पिता
मिलते ही धर देते हैं
हाथ पर कुछ नोटों की सौगात
जैसे हो हमारी अमानत उनके पास
सौंप कर जिसे निश्चिन्त होना चाहते हों...
आठ दशकों से देखे होंगें
उतार-चढ़ाव न जाने कितने
पर आँखें नव शिशु सी स्वच्छ हैं..
झाड़ दिये हैं शायद उदास पंख
और उड़ते हैं बेपंख ही
भीतर के आकाश में...
माँ के बिना भी पूर्ण नजर आने लगे हैं पिता
माँ जैसे उनके भीतर समा गयी हैं
पिलाते अपने हाथों से बनाकर चाय
बिस्तर लगाते
सिखाते छोटी-छोटी बातें..
थमाते घर गृहस्थी की छोटी छोटी वस्तुएँ
पिता सजग हैं और संतुष्ट भी !