रामायण लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
रामायण लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, नवंबर 29

रामायण - मिथक से परे इतिहास की झलक -अंतिम भाग


रामायण - मिथक से परे इतिहास की झलक 

(अंतिम भाग)

कल हम जाफना से कोलंबो के लिए रवाना हुए, यात्रा लंबी थी, लगभग ग्यारह घंटे बस में बिताने पड़े। मध्य में चार बार कुछ देर का अवकाश लिया। सुबह रेलवे स्टेशन तक टहलने गये थे, फूलों की तस्वीरें उतारीं। नाश्ते के बाद यात्रा आरम्भ हुई। मार्ग में दोनों ओर दूर तक जल ही जल था और मध्य में सीधी जाती हुई सड़क, जिसे कॉज वे कहते हैं। कॉज वे पर जाते हुए एक अनोखा अनुभव हो रहा था, मानो हम पानी की सतह पर ही यात्रा कर रहे हैं। जल में कहीं-कहीं छोटे-छोटे हरे द्वीप नज़र आते थे। दोपहर के भोजन से पूर्व माधवानंद जी ने एक-एक करके सभी यात्रियों से अपना परिचय देने को कहा, यदि संभव हो तो कोई गीत या भजन सुनाने को भी कहा। कुछ महिलाओं ने भजन सुनाये। सभी को सुनकर आश्चर्य और हर्ष हुआ, जब ज्ञात हुआ कि यात्रियों में एक नभ सेना का उच्च अधिकारी है, एक राजनीति में है, कोई बड़ा व्यापारी है और एक जन यातायात नियंत्रक भी थे। किसी सीनियर सिटीज़न होम से भी चार महिलाएँ आयी थीं। उनमें से दो के पुत्र बैंगलोर में रहते हैं, पर उन्होंने परिवार में रहने की बजाय अपने हम उम्र लोगों के साथ रहना पसंद किया।मैंने एक हिन्दी कविता तथा उसका कन्नड़ भाषा में किया अनुवाद पढ़कर सुनाया। ऐसा लग रहा था कि सभी यात्रियों में भक्ति-भावना भरी हुई थी, तभी तो वे रामायण यात्रा पर आये थे। लंच के बाद जब यात्रा फिर आरम्भ हुई तो कुछ लोग अन्ताक्षरी  खेलने लगे। एक व्यक्ति किशोर कुमार के प्रशंसक थे, उन्होंने अनेक पुराने गीत सुनाकर समां बांध दिया, तब तो सभी में एक से बढ़कर एक पुराने गाने गाने की होड़ लग गई। कन्नड़ और हिन्दी दोनों ही भाषाओं में गीतों का सिलसिला चलता रहा, तब शाम की चाय का समय हो गया था। जिसके बाद नियमित संध्या करवायी गई, जिसमें नरसिंह भगवान का कीर्तन व महामंत्र का जाप हुआ।उसके बाद माधवानंद जी ने रामायण पर एक प्रश्नोत्तरी भी करवायी। जिससे इस महाकाव्य के बारे में सभी का ज्ञान बढ़ा।इस तरह आनंद पूर्वक समय बिताते हुए हम कोलंबो पहुँच गये। आज दिन में कोलंबो दर्शन करके रात को प्रेमदासा हवाई अड्डे पहुँचना है।जहाँ से रात्रि एक बजे की उड़ान से हम भारत पहुँच जाएँगे।  

आज सुबह साढ़े चार बजे हम घर लौट आये थे। वापसी की यात्रा सुखद रही। कल सुबह होटल से चेकआउट करके सबसे पहले कोलंबो के राधा-कृष्ण को समर्पित सुंदर इस्कॉन मंदिर देखने गये।पुजारी जी ने समूह का स्वागत किया और सभी आरती में सम्मिलित हुए। मंदिर में दशावतारों की सुंदर प्रतिमाएँ थीं।श्वेत अश्व पर सवार भगवान कल्कि के साथ भगवान बुद्धि की भी एक सुंदर प्रतिमा थी। कृष्ण व बलराम की एक प्रतिमा में गाय तथा मोर की प्रतिमाएँ सजीव जान पद रही थीं। मंदिर के कक्ष की छत पर भी शानदार चित्रकारी की गई थी। एक जगह रुक्मिणी और कृष्ण के विवाह की झांकी थी। एक दीवार पर बनी स्वर्ण मृग की ओर इंगित करती सीता व राम-लक्ष्मण की सुंदर मूर्तियाँ आकर्षित कर रही थीं।बल कृष्ण को रस्सी से बाँधती यशोदा और सागर पर सेतु बनाती वानर सेना के दृश्य भी मूर्ति कला का उत्कृष्ट उदाहरण हैं। 

