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बुधवार, फ़रवरी 6

कवयित्री ऋता शेखर मधु का काव्य संसार- खामोश ख़ामोशी और हम में


खामोश, ख़ामोशी और हम की अगली कवयित्री हैं, ब्लॉग जगत की जानी-मानी ऋता शेखर ‘मधु’. ऋता जी वनस्पति शास्त्र की शिक्षिका हैं. काव्य की सभी विधाओं (हाइकू, हैगा, तांका, चोका, कविता, आलेख, लघुकथा, छंद) में लिखती हैं. इस संकलन में इनकी दस रचनाएँ हैं. कृष्ण-राधा का प्रेम, प्रकृति चित्रण, नारी का सौंदर्य तथा उसकी शक्ति, पीढ़ियों का अंतर, जीवन दर्शन, दान की महत्ता, कृष्ण की भगवद्गीता इनकी कविताओं के विषय हैं. अपनी सहज, सरल प्रवाहमयी भाषा में इनकी  कविताएं विषय को कई कोणों से बखूबी व्यक्त करती चली जाती हैं.

थी नार नखरीली बहुत, पर, प्रीत से प्रेरित हुई

वसुधा मिली थी भोर से जब, ओढ़ चुनरी लाल सी
पनघट चली राधा लजीली, हंसिनी की चाल सी
...
भर नीर मटकी को उठाया, किन्तु भय था साथ में
चंचल चपल इत उत निहारे, हो न कान्हा घात में
... ...
तब ही अचानक गगरी में, झन्न से कंकड़ी लगी
फूटी गगरिया, नीर फैला, रह गयी राधा ठगी
..
बोलूं न कान्हा से कभी मैं, सोच कर के वह अड़ी
इस दृश्य को लखकर किसन की, जान साँसत में पड़ी

चितचोर ने झटपट मनाया, अब न छेडूंगा तुझे
ओ राधिके, अब मान भी जा, माफ़ भी कर दे मुझे
...
..
ये प्रेम की बातें मधुरतम, सिर्फ वो ही जानते
जो प्रेम से बढ़कर जगत में और कुछ न मानते

ऋतुराज को आना पड़ा है

फिर वाटिका चहकी खुशी से, खिल उठे परिजात है
मदहोशियाँ फैली फिजाँ में, शोखियाँ दिन रात है
...  ...
मीठी बयारों की छुअन से, पल्लवित हर पात है
ना शीत है ना ही तपन है, बौर की शुरुआत है
.. ..
हुडदंग गलियों में मचा है, टोलियों के शोर हैं
क्या खूब होली का समाँ है, मस्तियाँ हर ओर हैं

पकवान थालों में सजे हैं, मालपुए संग हैं
नव वर्ष का स्वागत करें हम, फागुनी रस रंग हैं

क्षितिज पे धरा ही है,
फलक को झुका रही

किसी की बेबसी का तो, मजाक न उड़ाइए
न आप भी विधाता के, निशाना बन जाइए

सोच समझ कही तो, उँगलियाँ उठाइए
आपकी ओर भी है ये, इसे न भूल जाइए
..
..
लदे वृक्ष फलों से जो, सदा ही वे झुक रहे
क्षितिज पे धरा ही है, फलक को झुका रही

चपल, चंचल चोर

ओ नार नवेली
तुम हो अलबेली
..
मुखड़ा को चुराया चंदा से
बन गयी तुम चन्द्रमुखी
आँखों को चुराया हिरणों से
कहलाई तुम मृगनयनी
...
हंसों की पतली ग्रीवा से
अपनी गर्दन को बना लिया
सफेदी चुरानी थी दूधों से
बैठ उसी में नहा लिया

इतनी सारी चोरी करके
बन गयी तुम रूपवती
यौवन की तरुणाई से
कवि की कविता बनी तुम ‘युवती’
... ..
गजों से चुराई अलमस्त चाल
बन गयी तुम गजगामिनी
..
मीठे स्वर को चुरा लिया
बन गई तुम कोकिलकंठी
...
सितारों की चोरी करके
मांग को अपनी सजा लिया
फूलों से खुशबू चोरी कर
बगिया को अपनी महका लिया

ओ ममतामयी
तुम हो जननी
स्नेह से भरी
प्यार की धनी
ममत्व को कहीं से नहीं चुराया
...
वात्सल्य प्रेम को अमर बनाया
ओ रूपसी
ओ गुणवती
ओ दयावती
क्रोध में चोरी करना नहीं
..
ज्वालामुखी बनना नहीं
रौद्र मुखी कहलाना नहीं

