शनिवार, जनवरी 31

कोई

 

कोई 
एक नीड़ है जग यह सारा
कोई समेटे है अपने पंखों की आंच में
और पोषता है जीवन को अहर्निश
चेतना की अखंड धार से
कोई रखे है आँख अपनी सन्तान पर
उड़ने का देता है हर अवसर
देखता रहता है हर छलांग आह्लाद से
प्रसन्न होता, जब भर जाता है आसमान गुंजार से !

10 टिप्‍पणियां:

  1. पंखों में समेटे जग ... परिंदे के लिए तो यही जग है ...

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  2. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर रविवार 01 फ़रवरी 2026 को लिंक की गयी है....

    http://halchalwith5links.blogspot.in
    पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!

    !

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  3. नीड़ है जग ! सच में सिमटे हैं हम सभी उसके पंखों में...
    बहुत ही सुन्दर...
    लाजवाब ।

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