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मंगलवार, अप्रैल 7

माना अभी दूर जाना है

माना अभी दूर जाना है


कितनी पूनम जागेंगे हम

कितने सूरज और देखने, 

 छुपा गर्भ में यह भावी के

किंतु सजा सकते हैं सपने !


वर्तमान की कोख से उपज 

कल का वृक्ष अभी नव अंकुर, 

धूप प्रीत की, जल करुणा का 

सहलायेगा संबल देकर !


माना अभी दूर जाना है 

मानव को विकास के क्रम में, 

पल भर भी अब व्यर्थ न जाये 

 लौटे न पीछे किसी भ्रम में !


 द्वार ज्ञान के खुले हुए जब 

क्यों न दौड़ कर कदम बढ़ायें, 

अंधकार में जग यह खोया

दीप जागरण का ले आयें !

 

रविवार, अक्टूबर 15

माँ प्राण का आधार भी है


माँ प्राण का आधार भी है 

 

जो थामती है हर विपद में 

 दे ज्ञान दीपक पथ दिखाती,

माँ प्राण का आधार भी है 

  रात्रि बनकर  विश्राम देती !


सौंदर्य की देवी कहाए

इस जगत को आकार देती, 

शिव से मिलन की प्रेरणा दे 

ले कर स्वयं कैलाश जाती !


अपार ऊर्जा धारे देवी 

 दर्शन परम अनंत कराती, 

 जगत दात्री बनी सिद्धि रिद्धि

निःशंका जो सदा विचरती !


महातपस्विनी जगत माता  

पराम्बा, जया, महायोगिनी, 

शिव प्रिया,  अंबा, महागौरी 

जगत तोषिणी दिव्यतोषिणी !


मंगलवार, जुलाई 4

गुरु ज्ञान से

गुरु ज्ञान से


जग जाये वह तर ही जाये 

रग-रग में शुभ ज्योति जलाये, 

धार प्रीत की सदा बरसती 

बस उस ओर नज़र ले जाये !


काया स्वस्थ हृदय आनंदित 

केतन भरे रहें भंडारे, 

हर प्राणी हित स्वस्ति प्रार्थना 

निज श्रम से क़िस्मत संवारें 


अधरों पर हो नाम उसी का

नित्य नियम उर बाती बालें, 

कान्हा वंशी  डमरू शंकर 

सर्वजनों हित प्रेम सँभाले 


भेद मिटे अपनों ग़ैरों का 

काम सभी के सब आ जायें, 

जीवन यह आना-जाना है 

जो पाया है यहीं लुटायें !


बुधवार, मार्च 30

जीवन मधुरिम काव्य परम का

जीवन मधुरिम काव्य परम का

फिरे सहज श्वासों की माला

हम भाव सुगंध बनें,

जीवन मधुरिम काव्य परम का

इक सरस प्रबंध बनें !

 

जगती के इस महायज्ञ में

आहुतियाँ अपनी हों,

निशदिन बंटता परम उजास

मेधा शक्ति ज्योति हो !

 

शब्द गूँजते कण-कण में नित

बाँचें ज्ञान ऋचाएं,

चेतन हो हर मन सुन जिसको

गीत वही गुंजायें !

 

शुभता का ही वरण सदा हो

सतत जागरण ऐसा,

अधरों पर मुस्कान खिला दें

हटें आवरण मिथ्या !

 

उसकी क्षमता है अपार फिर

क्यों संदेह जगाएं,

त्याग अहंता उन हाथों की

कठपुतली बन जाएँ !


शनिवार, दिसंबर 18

सन्नाटे का पुष्प अनोखा


सन्नाटे का पुष्प अनोखा 


खो जाते हैं प्रश्न  सभी का 

इक ही उत्तर जब मिलता है, 

सन्नाटे का पुष्प अनोखा 

अंतर्मन में तब खिलता है !


उर नि:शब्द, नीरवता छायी 

बस होना पर्याप्त हुआ है, 

उसी मौन में भीतर घटता 

अद्भुत इक संवाद हुआ है !


क्या कहना, क्या सुनना है अब 

भेद खुले हैं सारे उसके, 

जान जान जाना ना जाए 

गढ़ते सब क़िस्से हैं जिसके !


चुप रहकर या सब कुछ कहकर 

नहीं ज्ञान हो सकता उसका, 

वही ज्ञान है वह है ज्ञाता 

बस इतना कोई कह सकता !