नारी, स्वयंसिद्धा बनो

नारी
तू अति सुंदर है
तू अति कोमल है
सृष्टि की जननी है तू
उम्र के हर पड़ाव पर किन्तु
तेरे नयन गीले हैं क्यों ?
...
तेरा यह क्रन्दन है व्यर्थ
जीती है तू सबके तदर्थ
तू खुद को बना ले इतना समर्थ
तेरे जीने का भी हो अर्थ
...
तेरे भी अधिकार हैं सबके समान
नारी तू महान थी, महान है, रहेगी महान

नारी व्यथा की बातें हो गयीं पुरानी
नए युग में बदल रही है कहानी
... ..
बेटियां होती हैं अब घर की शान
उन्हें भी पुत्र समान मिलता है मान
..
सपने विस्तृत गगन में उड़ते हैं
इच्छाएं पसंद की राह चुनते हैं
नारियों के मुख पर नहीं छाई है वीरानी
वक्त बदल गया, अब बदल गयी है कहानी

आज का दर्द

दो पीढ़ियों के बीच दबा
कराह रहा है आज
पुरानी पीढ़ी है भूत का कल
नई पीढ़ी है भविष्य का कल
...
..
न मानो तो बुजुर्ग रूठते
लगाम कसो औलाद भड़कती
क्या करूं कि सब हंसे
हाथ पर हाथ धरे
सोच रहा है आज
... ...
पुराना कल बोले
मेरी किसी को चिंता नहीं
नया कल बोले
मेरी कोई सुनता नहीं
सुन सुन ये शिकवे
कान अपने
सहला रहा है आज
... ..
दोनों कल चक्की के पाट
उनके बीच पिसते स्वयं को
साबुत बचा रहा है आज
.. ..
परम्परा मानता जर्जर कल
बदलाव चाहता प्रस्फुटित कल
दोनों के बीच चुपचाप
सामंजस्य बिठा रहा है आज
... ..
कल और कल की रस्साकशी में
मन्दराचल पर्वत
बन जाओ तुम आज
कई अच्छी बातें ऊपर आएँगी
बीते कल का प्यार बनोगे
आगामी कल का सम्मान

आत्मा की बेड़ी

आत्मा है
बेड़ी रहित
अमर उन्मुक्त
अजर अनंत
.. ..
जगत की चौखट पर
रखते ही कदम
आरम्भ होती
बेड़ियों की श्रृंखला
.. ..
जन्म लेते ही
स्वतः जाती है जकड़
रक्त संबंध की बेडी
प्यार से निभाएं अगर
रहती है रिश्तों पर पकड़
.. ..
कुछ बेड़ियाँ होती भीषण
फैलाती भारी प्रदूषण
वे हैं-
कट्टर धर्म की बेड़ी
जातीयता की बेड़ी
अहम की बेड़ी
जलन की बेड़ी
.. ..
जीवन विस्तार को भोग
होगे पंचतत्व में विलीन
आत्मा फिर होगी
बेड़ी रहित
स्वछन्द और मुक्त

महादान

रखना था वचन का मान
दिव्य उपहार कवच कुंडल का
कर्ण ने दे दिया दान
अनोखे दान को मिला स्थान
दान कार्य जग में बना महान
... ...
विद्या दान वही करते
जो होते स्वयं विद्वान
धनदान वही करते
जो होते हैं धनवान
..
रक्त दान सभी कर सकते
क्योंकि सभी होते रक्तवान
.. ..
रक्त कणों का जीवन विस्तार
है सिर्फ तीन महीनों का
क्यों न उसको दान करें हम
पायें आशीष जरुरतमंदों का
.. ..
रक्तदान सा महादान कर
जीते जी पुण्य कमाओ
नेत्र सा अमूल्य अंग दान कर
मरणोपरांत दृष्टि दे जाओ

बारिश की प्रथम बूंद

घटा छाई घनघोर सखी री
नाचे मन का मोर

बूंद बूंद बरसा नीर सखी री
तन मन हुआ विभोर
.. ..
खिले सुमन सुंदर सखी री
जी चाहे लें बटोर
.. ..
आये किसी की याद सखी री
क्या संध्या क्या भोर
.. ..
बूंद बन गयी धारा सखी री
भूले ओर और छोर