इसके बाद हम केलानिया स्थित बौद्ध विहार में विभीषण मंदिर देखने गये। जो श्रीलंका के प्रसिद्ध केलानिया राजा महाविहार में स्थित है।कहा जाता है कि राजा मनिअक्खिखा द्वारा आमंत्रित किए जाने पर भगवान बुद्ध बुद्धत्व प्राप्त करने के पाँच वर्षों 500 भिक्षुओं के साथ बाद यहाँ आये थे।यह श्रीलंका के सबसे प्रमुख बौद्ध मंदिरों में से एक है। मंदिर का अहाता अति विशाल है, अनेक स्थानीय जान श्वेत वस्त्रों में वहाँ नीचे बैठकर ध्यान कर रहे थे। बुद्ध की उपदेश स्थली पर एक सुंदर स्तूप बना है।कई कक्षों में बुद्ध के जीवन को सुंदर चित्रों और मूर्तियों द्वारा दर्शाया गया है। यहाँ स्थित अवलोकितेश्वर की अठारह फुट ऊँची पाषाण प्रतिमा भी अपनी भव्यता से दर्शकों को विस्मित करती है।हमने यहाँ पहुँचकर देखा, अनेक स्थानीय भक्त यहाँ श्रद्धा प्रकट करने, तेल के दीपक जलाने और कमल के फूल चढ़ाने आये हुए थे,  जबकि पर्यटक कोने-कोने में व्याप्त शांतिपूर्ण ऊर्जा और श्रीलंका की समृद्ध विरासत की ओर आकर्षित हो रहे थे।भीतरी भवन में भगवान बुद्ध की लेटी हुई विशाल मूर्ति ने सभी को एक गहन शांति का अनुभव कराया। परिसर में स्थित बोधि वृक्ष भी अति सम्मानित है, जो बोधगया से ले जाये गये वृक्ष का एक अंश है। 

केलनिया के इस बौद्ध मंदिर परिसर में विभीषण का एक सम्मानजनक स्थान है। मान्यता है कि यह वही स्थान है जहाँ पूर्व काल में विभीषण का महल था।यहां विभीषण के राज्याभिषेक को दर्शाने वाले भित्तिचित्र भी बने हैं।विभीषण को श्रीलंका के चार संरक्षक देवताओं में से एक माना जाता है।हमने एक विशाल कक्ष में स्थापित विभीषण के एक सुंदर चित्र का दर्शन किया। जिसके एक ओर भगवान कार्तिकेय  तथा दूसरी ओर भगवान विष्णु के चित्र थे। संपूर्ण परिसर में श्रीलंका के राष्ट्रीय वृक्ष ‘ना’ वृक्ष लगे हुए हैं, जिन्हें सीलोन आयरनवुड भी कहा जाता है।ये देश के वर्षावनों में प्राकृतिक रूप से उगते  हैं और इनकी  कठोर लकड़ी से भारी निर्माण कार्य होता है।बौद्ध धर्म में भी इस वृक्ष को पवित्र माना जाता है।मंदिर के एक कक्ष की बाहरी दीवार पर विभीषण के राज्याभिषेक के दृश्यों को दर्शाया गया गया है। 

इसके बाद हम कोलंबो स्थित पंचमुखी हनुमान का मंदिर देखने गये। यह मंदिर लंका युद्ध के दौरान अहिरावण के वध के लिए भगवान हनुमान के अवतार से जुड़ा है। इसे श्रीलंका का पहला अंजनेयार मंदिर माना जाता है। लंका युद्ध के दौरान, अहिरावण ने राम और लक्ष्मण को पाताल लोक में बंदी बना लिया और उन्हें मारने के लिए पांच दीपक जलाए, जिनकी लौ बुझाई नहीं जा सकती थी।इन दीपकों को एक साथ बुझाने और राम-लक्ष्मण को बचाने के लिए, हनुमान जी ने पंचमुखी रूप धारण किया।उन्होंने पूर्व में वानर मुख,  पश्चिम में गरुड़ मुख, उत्तर में वराह मुख, दक्षिण में नृसिंह मुख, आकाश की ओर अश्व मुख (हयग्रीव) धारण किया। इस मंदिर में आने वाले भक्त यह मानते हैं कि उन्हें हर रोग और कष्ट से मुक्ति मिल जाती है, तथा मन में शक्ति का संचार होता है। 

श्रीलंका की इस यात्रा के बाद किसी भी भारतीय के मन में रामायण के इतिहास होने में कोई संदेह नहीं रह जाता है। इतिहास का अर्थ है ऐसा हुआ था, इसका अर्थ है रामायण में वर्णित घटनाएँ वास्तव में हुई थीं। आज जो भारत हम देखते हैं, भौगोलिक रूप से हज़ारों वर्ष पूर्व  उससे अति विशाल था।दक्षिण एशिया के कई देश तब भारत का अंग थे, जिसमें आज का श्रीलंका भी शामिल है।  


बुधवार, नवंबर 19

रामायण - मिथक से परे इतिहास की झलक - ३

रामायण - मिथक से परे इतिहास की झलक 

भाग - ३


आज मंदारा रोजेन रिजॉर्ट में हमारी पहली और अंतिम सुबह है।यह स्थान श्री लंका के याला राष्ट्रीय उद्यान में आता है। सुबह उठने से पूर्व ही छतों पर बंदरों की उछलकूद की आवाज़ें सुनायी देने लगीं थीं। बाहर निकले तो चार-पाँच मोर इधर-उधर उड़ते दिखायी दिये। आम के बगीचों में कच्चे-पक्के नीचे गिरे थे। हमने कई तस्वीरें उतारीं, एक मोर नृत्य की मुद्रा में पंख फैलाए खड़ा था। एक परिचारिका किसी वृक्ष से फूल तोड़ रही थी,सारा वातावरण रामायण में पढ़े अशोक वाटिका वाले प्रसंग की याद दिला रहा था,जब हनुमान ने वाटिका तहस-नहस कर दी थी और त्रिजटा सीता के लिए फूल ले जाती थी। 