शनिवार, जुलाई 24

गुरु पूर्णिमा पर हार्दिक शुभकामनाएँ

गुरु पूर्णिमा 


गुरु बंधन से मुक्त कराते 
​​​​​​​​अंधकार में भटक रहे जो, 
उन जीवों को, शुभ प्रकाश का 
अनुपम सुंदर मार्ग दिखाते !

छुपी हुए अपनी नज़रों से 
स्वयं के भीतर जो शक्ति है, 
आत्मज्योति प्रज्ज्वलित करके 
उससे शुभ परिचय करवाते !

ज्ञान, क्रिया, भजनों  के द्वारा 
शुद्ध करें मन, बुद्धि सहज ही, 
महाप्रेम से करुणामय वह 
फिर अनंत पथ पर ले जाते !

मूर्त रूप हैं ज्ञान-भक्ति का
गुरु की महिमा कौन जानता, 
नज़रों से हर ताप मिटाते
वचनों से सदा अमृत बहता !

संतों की वाणी अनुपम है 
गुरू पूर्णिमा स्मरण दिलाती, 
चरणों पर यदि शीश झुका हो 
आनंद वर्षा में सिझाती  !


सोमवार, जुलाई 12

चंद ख़्याल


चंद ख़्याल 



पाया हुआ है सब जो खोजते हैं हम 
शब्दों में ज्ञान बसता दिल का था भरम 
-
जाना हुआ सभी कहता है छोटा मन 
कोई कमी नहीं तो फिर क्यों करे जतन 
-
छोड़ा यहाँ बाँधा वहाँ 
मुक्ति से डरता है जहां 
-
मुश्किलों से डर जो ख़ुदा के द्वार आए 
पाए नहीं उसे बस पीड़ा को बढ़ाए 
-
स्वप्नों में भयभीत हुआ मन 
सीमाओं में खुद को बाँधा 
  कहीं नहीं थी कोई सीमा
जब भी आँख खोल कर देखा 

बुधवार, मार्च 24

समय

समय 


‘समय ठहर गया है’ 

जब कहता है कोई 

तो एक सत्य से उसका परिचय होता है 

समय ठहरा ही हुआ है अनंत काल से ! 

गतिमान वस्तुएं 

उसके चलने का भ्रम पैदा कर देती हैं !


‘समय भाग रहा है’ 

कहता है जब कोई 

वह एक अन्य तथ्य को दर्शाता है 

भाग रहा है उसका मन 

 किसी न किसी शै के पीछे !


‘समय उड़ता हुआ सा लगता है’ 

जब कोई आनंदित होता है 

और ठहर जाता है खुद में !


‘काटे नहीं कटता जब समय’ 

कोई अंधेरे में भटक रहा है 

अपनी पीड़ा को टाँक देता है समय पर !


समय कम है उसके लिए जो महत्वाकांक्षी है 

समय खराब है उसके लिए जो भाग्यवादी है 

समय अच्छा है आशावादी के लिए 

हर समय समान नहीं होता यथार्थवादी के लिए !


ज्ञानी जानता है 

समय एक कल्पना है 

वास्तव में एक बार में एक ही क्षण

 मिलता है जीने के लिए !



 

सोमवार, फ़रवरी 15

उसे बहने दो

उसे बहने दो


वह बहना चाहता है 

निर्विरोध निर्विकल्प 

हमारे माध्यम से 

प्रेम और आनंद बन 

पाहन बन यदि रोका उसका मार्ग 

तो वही बहेगा रोष और विषाद बनकर !

वह हजार-हजार ढंग से प्रकट होता है 

यदि राम बनने की सम्भावना न दिखे 

तो रावण बन सकता है 

वह उस ऊर्जावान नदी की तरह है 

जिसे मार्ग न मिले तो बाढ़ बन जाती है 

अपने ही तटों को डुबोती !


वह बहना चाहता है 

शांति और सुख बन

यदि ओढ़ ली है दुःख की चादर

तो वही छा जायेगा 

अशांति बनकर रग-रग में 

 बाल्मीकि बनने की सम्भावना न जगायी

तो  बना रह सकता है रत्नाकर युगों तक

उसे तो पनपना ही है 

वह जीवन है !


वह बहना चाहता है 

ज्ञान और पवित्रता बन 

यदि अज्ञान ही रास आता है किसी को 

तो दूषित विचारधारा जन्म लेगी उसी कोख से 

जहां से गूँज सकते थे पावन मन्त्र 

नकारात्मकता भी तो अशुचि है न 

सूतक लगा ही रहेगा वतावरण में 

उसे तो जन्मना ही है !