आ झूला झूले सखी री
छू ले गगन की पोर

गीता प्राकट्य

बालवृद्ध नर नारी जाने
कथाओं का संग्रह है भारत
उन कथाओं में महाकथा है
नाम है जिसका महाभारत
..
सबस बड़ा युद्ध धरती का
रणभूमि बन गया कुरुक्षेत्र
कौरव-पांडव का भिडंत हुआ
युद्धभूमि कहलाया धर्मक्षेत्र

युद्धक्षेत्र में किया अच्युत(कृष्ण)ने
दुविधा का समाधान
दिया उपदेश सांसारिकता का
वही बना गीता का ज्ञान

गान हुआ श्रीविष्णु के मुख से
श्री-मद-भगवद-गीता बना
पवित्र, श्रेष्ठ और महान

ऋता शेखर ‘मधु’. की कविताएँ पढ़ते और लिखते हुए एक मधुर अहसास से अंतर भरा रहा, आशा है आप सभी सुधी पाठक गण भी इनका आनंद उठाएंगे. इनका इमेल पता है-hrita.sm@gmail.com










सोमवार, जनवरी 21

कवि रजनीश तिवारी का काव्य संसार- खामोश,ख़ामोशी और हम में


खामोश, ख़ामोशी और हम के अगले कवि हैं, शिक्षा और पेशे से इलेक्ट्रिकल इंजीनियर श्री रजनीश तिवारी, तिवारी जी को लेखन के साथ फोटोग्राफी भी भाती है, इस संकलन में इनकी छह कवितायें हैं.
सभी जीवन के विविध रंगों को उजागर करती हैं.
पहली कविता एक बूंद में कवि सुबह सवेरे ओस की एक बूंद को देखकर हुई अनुभूति को व्यक्त करता है, जीवन का एक रहस्य जैसे वह बूंद परत दर परत खोलती जाती है.
एक बूंद

ओस की इक बूंद
जमकर घास पर
सुबह सुबह
मोती हो गयी
...
..
फिर वो बूंद
सूरज की किरणों
पर बैठ उड़ गयी
..
कुछ पलों का जीवन
और दिल पर ताजगी भरी
नमकीन अमिट छाप
एक बूंद छोड़ गयी
..
एक बूंद में होता है सागर
..
भरा होता है एक बूंद में
दर्द जमाने भर का
..
प्यार की एक बूंद का नशा उतरता नहीं
..
एक बूंद जिंदगी बना देती है
बूंद-बूंद चखो जाम जिंदगी का
बूंद बूंद जियो जिंदगी
जीवन में लोग अक्सर धोखा खाते हैं, क्योंकि मानव जो है वह उसे स्वीकार नहीं जो होना चाहता है, वही दिखाने का प्रयास उसे छल करने पर विवश कर देता है, इसी कटु सच्चाई को बयान करती है दूसरी कविता छलावा   
छलावा

तुम्हें जो खारा लगता है
वो सादा पानी होता है
... ..
मेरे आंसू क्या सस्ते हैं
जो गैरों के दर्द पर रोयें
दिल नहीं दिखावा है
वही भीतर से रोता है
...
परेशान खुद से ही हूँ मैं
तुम्हारी सुध मैं कैसे लूँ
मुझे फुर्सत कहाँ, तुम्हारी
तकलीफों पर मैं रोऊँ

होता वो नहीं हरदम
नजरों से जो दिखता है
..
खुद को दोष क्या दूँ मैं
शिकायत क्या करूं तेरी
मुझे हर कोई मुझ जैसा
खुद में खोया लगता है

सपने देखना किसे नहीं भाता, कुछ तो सारा जीवन सपनों को देखने में ही बिता देते हैं..कवि ने सपनों का कच्चा चिट्ठा खोल कर रख दिया है सपनों का हिसाब-किताब नामक कविता में-