कल शाम लगभग सात बजे हम कतरगाम पहुँचे थे।यह स्थान श्रीलंका के उवा प्रांत के मोनारागला जिले में स्थित है; जो श्रीलंका के दक्षिण-पूर्वी क्षेत्र में लोकप्रिय याला राष्ट्रीय उद्यान से सटा हुआ एक तेज़ी से विकसित होता हुआ शहर है। हिंदू इसे कार्तिकेय ग्राम कहते हैं। कतारगाम श्रीलंका के बौद्ध, हिंदू और स्वदेशी वेद्दा, सभी लोगों के लिए एक पवित्र तीर्थस्थल है। दक्षिण भारत के लोग भी वहाँ पूजा करने आते हैं। इस शहर में एक विशाल मंदिर है, जो शिव-पार्वती के पुत्र स्कंद कुमार को समर्पित है। जिसे श्रीलंका के संरक्षक देवताओं में से एक के रूप में जाना जाता है। 

होटल में समान आदि रखकर व रात्रि भोजन के पश्चात हम सभी कार्तिकेय के मंदिर के दर्शन के लिए रवाना हुए। हवा शीतल थी और वातावरण में शांति थी। मार्ग में कुछ फलों की दुकानें खुली हुई मिलीं। उन्हें नीचे से ऊपर कलात्मक ढंग से ऐसे सजाया गया था मानो मिठाई की दुकानें हों।हमने गौड़ किया कि यहाँ मंदिरों में फलों को चढ़ाया जाता है।हमारा समूह पहुँचा तो पुजारी व कुछ कर्मियों के अलावा मंदिर में कोई नहीं था। मंदिर के विशाल द्वार से प्रवेश करते ही उसकी भव्यता का अंदाज़ा हो रहा था।सामने विशाल मैदान है।दाँयी तरफ़ एक मस्जिद है। बाँयी ओर एक बौद्ध स्तूप स्थित है। सामने मुख्य मंदिर की दीवार पर मोर  और हाथियों की सुंदर आकृतियाँ उकेरी हुई थीं। इस मंदिर के भीतरी कक्ष में मुख्य देवता कार्तिकेय एक यंत्र के रूप में पर्दे के पीछे स्थापित हैं, जिस पर मुरुगन और उनकी दोनों पत्नियों की आकृतियाँ बनी हैं। बाहर पर्दे पर केवल उनके सुंदर चित्र ही देखे जा सकते हैं। जिसमें मध्य में मुरूगन और दोनों और देवसेना व वल्ली के चित्र हैं। निकट ही भगवान गणेश को समर्पित एक मंदिर है। कतारगामा स्थित किरी वेहेरा स्तूप श्रीलंका के उन सोलह पवित्र स्थलों में से एक है जहाँ बुद्ध आये थे। यह स्थान बौद्ध धर्म और हिंदू धर्म के बीच घनिष्ठ और सुंदर संबंध को दर्शाता है। छठी शताब्दी ईसा पूर्व में देवताओं के सेनापति और प्रसिद्ध युद्ध देवता कार्तिकेय के पूर्ण अवतार राजा महासेना बुद्ध से मिले और उन्होंने त्रिरत्नों में शरण ली। इस मुलाकात के बाद राजा ने बुद्ध की यात्रा के उपलक्ष्य में इस स्तूप का निर्माण कराया। बुद्ध और भगवान मुरुगन के बीच स्थापित इस संबंध ने इस क्षेत्र में बौद्ध और हिंदू भक्तों के बीच घनिष्ठऔर शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व को संभव बनाया।यह स्थान विभिन्न पृष्ठभूमियों और धर्मों के लोगों के बीच शांति और सहिष्णुता का संचार करता है।

मंदिर से कुछ दूरी पर माणिक्य गंगा या रत्नों की नदी नामक एक पवित्र स्नान स्थल है। स्थानीय निवासियों का मानना है कि इसमें स्नान करने से व्यक्ति के सभी रोग दूर हो जाते हैं क्योंकि इसमें रत्नों की प्रचुर मात्रा होती है और जंगल में बहने वाली नदी के किनारे लगे पेड़ों की जड़ों के औषधीय गुण भी इसमें समाहित होते हैं।

आज सुबह नाश्ते के बाद हम सभी आज के पहले पड़ाव ‘रावण एला या प्रपात’ के लिए रवाना हुए।कतरगाम से लगभग तीन घंटे की यात्रा के बाद हम वहाँ पहुँचे। कहा जाता है रावण ने सीता माँ को इस झरने के पीछे स्थित गुफाओं में छिपा दिया था, जिसे अब रावण एला गुफा के नाम से जाना जाता है। उस समय यह गुफा घने जंगलों से घिरी हुई थी। यह भी माना जाता है कि सीता माँ इस झरने के जल से बने कुंड में स्नान करती थीं। यह स्थान एक पहाड़ी पर स्थित है और झरने के निकट तक जाने के लिए मार्ग तथा सीढ़ियाँ बनी हैं। दूर ऊँचे पर्वत से गिरता हुआ जल प्रपात बहुत आकर्षक लग रहा था। रावण जलप्रपात से थोड़ी ही दूरी पर, रावण गुफा स्थित है। गुफा तक पहुँचने के लिए चट्टान पर खुदी हुई लगभग सात सौ सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं।हमने दूर से ही उस गुफा के दर्शन किए। गुफा के निकट ही एक सुंदर मंदिर भी है।

