कल की बातें रहने ही दो
जिसमें ठहरा जा सकता है
वह केवल यह पल है मितवा,
कल की बातें रहने ही दो
कल किसने देखा है मितवा !
आगा-पीछा सोच-सोच के
मन के हाल बुरे कर आये,
शगुन-अपशगुन के फेरे में
मोती से कई दिन गँवाये !
मन का क्या है, आज चाहता
कल उसको ख़ारिज कर देता,
छोड़ो इसकी चाहत, ख्वाहिश
हर पल का तुम रस पी लेना !
चिड़िया, बादल, दूब, पवन पर
स्नेह भरी एक दृष्टि डालो,
कैसे हो जाता है अपना
जग को अपना मीत बना लो !



