मंगलवार, अप्रैल 7

माना अभी दूर जाना है

माना अभी दूर जाना है


कितनी पूनम जागेंगे हम

कितने सूरज और देखने, 

 छुपा गर्भ में यह भावी के

किंतु सजा सकते हैं सपने !


वर्तमान की कोख से उपज 

कल का वृक्ष अभी नव अंकुर, 

धूप प्रीत की, जल करुणा का 

सहलायेगा संबल देकर !


माना अभी दूर जाना है 

मानव को विकास के क्रम में, 

पल भर भी अब व्यर्थ न जाये 

 लौटे न पीछे किसी भ्रम में !


 द्वार ज्ञान के खुले हुए जब 

क्यों न दौड़ कर कदम बढ़ायें, 

अंधकार में जग यह खोया

दीप जागरण का ले आयें !

 

8 टिप्‍पणियां:


  1. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" बुधवार 8 अप्रैल 2026 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  2. बहुत बहुत आभार पम्मी जी!

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