हमारा अगला पड़ाव था श्रीलंका का सुंदर पहाड़ी शहर नुवारा एलिया, इसका शाब्दिक अर्थ है रोशनी का शहर ! नुवारा एलिया औपनिवेशिक-युग के आवासों, हरे-भरे  चाय बागानों और ठंडी जलवायु के कारण जाना जाता है। लगभग 6,128 फीट की ऊंचाई पर स्थित इस शहर में रामायण में वर्णित अशोक वाटिका है, जहाँ सीता माँ को बंदी बना कर रखा गया था।श्रीलंका में ऐसे पाँच स्थान हैं, जहाँ सीता माँ को रखा गया था। हम वहाँ पहुँचे तो वर्षा हो रही थी, तापमान पंद्रह डिग्री था।सीता अम्मन मंदिर में सीता माता के सुंदर विग्रह के दर्शनों का अवसर मिला। इस मंदिर को "सीता एलिया" के नाम से भी जाना जाता है, और इसके पास एक नदी भी है जिसके बारे में कहा जाता है कि सीता माता यहाँ स्नान करती थीं। मंदिर में सीता, राम, लक्ष्मण और हनुमान की पाँच हज़ार वर्ष पुरानी मूर्तियाँ हैं। वहाँ की प्रथा के अनुसार समूह की महिलाओं ने उनके सुंदर विग्रह का आलिंगन किया। यहाँ का मुख्य आकर्षण एक चट्टान पर हनुमानजी के पैरों के निशान हैं। 

इसके बाद हमारी बस गायत्री पीठम पहुँची, जहाँ गायत्री देवी का मंदिर है। यह स्थान श्रीलंका का एक आध्यात्मिक केंद्र है, जिसे श्री लंकाधीश्वर मंदिर भी कहा जाता है। यह संत मुरुगेसु सिद्धार द्वारा स्थापित किया गया था और यहाँ देवी गायत्री और लंकाधीश्वरके रूप में भगवान शिव की पूजा की जाती है। इस स्थान का रामायण से भी गहरा संबंध है, क्योंकि माना जाता है कि यहीं पर रावण के पुत्र इंद्रजीत ने भगवान शिव की तपस्या की थी। युद्ध में जाने से पहले इंद्रजीत को भगवान शिव ने आशीर्वाद दिया था।मंदिर में 108 'बाणलिंग' स्थापित हैं, जिन्हें संत मुरुगेसु महर्षि जर्मनी से वापस लाए थे।हमने वहाँ एक संग्रहालय में संत के जीवन से जुड़ी कई वस्तुओं व चित्रों को देखा। 



गायत्री पीठम के बाद हम उस स्थान पर पहुँचे जहाँ देवी सीता ने अग्नि परीक्षा दी थी। सीता माता की अग्नि परीक्षा का स्थान
श्रीलंका के दिवुरुम्पोला में माना जाता है। इस स्थान को 'शपथ का स्थान' भी कहते हैं।दिवुरुम्पोला नुवारा एलिया से लगभग 18 किलोमीटर दूर है। इस स्थान पर एक मंदिर है, जिसे "दिवुरुम्पोला प्राचीन मंदिर" कहा जाता है। इस मंदिर परिसर में एक विशेष स्थान को चिन्हित किया गया है, जहाँ सीता माता ने अग्निपरीक्षा दी थी।यह स्थल हिंदू और बौद्ध दोनों धर्मों की सांस्कृतिक छाप को दर्शाता है और श्रीलंका के महत्वपूर्ण ऐतिहासिक और धार्मिक स्थलों में से एक है। आज भी स्थानीय लोग विवाद सुलझाने के लिए इस मंदिर में आकर सौगंध दिलवाते हैं।इस परिसर में एक बोधिवृक्ष है, जो बोध गया के उसी श्री महाबोधि वृक्ष का वंशज माना जाता है जिसके नीचे बैठकर भगवान बुद्ध को परम ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। निकट ही एक बौद्ध स्तूप भी था।यहाँ हमने सम्राट अशोक की पुत्री संघमित्रा की एक सुंदर प्रतिमा के दर्शन भी किए।

सोमवार, नवंबर 17

रामायण - मिथक से परे इतिहास की झलक - २

रामायण - मिथक से परे इतिहास की झलक 

(दूसरा भाग)

२५ अक्तूबर २०२५ 

आज कई दर्शनीय स्थल देखने के बाद हम त्रिंकोमल्ली पहुँचे हैं। यहाँ हमारा निवास समुद्र तट पर है। सर्वप्रथम हम नुवारा एलिया से लगभग 30 किमी उत्तर में स्थित रामबोडा स्थान पर पहुँचे, इसका शाब्दिक अर्थ है, राम की सेना या शक्ति  ।माना जाता है कि भगवान हनुमान ने सीता की खोज के दौरान इस स्थान पर विश्राम किया था। यह मंदिर एक पहाड़ी पर स्थित है और इसकी स्थापना चिन्मय मिशन द्वारा 2001 में की गई थी। मंदिर में 18 फीट ऊंची हनुमान की प्रतिमा स्थापित है और यह श्रीलंका में रामायण से जुड़े महत्वपूर्ण स्थलों में से एक है। मंदिर से कोटमाले जलाशय और आसपास की सुंदर पहाड़ियों का मनोरम दृश्य दिखाई देता है। 

