बन जाता जब मानसरोवर मन का दर्पण
हंस तैरते हैं स्मृति के
कैलाश के उत्तंग शिखरों पर
थम जाती है जीवन चेतना
नहीं भाता जगत का कोलाहल
उहापोह अंतर की
ठहर जाता है आलोक प्रज्ञा का
अनवरत धारा बनकर
गंगा की लहरों का नर्तन
स्वर्ण रश्मियों का फैलाव
तृप्त हुआ मन
नहीं भासता अल्प अभाव
जग यह घाट सरोवर का ज्यों
जीते मरते पल पल प्राणी
रोते हंसते गाते खाते
चेहरे बदल गये हों जैसे
चलती हो कोई दीर्घ कहानी
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शनिवार, अप्रैल 19
मन का दर्पण
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