सपनों का हिसाब-किताब

कल रात बैठा लेकर
सपनों का हिसाब-किताब
अरमान, तमन्नाएँ, सपने
और हासिल का कच्चा चिट्ठा लिए
सोचता रहा कहाँ खर्च किया
पल दर पल खुद को
....
न जाने कितने पन्ने भरे मिले
सपने में ही जीने की दास्ताँ लिए
...
कई मौसम चले गए
टूटे बिखरे सपनों को समेटने में
.. ..
कई बार आंधी-तूफान और बारिश में
सपनों की पोटली सम्हालने
और बचाने में वक्त लगा
...
न जाने कितनी बार बाढ़ में
सपनों को दबाए हुए बगल में
मीलों और बरसों बहता रहा हूँ
... ...
कई बार ऊब भी हुई है सपनों से
तब गठरी छोड़ कर बस की खिडकी से
नीले अनंत आसमान में देखने का दिल किया
...
तैयारी या इंतजार में रहे अक्सर
और हर बार कुछ पल ही जिए
सपनों को सच होता देखते
हाँ, सपनों का खाता खत्म न हुआ

स्मृतियों को बार बार जीना मानव का स्वभाव है, सजीव या निर्जीव जिनसे उसका नाता रहा हो उसकी यादों में वह जिन्दा रहता है, कुछ ऐसा ही अनुभव कवि करता है दिल का रिश्ता में
दिल का रिश्ता

आज छूकर देखा
कुछ पुरानी दीवारों को
..
आज एक पुराने फर्श पर
फैली धूल पर चला
उस परत के नीचे
अब भी मौजूद थे
मेरे चलने के निशान
...
किये साफ कुछ वीरानगी के दाग
बिखरे हिस्सों को समेटा
...
जी उठी दीवार
साँस लेने लगी जमीन
..
खट्टी-मीठी यादों की गंध
फ़ैल गयी हर कोने
दिल का रिश्ता
सिर्फ दिल से ही नहीं
दीवारों से भी होता है

जीवन विरोधी मूल्यों से बना है, काले की पृष्ठ भूमि पर ही सफेद उभर कर आता है, कवि का होना इन्हीं विरोधी भावों पर आधारित है, अपना परिचय देते समय वह एक साथ शांति का सागर और ज्वालामुखी दोनों होना स्वीकारता है
परिचय

पर्वत मैं हूँ स्वाभिमान का
मैं प्रेम का महासमुद्र हूँ
मैं जंगल हूँ भावनाओं का
एकाकी मरुथल हूँ मैं,
... ...
हूँ घाट एक रहस्यों का
संबंधों का महानगर हूँ मैं

झील हूँ मैं एक शांति की
मैं उद्वेगों का ज्वालामुख हूँ
.. ..

हूँ गुफा एक वासनाओं की
भयाक्रांत वनचर हूँ मैं

दावानल हूँ विनाशकारी
मैं शीतल मंद बयार हूँ
..

हूँ इस प्रकृति का एक अंश
सूक्ष्म, तुच्छ मनुष्य हूँ मैं,

कशमकश में कवि अपने लिखने की विभिन्न मुद्राओं को अंकित करता जाता है, हर रचनाकार की तरह वह समझ नहीं पाता कभी चाहने पर भी पंक्ति उतरने से इंकार करती है और कभी सहज ही लेखन घटता है
कशमकश

कभी विचार करते हैं क्रन्दन
और फिर मैं लिखता हूँ
... ..
कभी लिखता हूँ तो कुछ उतरता नहीं ख्यालों में
..
मैं कभी महसूस करता हूँ
किसी क्षण का कंपन
...
कभी चलती है कलम बिना किसी झंकार के
..
कभी लिखते हुए महसूस होता है स्याही का नृत्य
..
कभी जो सोच में घटता है, अहसास में नहीं होता
कभी अहसास का चेहरा ही नहीं पढ़ा जाता
... ...
कभी सोच, सिर्फ सोच रह जाती है संवेदना शून्य
...
कभी सोचता हूँ कुछ, लिख जाता हूँ कुछ और
...
कभी लाइनें ही टकरा जाती हैं आपस में
लड़ बैठती हैं और शब्द भाग जाते हैं

इसी कशमकश में रोज
किसी कविता का करता हूँ नामकरण
या फिर उसे देता हूँ मुखाग्नि  


कवि रजनीश तिवारी जी की कविताएँ काव्य का सुखद अनुभव तो कराती ही हैं, जीवन की सच्चाइयों से भी रूबरू कराती हैं, जीवन सूत्रों को प्रस्तुत करती हैं. आशा है आप सभी सुधी पाठक गण भी इनका रसास्वादन कर आनन्दित होंगे. इनके ब्लॉग का नाम है रजनीश का ब्लॉग- http://rajneesh-tiwari.blogspot.com
इनका इमेल पता है- rajneeshtiwari@live.in