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शुक्रवार, जुलाई 28

थम जाता सुन मधुर रागिनी

थम जाता सुन मधुर रागिनी

कोमल उर की कोंपल भीतर
खिलने को आतुर है प्रतिपल,
जब तक खुद को नहीं लुटाया
दूर नजर आती है मंजिल !

मनवा पल-पल इत-उत डोले
ठहरा आहट पाकर जिसकी,
जैसे हिरण कुलाँचे भरता
थम जाता सुन मधुर रागिनी !

जिसके आते ही उर प्रांगण
देव वाटिका सा खिल जाता,
हौले-हौले कदम धरे जब
मन नव कुंदन बन मुस्काता !

स्वयं ही दूर-दूर रहे हम
दुःख छाया में जन्मों बीते,
सुख बदली बन वह आता है
एक पुकार उठे अन्तर से !

रह ना पाए अनुपम प्रेमिल
पावन है वह करता पावन,
अर्पित मन को करना होगा
युग-युग से हो रहा अपावन !

आह्लादित है सृष्टि प्रतिपल
खिला हुआ वह नील कमल सा,
धरे धरा बन छाँव गगन की
पंछी सा नव सुर में गाता !

कोई उसका हाथ थाम ले
बरबस कदमों में झुक जाये,
दूरी नहीं भेद नहीं शेष
तृप्त हुआ सा डोले गाये !