इसी परिसर में अन्नपूर्णी रेस्टोरेंट में स्वादिष्ट, शुद्ध शाकाहारी, सात्विक भोजन मिलता है। हमने यहाँ हर्बल टी का आनंद लिया। यहाँ कुछ दुकानें भी थीं, जिनमें श्रीलंका कॉफ़ी, चाय और मसाले मिलते हैं। एक किताबों की दुकान भी है, जहाँ से हमने चिन्मय मिशन द्वारा प्रकाशित ‘रामायण इन श्रीलंका’ नामक एक सुंदर चित्रात्मक पुस्तक ख़रीदी। रामबोडा पर्वत के सामने वाला पर्वत 'रावणबोडा' पर्वत के नाम से जाना जाता है। श्रीराम और लक्ष्मण अपनी वानर सेना के साथ लंका की यात्रा करते हुए अंततः 'रामबोडा' पर्वत पर पहुँचे थे। रावण की सेना ने रावणबोडा' पर्वत पर पड़ाव डाला था। इन पर्वतों की विशेषता यह है कि यद्यपि ये आमने-सामने हैं, फिर भी एक पर्वत से दूसरे पर्वत पर जाना आसान नहीं है क्योंकि यहाँ 'महावेली गंगा' नदी का एक बड़ा बेसिन है। ऐसी मान्यता है कि श्रीराम और रावण की सेनाओं के बीच पहला युद्ध यहीं शुरू हुआ था।रावण ने अपनी मायावी शक्ति से अपनी सेना के छिपने के लिए कई सुरंगें बनाई थीं। इस पर्वतीय क्षेत्र में रावण की सेना ने कई दिनों तक मायावी युद्ध लड़ा था।एक रोचक बात यह थी कि 'रावणबोडा' पर्वत ऐसा लग रहा था मानो हनुमान जी वहाँ सो रहे हों।


रामबोडा से हम कैंडी के लिए रवाना हुए। कैंडी श्री लंका द्वीप की प्राचीन राजधानी थी।जनसंख्या के हिसाब से यह श्रीलंका का छठा सबसे बड़ा शहर है। जब श्रीलंका पर यूरोपीय आक्रमण शुरू हुए, तो कई स्थानीय लोग इस किलेबंद शहर में आकर बस गए, जहाँ वे कई वर्षों तक हमलावरों को रोके रखने में सफल रहे।


इसके बाद हम कैंडी से लगभग बहत्तर किमी उत्तर में, श्रीलंका के मध्य भाग में स्थित दांबुला का स्वर्ण मंदिर देखने गये। बुद्ध की तीस  मीटर ऊँची स्वर्ण  की विशाल प्रतिमा एक विशेष मुद्रा में जैसे सभी को आशीष देती हुई शांत प्रतीत हो रही थी। प्रांगण में लोगों की भीड़ थी, इसे यूनेस्को ने विश्व धरोहर स्थल की मान्यता दी है। यह एक प्राचीन और विशाल गुफा मंदिर परिसर है। इसे अक्सर 'दांबुला गुफा मंदिर' के नाम से भी जाना जाता है। श्रीलंका के सबसे बड़े इस मंदिर के परिसर में बुद्ध के जीवन और जातक कथाओं पर आधारित डेढ़ सौ से भी अधिक मूर्तियाँ हैं।यहाँ दो हज़ार वर्ष  से भी पुराने भित्तिचित्र हैं। यह मंदिर बाईस शताब्दियों से अधिक समय से भिक्षुओं का निवास स्थान रहा है और बौद्ध धर्म का एक महत्वपूर्ण केंद्र है।मंदिर के प्रांगण में स्थित केसरिया रंग में रंगी बौद्ध बिक्षुओं की सुंदर पंक्तिबद्ध मूर्तियाँ विशेष रूप से आकर्षित कर रही थीं।मंदिर दर्शन के बाद हमने यहाँ बिल्व के फूलों से बनी चाय पी, जिसे गुड़ के साथ पिया जाता है। मंदिर के गेट के पास एक वृद्ध महिला नीले कमल के पुष्प बेच रही थी।उसके श्वेत चाँदी के से केश ढलती हुई शाम के प्रकाश में चमक रहे थे। वह अपने मोबाइल में कुछ देख रही थी कि मैंने फूलों के साथ उसकी तस्वीर उतार ली।इसके बाद त्रिंकोमल्ली के लिए हमारी यात्रा का आरम्भ हुआ। लगभग ढाई घंटे के बाद हम समुद्र तट पर स्थित उस रिज़ौर्ट में पहुँच गये, जहाँ हमें रात्रि विश्राम करना था। समुद्र तट पर संगीत के स्वर गूंज रहे थे, हमारे कमरे से भी समुद्र दिखायी पड़ता था। 

 


