नयी भोर की आस जग रही
दिल में कैसी फांस गड़ रही
अंतर का जो चैन हर रही,
अब अतीत का गट्ठर फेंको
नयी भोर की आस जग रही !
मानवता फिर सिसक रही है
भरे नहीं थे ज़ख़्म पुराने,
किंतु निराश न होकर जग में
गाये कोकिल नये तराने !
अब भी दिशा दिखाते तारे
सागर की लहरें गाती हैं,
उपवन पर गोले बरसाओ
कलियाँ फिर भी खिल जाती हैं !
जाने कितने ही युद्धों की
भीषणता से पार हुए हम,
जीवन एक अकाट्य सत्य है
उससे क्यूँ बेज़ार हुए हम !
सत्यम् शुवम् सुंदरम् वाले
गीत सदा अधरों पर आयें,
लिप्सा का दानव जो जागा
सच की आँधी उसे मिटाए !
Kya sahee baat kahi hai aapne!!
जवाब देंहटाएंस्वागत व आभार!
हटाएंकविता सामयिक भी है और हृदयस्पर्शी भी
जवाब देंहटाएंस्वागत व आभार!
हटाएं"मानवता फिर सिसक रही"
जवाब देंहटाएंमानवता की तो यही कहानी है
सुन्दर रचना
स्वागत व आभार!
हटाएंलाजवाब अभिव्यक्ति
जवाब देंहटाएंस्वागत व आभार!
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