आषाढ़ की एक रात
बरस बरस दिन भर
पल भर विश्राम लेते बादल
ठिठक गये हैं अम्बर पर
अँधियारा छाया है नीचे ऊपर
बेचैन होंगे चाँद, तारे भी
झांक लें धरा
गा रहे जो गीत झींगुर,
सुनने
उसे जरा
युगलबंदी मेढकों की
जुगनुओं की सुप्रभा
रातरानी की महक
जो उड़ रही है हर कहीं
रात अंधियारी लुभाती
नम हुई हर श्वास भी !