गुरुवार, नवंबर 13

रामायण - मिथक से परे इतिहास की झलक

रामायण - मिथक से परे इतिहास की झलक 

२३ अक्तूबर २०२५

आज हम श्रीलंका में हैं। इस देश का नाम किस भारतीय ने नहीं सुना है? रामायण की कथा में रावण की स्वर्णमयी लंका का उल्लेख होता है, जिसे हनुमान ने जलाया था।जहाँ भगवान राम रामेश्वर से सेतु बनाकर पहुँचे थे और सीता मैया को लंकापति की क़ैद से छुड़ाया था। लगभग एक महीने पहले ही हमें श्रीलंका में होने वाली ‘रामायण यात्रा’ के बारे में जानकारी मिली थी। पूर्व में इस्कॉन से जुड़े श्री माधवानंद जी के साथ लगभग पचास लोगों के एक समूह के साथ हमने इस यात्रा में सम्मिलित होने का कार्यक्रम बनाया। सुबह सात बजे हम बैंगलुरु के कैंपागोड़ा हवाई अड्डे पर पहुँचे तो अन्य यात्री भी आ चुके थे। सभी को टिकट, वीज़ा तथा नाश्ते व लंच के लिए पैकेट्स दिये गये, पूरी यात्रा के दौरान अपने साथ रखने के लिए खाने-पीने का कुछ सामान अलग से दिया गया। इमिग्रेशन के बाद हम हवाई जहाज़ में पहुँचे तो मोर के पंखों की आकृतियों से सजे सुंदर परिधान पहने परिचारिकाओं ने ‘आई बुआन’ कहकर हमारा स्वागत किया।उनका परिधान साड़ी था, पर पहनने का तरीक़ा भिन्न था।एक घंटे की सुखद यात्रा में एक तमिल फ़िल्म का कुछ अंश देखा, जिसमें नायक हैदराबाद में कोचिंग के लिए आता है, पर नायिका को प्रभावित करने के लिए एक रेस्तराँ में काम पकड़ लेता है।पता नहीं आगे क्या हुआ होगा, पर हमारा गंतव्य आ गया था। कोलंबो हवाई अड्डे पर फूलों की माला से हमारा स्वागत हुआ तथा एक समूह चित्र भी लिया गया।यहीं पर सभी ने एक स्थानीय बैंक से अपनी आवश्यकता के अनुसार भारतीय रुपयों को श्री लंका रुपयों में बदला, एक भारतीय रुपया, सवा तीन श्री लंका रुपयों के बराबर है।  

दोपहर के भोजन के बाद श्रीलंका के दक्षिणी प्रांत गाल्ल की यात्रा आरंभ हुई। एसी बस सुविधाजनक थी। लगभग डेढ़ घंटे में हम गाल्ल पहुँच गये। गाल्ल के उनावटुना स्थान पर स्थित   रूमास्सला पर्वत को संजीवनी पर्वत के नाम से जाना जाता है। ऐसा माना जाता है कि जब हनुमान जी हिमालय के द्रोणगिरी पर्वत से संजीवनी बूटी ला रहे थे, तब उस पर्वत का एक हिस्सा श्रीलंका के गाल्ल के पास रूमास्सला पर्वत के रूप में गिर गया था। इस पर्वत पर पाए जाने वाले पौधे श्रीलंका के अन्य हिस्सों में पाए जाने वाले पौधों से भिन्न हैं, जिसे स्थानीय लोग संजीवनी का अंश मानते हैं। 

संजीवनी पर्वत पर पवनपुत्र हनुमान की एक विशालकाय मूर्ति थी। जिसके चरणों पर कई वस्त्र बाँधे गये थे, शायद इस तरह यहाँ लोग मन्नत माँगते होंगे। मूर्ति एक चबूतरे पर स्थित थी, जिसपर सीढ़ियों से चढ़कर जाना था, हमारे समूह में अधिकतर वरिष्ठ नागरिक थे, पर सभी ने दर्शन किए और कई लोगों ने मूर्ति की परिक्रमा भी की। 

इसके बाद हम श्वेत रंग के एक भव्य शांति स्तूप को देखने गये। इस शांति स्तूप का निर्माण जापानी बौद्ध भिक्षु निचिदत्सु फ़ूजी द्वारा विश्व शांति के लिए किया गया है। द्वितीय विश्व युद्ध में हिरोशिमा और नागासाकी पर हुए परमाणु हमले के बाद उन्होंने शांति के प्रतीक के रूप में दुनिया भर में अस्सी से अधिक शांति स्तूप बनवाये हैं। इस समय वहाँ यूक्रेन और रशिया के मध्य चल रहे युद्ध को रुकवाने के लिए प्रार्थना करने को कहा जा रहा था। युद्ध के भीषण परिणामों के बारे में आगाह भी किया गया था। हमने भगवान बुद्ध के जीवन की चार प्रमुख घटनाओं को चित्रित करती हुई चार विशालकाय मूर्तियों के दर्शन भी किए। 

यात्रा के दौरान अमर नामक स्थानीय गाइड श्रीलंका के बारे में कई जानकारियाँ देते जा रहे थे। सिंहली भाषा में नमस्ते को ‘आई बुआन’ कहा जाता है और धन्यवाद को ‘स्तुति’ ! श्रीलंका दक्षिण एशिया में हिन्द महासागर के उत्तरी भाग में स्थित एक द्वीप है, जिसे हिन्द महासागर का मोती या पूर्व का अन्न भण्डार कहा जाता है। भारत के दक्षिण में स्थित यह द्वीप देश भारत से मात्र इक्कतीस किलोमीटर की  दूरी पर स्थित है। कहा जाता है कि श्रीलंका में सवा लाख वर्ष पहले से मानव निवास करते थे। इसका इतिहास प्रागैतिहासिक काल से शुरू होता है, जिसमें अनुराधापुर और पोलोन्नारुवा जैसे प्राचीन साम्राज्यों में सिंहली वंश का शासन था।ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में मौर्य सम्राट अशोक के पुत्र महेन्द्र और पुत्री संघमित्रा के आगमन के साथ यहाँ बौद्ध धर्म का आगमन हुआ। 