यदि स्वयं को नहीं प्रकटाया

तो राग-द्वेष ही सम्भाल लेंगे अंतरात्मा 

उसे बहने दो, मार्ग दो 

वह ऊर्जा है 

जो ढूंढ ही लेती है अपना मार्ग 

लेकिन वही 

जो हम उसे देते हैं 

वह भाग्य है लेकिन उसका जन्म होता है 

हमारी ‘हाँ’ या ‘न’ से ! 

 

गुरुवार, जनवरी 28

आस्था का दीप

 आस्था का दीप 
वक्त पर जो थाम ले गिरते हुए को 
बढ़े आगे हाथ दे हिलते हुए को,
जो गमों की धूप से दिल को बचाए
ज्ञान वह जो डूबते के काम आये !

ज्ञान भरता है उजाला पथ अँधेरे जब मिलें 
खिला देता पुष्प, पत्थर जब कभी पथ पर मिलें, 
जब कभी संशय सताये राही कोई पथ न पाए 
काट देता हर विभ्रम को ज्ञान ही वह शस्त्र लाये !

मन कभी चंचल अति हो भंवर में डूबा डरे 
बुद्धि विचलित बंट गयी राह नहीं निश्चित करे, 
आस्था का दीप जगमग तब भी भीतर जल रहा है 
ज्ञान, श्रद्धा बन, कभी विश्वास बन कर पल रहा है  !

जगत जब विकराल बनकर भरे जीवन में निराशा
आँधियाँ ही हों गुजरतीं शांति की न नि:शेष आशा, 
जब कभी दानव बढ़ें देवों का न सम्मान हो 
उस समय भी दिल में कान्हा व अधर पर राम हों !

रविवार, अक्टूबर 18

उस देवी की पूजा करें हम

उस देवी की पूजा करें हम  


थामती जो हर  विपद में 

 ज्ञान दीपक पथ दिखाती,

प्राण का आधार भी है 

  रात्रि बन विश्राम देती !


सौंदर्य देवी कहाए

जगत को आकार देती, 

शिव मिलन की प्रेरणा दे 

ले स्वयं कैलाश जाती !


ऊर्जा अपार धारे

अनंत का दर्शन कराती, 

 दात्री बनी सिद्धि रिद्धि

निःशंक जो सदा विचरती !

 

महातपस्विनी जगत मा 

पराम्बा,   महायोगिनी, 

शिव प्रिया,  माँ  महागौरी 

जगत तोषिणी व पोषिणी !

शुक्रवार, अक्टूबर 9

ज्ञान और ज्ञाता

 ज्ञान और ज्ञाता

जो किताबें आज सजी हैं 

पुस्तकालयों की आलमारियों में 

वे कभी रहा करती थीं 

मानव मस्तिष्क में 

जब तक प्रकटी नहीं 

तब भी थीं अस्तित्त्व के गर्भ में 

विद्या माया ने रचाया है सारा आयोजन 

कलाओं, संस्कृतियों का करने संवर्धन 

अनंत ज्ञान छिपा है उसके कोष में 

किन्तु ज्ञाता फिर भी अदृश्य बना रहता है 

शब्द शक्ति है विद्या रूपी 

जानने वाले इसे प्रकट करते हैं 

और स्वयं उसी विराट में मिल जाते है 

कालिदास के शब्द हमें मिलते हैं  

वह स्वयं कहीं विलीन हो गया !


मंगलवार, सितंबर 8

शब्दों के वह पार मिलेगा

 शब्दों के वह पार मिलेगा 

जब  खिलेगा भीतर मौन का पुष्प 

वहाँ न भावनाओं की डालियाँ होंगी 

न विचारों की भूमि !!

 

शब्दों की नाव तो बनानी ही होगी 

जो उतार देगी शून्य के तट पर !

 

शब्द ले जाते हैं खुद से दूर 

शब्द जगत हैं 

माया हैं !

 

सत्य की यदि चाह है 

तो उस आग से गुजरना होगा 

जहाँ जल जाता है सारा ज्ञान

उस सागर को पार करना होगा 

जहाँ दिखाई ही नहीं देता दूसरा तट

सूख जाता है हर सागर 

मौन के उतरते ही

बवंडर से गुजर भावों और विचारों के

उस शांति को करना होगा महसूस

जो मिटा देती है सबकुछ

पर जिसके बाद जन्म होता है 

एक नवीन सृष्टि का !