !

सुवास से भरा है प्रांगण  

आँगन ही नहीं 

गली तक फैली है ख़ुशबू 

ऐसे ही कुछ देश चुन लेते हैं 

अपने लिए विकास और विश्वास 

और कुछ जाने किस भय में 

जिए जाते हैं खोकर हर आस ! 


शुक्रवार, दिसंबर 30

नए तराने गाएँ मिलकर

नए तराने गाएँ मिलकर 


नए वर्ष में आओ ! साथी  

 नए-नए हो जाएँ खिलकर,

नया सृजन हो, नए गीत कुछ 

नए तराने गाएँ मिलकर  !


नए विचारों से महकाएँ, 

आंगन अपने बासी  मन का

नए भाव  से भरें हृदय को, 

दामन ख़ुशियों से  जीवन का !


नई सोच हो, हृदय  मुक्त हो,

 सभी पूर्वाग्रह से अब तो,

नई कोंपलें फूटें उर में, 

नए रास्ते खोजें अब तो !


नए शब्द हों, नए इरादे,

 नया-नया हो क्रम जीवन का,

नई पुलक हो, नव उमंग हो, 

नया राग हो नादाँ मन का !


नए साल में, नए ताल में,

 नया-नया सुर वादन छेड़ें,

नई थाप हो, नई धुनें हों, 

नूतन अंतर प्रीत उलेड़ें !


अब तक सच माना था जिसको,

 परखें उस अपने जीवन को,

जो असत्य हो, झट से तज दें, 

झिझके नहीं हृदय  पल भर को !


गुरुवार, मई 19

मन की मछरिया

 मन की मछरिया 

शब्दों के जाल में 

मन की मछली अक्सर फंस जाती है 

स्रोत से दूर होकर व्यर्थ ही छटपटाती है 

जल से बनी है वह भूल ही जाती है 

चाहे तो पल भर में छिद्रों से निकल जाए 

जाल कोई पल भर भी 

बांध नहीं उसे पाए 

पर रूप धरा झूठा ही 

मोह, माया, मान का 

जाने किस बात की मिथ्या 

आन बान का 

टूटता नहीं भरम इसके अभिमान और गुमान का 

शायद शब्दों का जाल भी स्वयं ही सजाती है

क़ैद किया स्वयं को फिर कसमसाती है 

पल भर भी शांत हो 

पिघल पिघल जाएगी 

जल में विलीन हो जल ही हो जाएगी 

ख़ाली और रिक्त है 

पर रूप नए बनाती  है 

शब्दों के जाल में 

मन की मछरिया !