सोलहवीं शताब्दी में यहाँ पुर्तगालियों ने आक्रमण किया और बहुत सारे मंदिरों को तोड़ दिया, जिनकी मूर्तियाँ स्थानीय लोगों ने ज़मीन में अथवा पेड़ों के तनों में छिपाकर रख दीं और सैकड़ों वर्षों के बाद उन मंदिरों का पुनरुद्धार किया गया। 17वीं सदी में यहाँ डच आये और 1802 ईस्वी से अंग्रेजों ने इस पर शासन किया। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अन्य कई देशों की तरह 4 फरवरी 1948 को श्रीलंका को भी अंग्रेजों से स्वतंत्रता मिली।पहले इसका नाम सीलोन था, 1972 में देश एक गणराज्य बना और इसका नाम बदलकर लंका किया गया। 'श्रीलंका' नाम  1978 में अपनाया गया। पच्चीस वर्षों तक श्रीलंका में अल्प संख्यक तमिल और बहु संख्यक सिंहल जातीय समूहों के मध्य गृहयुद्ध चलता रहा, जो 19 मई 2009 को समाप्त हुआ। प्रशासकीय रूप से श्रीलंका नौ राज्यों में बंटा हुआ है। ये राज्य कैंडी, अनुराधापुर, जाफ़ना, त्त्रिंकोनमल्ली, कुरुनगल, गाल्ल, उवा, रतनपुर और कोलंबो हैं। इन प्रान्तों में कुल पच्चीस जिले हैं।

माधवानंद जी ने बताया, हिंदू पौराणिक इतिहास के अनुसार श्रीलंका को शिव ने बसाया था। भगवान शिव की आज्ञा से विश्वकर्मा देव ने पार्वती देवी के लिए यहाँ एक स्वर्ण महल बनाया था। ऋषि विश्रवा ने शिव से छल से लंका को माँग लिया था। पार्वती ने शाप दिया कि एक दिन शिव का अंश उस महल को जलायेगा। विश्रवा ने लंकापुरी अपने पुत्र कुबेर को दी, पर रावण ने उसे निकाल कर स्वयं को वहाँ का राजा बनाया। कुबेर रावण के सौतेले भाई थे। 

श्रीलंका के अंतर्राष्ट्रीय रामायण अनुसंधान केंद्र और पर्यटन मंत्रालय ने रामायण से जुड़े पचास स्थानों का पता लगाया है। जिनमें से कुछ अशोक वाटिका, राम-रावण युद्ध भूमि, रावण की गुफा, उसका महल आदि हैं। श्रीलंका में बौद्ध और हिंदू धर्म की साझा परंपरा रही है। शिव के पुत्र कार्तिकेय यहाँ के सबसे लोकप्रिय देवता हैं। इनकी पूजा न केवल तमिल करते हैं, बल्कि सिंहली व बौद्ध भी करते हैं। यात्रा प्रबंधक ने बताया, अगले छह दिनों में हमें पाँच विभिन्न स्थानों में रहना है। दिन भर घूमने के बाद शाम को होटल पहुँचना है और अगले दिन नाश्ते के बाद अगले स्थान के लिए रवाना होना है। उन्होंने रास्ते में रामायण से जुड़ी सुंदर कथाएँ सुनाते हुए महामंत्र का जाप व कीर्तन भी करवाया। उन्होंने बताया, हनुमान जी को द्रोणगिरी स्थित संजीवनी पर्वत पर दो बार जाना पड़ा था। एक बार श्री राम व लक्ष्मण दोनों अचेत हो गये थे, तब जाम्बवन्त ने उन्हें भेजा था। दूसरी बार वैद्य सुषेण ने केवल लक्ष्मण के लिए संजीवनी बूटी लाने को कहा था। हनुमान चार औषधियाँ लाये थे - विशल्य कर्णी, मृत संजीवनी, संधानी तथा सुवर्ण कर्णी। प्रयोग के बाद जिस स्थान पर औषधियाँ लायी गई थीं, वहीं आज संजीवनी पर्वत है। आज भी वहाँ कई जड़ी-बूटियाँ उगती हैं, जिन पर वैज्ञानिक शोध भी चल रहे हैं। एक किवदंती के अनुसार हनुमान ने बाद में वह शिखर उछाल दिया तो वह कंबोज देश में जाकर उल्टा गिरा।इतनी सारी जानकारी प्राप्त करते हुए हम शाम की चाय के लिए रुके। देर शाम को हम रिज़ौर्ट पहुँच गये। 


शुक्रवार, अक्टूबर 21

दादी ! प्यारी दादी


दादी ! प्यारी दादी

मेरे बचपन की मधुर यादों में एक याद यह भी है, मेरे द्वारा अपनी दादीजी को रामायण (रामचरितमानस) पढ़कर सुनाना. भगवान राम पर उनकी पूरी आस्था थी. पहले दीदी से फिर मुझसे रामायण सुनती थीं. हमारे जाने के बाद छोटी भाभी से सुना करती थीं. आज सोचती हूँ तो आश्चर्य होता है, मैं उस समय कितना सत्य मानती थी इस कथा को और दादीजी वह तो पूरी डूब जातीं थीं. पर उनके लिये शायद सत्य-असत्य का प्रश्न ही नहीं था, वह समर्पित थीं इस भावना को कि भगवान की कथा को सुनने से बढ़कर कोई पुण्य नहीं. मैं पढ़ती जाती थी, पढ़ती जाती थी और कई बार तो जब काफ़ी छोटी थी तो पढ़ा हुआ एक भी शब्द समझ में नहीं आता था. फिर मैं पेज गिनती और दादी जी कहतीं, बस.. अब तुम थक गयी होगी.

दशहरे के दिन या उससे कुछ दिन पूर्व हम लंका कांड पढ़ना शुरू करते. दशहरे के दिन रावण की मृत्यु का वर्णन सुनाती तो उनकी आँखों में, नहीं उनकी आँखों में विश्वास नहीं दिखाई देता था बस वह संतुष्ट लगती थीं. उनकी एक आँख तो बचपन में ही चेचक के कारण जाती रही थी, दूसरी की रोशनी भी घटती जा रही थी. सहारनपुर के निकट  चमारीखेडा आंखों के अस्पताल में, जहाँ मैं अपने पिता के साथ साईकिल पर बैठकर उन्हें देखने गयी थी, २२ किमी० की वह यात्रा और जीवन में पहली और अंतिम बार गाँव में एक रात बिताने का अवसर आज तक याद है. सुबह-सुबह रहट पर जाकर हाथ मुँह धोया था. बाद में भवानी अस्पताल में  तथा सीतापुर में भी उनकी आँखों का इलाज कराने की कोशिश तो की गई थी पर सफलता नही मिली.

मै जब कॉलेज में पहुँच गयी तो लगता था कि अब रामायण पढ़कर सुनाऊं तो पहले जैसी बात नहीं रहेगी, जबकि तब मैं पहले से कहीं अच्छी तरह समझ सकती थी या समझा सकती थी. पर एक तो तब समय नहीं मिलता, कभी उनसे मिलने भी जाती तो यह याद ही नहीं रहता और दादीजी भी कभी नहीं कहती थीं. फिर विवाह के बाद तो उनसे मिलना साल में या दो साल में एक बार होता था. वह जैसे जैसे वृद्ध होती जा रही थीं आँखें बिल्कुल ही नहीं देख पाती थीं, उनकी मृत्यु भी इसी कारण हुई, आज उनकी बहुत सी यादें स्मृति पटल पर दस्तक दे रही हैं. कल रात बरसों बाद उन्हें स्वप्न में देखा. हम जिन पूर्वजों के कारण इस दुनिया में आते हैं उन्हें ही भूल जाते हैं, हमारी स्मृति बहुत अल्प है.
दादीजी हमें बताती थीं कि जब उनकी शादी हुई तो उनकी सासूजी उनकी परीक्षा लेने के लिए उन्हें कोई भी एक काम में लगाने के बाद जल्दी ही दूसरा काम बता देतीं थी, जैसे कि वह आटा गूँथ रही हैं तो उन्हें कहती जा एक गिलास पानी ले आ. वह आटा गूँथना छोड़ कर फौरन पानी देने पहुंच जाती. उनका कहना था कि वह कभी किसी काम के लिए न नही करतीं थीं, उनकी सासूजी का पूरा नियंत्रण था उन पर.

दादीजी हमें कहानियाँ भी सुनाती थीं, दया करने वाली चिड़ियों और एहसान फरामोश चुहियों की कहानी. एक राजा और और उसकी सात रानियों की कहानी. एक अनार सौ बीमार वाली कहानी भी सुनाती थीं, हर मंगलवार को  हनुमान चालीसा भी मुझसे सुनती थीं.

यह भी उनके बारे में सुना था कि उन्हें बाहर जाने के लिए कपड़े बदलने में जरा भी आलस्य नहीं आता था, भले ही दिन में तीन चार बार कपड़े क्यों न बदलने पड़ें. और बिना ढंग के कपड़े पहने वह कभी बाहर नही निकलती थीं. आटे के बिस्किट, गली की खुली बेकरी से अपने सामने बनवा के लाती  थीं. उन बिस्कुटों का स्वाद अभी तक किसी ब्रांड के बिस्किट्स में नही आया.

दीदी ने बताया कि बचपन में मथूरो चाचीजी की बेटी लक्ष्मी के घर श्राद्ध का खाना हम बच्चे लेकर नुमाइश कैम्प स्थित उनके घर जाते थे. हलवा, पूड़ी, खीर एक बड़े से टिफिन में भर कर, एक बार हम नुमाइश कैम्प से आते समय थोड़ा दूसरे रास्तों से घूमते हुए घर देर से वापिस आये तो दादीजी ने समझाया कि लडकियां ऐसे इधर उधर नही भटकतीं, सीधे रस्ते से घर आना चाहिए.

मन की आँखो के सामने उनकी तस्वीर चूल्हे में लकडियाँ जलाने के लिए फूंकते हुए आती है या फिर राख से बर्तन साफ़ करते हुए या रामायण सुनते हुए. मुझे उनका अहोई के त्यौहार के दिन बच्चों को एक जगह छिपने को कहकर फिर आवाज देकर बुलाना भी याद है, जिसके बाद हमें प्रसाद मिलता था. पंडित जी घर पर आकर सभी के हाथों में लाल सूत्र बांध जाते थे. अब न वह त्योहार रहे न ही आज बच्चों के पास इतना समय रह गया है.

दादीजी में यह विशेषता भी थी कि कहीं भी उन्हें कोई चित्र बना हुआ दिख जाये तो वह उसे अपनी याददाश्त से कसीदकारी(कढ़ाई)में उतार देती थीं.पर जल्दी ही आँखे खराब हो जाने से यह गुण छुपा ही रह गया. आज उनको याद करते हुए शत शत नमन करने के सिवाय और कुछ भी नहीं कर सकती... हाँ यह कामना जरूर कर सकती हूँ कि वे जहाँ भी हों अपने नए रूप में... खुश रहें और अपने आस-पास खुशियाँ बिखराती रहें.