रविवार, मार्च 29

जाने कब फिर मिलना हो

जाने कब फिर मिलना हो

 

कुछ तुम कह दो, कुछ हम सुन लें

कलियों का कब तक खिलना हो

जाने कब फिर मिलना हो !

 

चंद श्वास लेकर आये थे

कुछ ही शेष रही हैं जिनमें,

कहीं अधूरा न रह जाये

किस्सा, हम तुम मिले थे जिसमें !

 

तुम झाँकों मेरे नयनों में

फुरसत ऐसी कल ना हो,  

जाने कब फिर मिलना हो !

 

कितने संगी चले जा चुके

अभिनय करते थके थे शायद,

मंच कभी खाली न हुआ यह

स्मृतियाँ भी खो जाती अक्सर !

 

पलकों को न बंद करो तुम

जाने किस पल चलना हो

 जाने कब फिर मिलना हो !

 

जितना साथ मिला सुंदर था

इक-दूजे में झलक भी पायी,

स्वप्नों में वह छिपी न रहती

जग कहता है जिसे खुदाई !

 

हाथ थाम लो पल भर को तुम

अधरों का कब सिलना हो

जाने  कब फिर मिलना हो !

 

 

2 टिप्‍पणियां: