गुरुवार, अगस्त 20

सत-रज-तम का खेल है सारा

सत-रज-तम का खेल है सारा 


कौन हमारा, कौन पराया 

इसका पता लगाया जाये, 

तन-मन दिखे, अगोचर आत्मा  

किसका ध्यान लगाया जाये?


तन यह माटी, मन पानी सा 

दोनों आते-जाते रहते, 

आत्म ज्योति से टिके हुए हैं 

जिससे हम अनजाने रहते !


मन के पीछे चलता है तन 

तन की सेवा में रहता मन, 

सेवक बाहर, मालिक भीतर 

कैसे पूर्ण लगेगा जीवन ! 


पहले उससे प्रीत बढ़ा लो 

जो मन के उस पार का वासी, 

खिल जाएँगे उपवन मन में 

छँट जाएगी घोर उदासी !


सत-रज-तम का खेल है सारा 

तन-तम, मन-रज खेल रहे हैं, 

सत आत्मा की बात न करते 

व्यर्थ ही दुविधा झेल रहे हैं ! 


दोनों का अवसान है सत में 

मध्यम मार्ग शाश्वत निरंजन, 

सत के भी जो पार गया है 

बन जाता है वही चिरंतन !


1 टिप्पणी:

  1. जीवन को संतुलित करते हैं सत-रज-तम जिसने थाह पा लिया उसने भव पार कर लिया समझो।
    सुंदर अध्यात्मिक भाव।
    सादर।
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    जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार २१ अगस्त २०२६ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

    जवाब देंहटाएं