सोमवार, अगस्त 24

कुढ़ना और मुस्कुराना

कुढ़ना और मुस्कुराना 


‘कुढ़ना’ यानि मन ही मन 

उस बात की शिकायत करना 

जो है ही नहीं, 

हुई ही नहीं 

और हो सकती ही नहीं 

वाक़ई कितना बेमानी है कुढ़ना 

और कितना अर्थवान है 

हर श्वास की क़ीमत समझना 

जिसे कुढ़ने में भी खर्च किया जा सकता है 

और मुस्कुराने में भी ! 


8 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर सार्थक अभिव्यक्ति! । मुस्कुराहट को अंगीकार करना ही जीवन की सफलता है ॥सादर नमस्कार अनीता जी !

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  2. मुस्कुराना आसान नहीं न कुढ़ना तो हर दूबरी बात पे हो जाता है शायद।
    मानवीय मन का परतों के नीचे अलग-अलग परतें हैं
    मुश्किल राह हम ख़ुद चुनते हैं आसान में कहॉं शर्तें हैं।
    सादर।
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    जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना मंगलवार २५ अगस्त २०२६ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

    जवाब देंहटाएं