सोमवार, मई 25

छूट गयी जब “मैं”

छूट गयी जब “मैं”



छूट गयीं सहज

 सारी व्यस्तताएँ

छूट गयी जब मैं,


सारे जहान का समय 

अब जैसे हाथों में आ गया

छूट गयी जब मैं !


कुछ भी करने को नहीं 

 अनंत वक्त अपनी मुट्ठी में

बेफिक्री मन ने कैसी पायी है

छूट गयी जब मैं !


 जैसे फूल होता है

अस्तित्त्व मन का ऐसा ही है

जग तय करता है

उपयोगिता उसकी...

वह  खिलता है 

बस अपनी मौज में

यह तन जहाँ भी रहे, 

काम आये जग के

वाणी हो उपयोगी

और ये हाथ उगायें फूल 

या लिखें कविता !

छूट गयी जब मैं !


मन का अब पता ही नहीं चलता

जैसे रवि  के आते ही 

अंधकार का

छूट गए सारे दुराग्रह 

सारी पकड़ भी छूट गयी....

अब भीतर मीलों तक

 चैन बिछा है

अनंत शांति !

छूट गयी जब मैं !


आज समय ही समय है....

जन्मों का यायावर 

घर लौट आया है

अब न उठानी चाह की गठरी

और न ही चलना पड़े 

किसी अगले पड़ाव को

जिस पार उतरने की आस 

लगाये था मन

दौड़ता फिर रहा था

 आ पहुँचा है

खत्म हो गयी सारी आपाधापी

और भीतर सब खाली है

वहाँ कोई भी नहीं रहता, 

यात्री लौट गया

पंछी उड़ गया

छूट गयी जब मैं !

 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें