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सोमवार, सितंबर 16

कल की बातें रहने ही दो

कल की बातें रहने ही दो 

जिसमें ठहरा जा सकता है 

वह केवल यह पल है मितवा, 

कल की बातें रहने ही दो 

कल किसने देखा है मितवा !


आगा-पीछा सोच-सोच के 

मन के हाल बुरे कर आये,  

शगुन-अपशगुन के फेरे में 

मोती से कई दिन गँवाये ! 


मन का क्या है, आज चाहता 

कल उसको ख़ारिज कर देता, 

छोड़ो इसकी चाहत, ख्वाहिश 

हर पल का तुम रस पी लेना !


चिड़िया, बादल, दूब, पवन पर 

स्नेह भरी एक दृष्टि डालो,  

कैसे हो जाता है अपना 

जग को अपना मीत बना लो !



सोमवार, मार्च 29

नए कई सोपान चढ़ने हैं

नए कई सोपान चढ़ने हैं 

कल जो बीत गया 

जीवन की डाली से झर गया फूल है 

अब उसे दोबारा नहीं मिलना  है 

आज तो एक नया फूल

 नए कर्म  के रूप में 

खिलना है

याद की खुशबू समेटे वह नया कर्म 

जीवन को सुवासित करे 

नए क्षितिज हों, पंछी हर दिन नयी उड़ान भरे 

वह अस्तित्त्व इसी आस में 

बढ़ता ही चला जाता है 

कि कौन उसमें नए बीज बोये जाता है 

वाणी वरदान है उसका 

शब्दों से वही उमड़ता है 

फिर हर रात समेटकर अपनी झोली 

सहेज कर उन्हें रख देता है अपने सिरहाने 

अगले दिन उन्हीं से कुछ और गढ़ने हैं तराने 

उसका कोष कभी रिक्त नहीं होता 

जीवन चुक जाता है 

वह परम कभी नहीं चुकता !


हर दिन एक नया सवेरा लेकर आता है 

नया विश्वास, नयी आस लिए 

जाने कौन सा रहस्य खुलने वाला है 

नया खजाना मिलने वाला है 

अनगिनत कोष छिपे हैं प्रकृति के गर्भ में 

जीवन हर रोज नया होता जाता है 

जब अतीत सूखे पत्तों की तरह

झरता चला जाता है !

हर रोज एक नया  अवसर है 

नयी चुनौती भी 

हर दिन पर एक ताला लगा है 

जिसे खोलना है 

नए रंगों को जीवन में घोलना है 

नई राहों पहली बार कदम रखने हैं 

नए कई सोपान चढ़ने हैं 

नए कुछ ख्वाब बुनने हैं !


सोमवार, मार्च 1

मन

मन 

जब भी इबादत में बैठता कोई 

मन पड़ोसी की तरह ताक-झाँक करे 


जाने क्या डर, उसे कौन सी चाहत 

न रहे निज हदों में खुद को चाक करे 


'आज' में रहने का कायल जो बना  

बीती बातें दोहरा नापाक करे 


 कहाँ दूरी दरम्यां रब बंदे के  

मन ख्यालों की दीवार आबाद करे 


कोई पहुँचा वहाँ, जहाँ सन्नाटा  

मन की आदत डराए,हैरान करे 


 बच्चे कभी माँ की शक्ल में आता  

 दे दुहाई दुनिया की बस  बात करे 


जब भी  निकला राह में  उजालों की

 सुना  हकीकत अँधेरों की खाक करे 


जिस इबादत का खिला गुल वर्षों में 

यूँही आकर उसमें सदा फांक करे 

 

सोमवार, नवंबर 25

कल आज और कल

कल आज और कल

फ़िक्र कल की क्यों सताए
आज जब है पास अपने,
कल लगाये  बीज ही तो
पेड़ बन के खड़े पथ में !

मौसमों की मार सहते
पल रहे थे, वे बढ़ेंगे,
गूँज उनकी दे सुनायी
गीत जो कल ने  गढ़े थे !

एक अनुभव एक स्पंदन
सुगबुगाया था मनस में,
एक चाहत लिए आयी
द्वंद्व के इस  बाग बन में !

कर्म को पूजा बनाया
एक गौरव पल रहा था,
ध्यान पूजा अर्चना में
जगत सारा जल रहा था !

चेतना कब मुक्त होगी
भेद सारा छिपा इसमें,
कब तलक चलते रहेंगे
बस एक अंधी दौड़ में !