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बुधवार, अप्रैल 1

जग इक अनुभव

जग इक अनुभव 


उर की सरिता बहती जाये 

सागर से यह कहती जाये, 

तेरा-मेरा साथ पुराना 

तुझसे हुई, तू ही बुलाये !


आना सुख था, जाना भी है 

किया पसार, समेट रही अब, 

जग इक अनुभव, कब यह दुख है?

बिखरे सूत्र लपेट रही अब ! 


विमल दृष्टि दे सृष्टि मनोहर 

देव सहायक नित सुखदायक, 

भर जाती जब तुष्टि ह्रदय में

बनती समर्थ आत्मा नायक !




शुक्रवार, जनवरी 23

वसंत पंचमी

वसंत पंचमी  



खिले कुसुम महकी अमराई 

  मधु वासंती पवन बही है,  

ऋतुराजा का स्वागत करने 

 क़ुदरत सारी निखर रही है !


 सरसों फूली खलिहानों में 

कण-कण जीवंत हुआ भू का, 

 प्रीत जगाये रस अंतर में

नव उमंग नव भरे ऊर्जा ! 


सृष्टि में संगीत संजोने 

स्वरदेवी का हुआ अवतरण, 

कर वीणा तारों को झंकृत 

ज्ञान ज्योति का किया प्रस्फुटन !


बुधवार, अक्टूबर 15

मुक्ति और पीड़ा


मुक्ति और पीड़ा 


नहीं है ज्ञात, कुछ भी 

अज्ञात बहुत भारी है 

सृष्टि चला रहा है कौन 

किसने की प्रलय की तैयारी है? 


कौन पीड़ा के बीज बोता 

कौन अहंकार जगाता 

कौन करता मुक्ति की आकांक्षा

कौन ठगा से देखता रहा जाता!


हर दर्द एक पुकार ही तो है 

जो समाधान के लिए उठी है 

हर दुख एक द्वार ही तो है 

जो मुक्ति की ओर ले जाने आया है !


वह कोई भी हो 

सदा साथ-साथ चलता है 

जिसकी आँखों में 

ब्रह्मांड का स्वप्न पलता है !


रविवार, मार्च 23

भीतर कोई राह देखता

भीतर कोई राह देखता 


ऊपर वाला खुला राज है

फिर भी राज न खुलने वाला, 

देखा ! कैसा चमत्कार है 

या फिर कोई गड़बड़ झाला !


कण-कण में वह व्याप रहा है 

छिपा हुआ सा फिर भी लगता, 

श्वास-श्वास में वास उसी का 

दर्शन हित मीलों मनु चलता !


ढूँढ रहा जो गर थम जाये

जाये ठहर चाहने वाला,

भीतर कोई राह देखता 

 जग जाता गर सोने वाला !


देख लिया ? नहीं, देख रहा है !

इस पल के बाहर न मिलता, 

पल-पल सृष्टि नवल हो रही 

नित्य ही सब कुछ रचा जा रहा !


राज अनोखा जाना जिसने

वही ठगा सा खड़ा रह गया, 

ख़ुद को देखे या अनंत को 

भेद न कोई बड़ा रह गया !


मंगलवार, फ़रवरी 14

हम एकाकी

हम एकाकी


प्रेम अगर पाया भीतर तो

मिले यह सृष्टि प्रेम लुटाती, 

स्वयं से भी जो न जुड़ पाया

पीड़ा मन की रहे सताती I


भीतर जाकर झोली भर ली

वही लुटाता  यहाँ  आनंद,

जिसके साथ सदा रब रहता

वही बहाता  मदिर  मकरंद !


खुद के साथ रहे जो अविरत

खुद से नाता जोड़ा जिसने,

वही दूसरों से जुड़ सकता

खुद को मीत बनाया जिसने !


खुद का जब तक साथ न पाले

हर कोई एकाकी जग में,

खुद  की भीतर थाह न पाले

हर कोई प्यासा इस मग में !


जग में आते हम एकाकी

 संगी-साथी पल दो पल के,

जग से जाते हम एकाकी

 कौन चला है संग किसी के !


सोमवार, मार्च 28

स्वप्न और जागरण

स्वप्न और जागरण 

मन केवल नींद में  ही नहीं देखता स्वप्न

दिवा स्वप्न भी होते हैं 

जागती आँखों से देखे गए स्वप्न 

बात यह है कि 

खुद से मिले  बिना नींद खुलती ही नहीं 

या कहें कि खुद से बिछुड़ना 

है एक स्वप्न  

जो हर कोई देख रहा है 

अंतर में जगना जब तक नहीं हुआ 

 सोया ही हुआ है

अर्थात् इस या उस स्वप्न में खोया ही हुआ  है 

हर कोई  निर्माता है

निज सृष्टि का 

 दृष्टिकोण, विचार, मान्यताओं 

और धारणाओं की दीवारों से 

अपना महल सजाता है 

देखकर भी असलियत को 

नज़रें चुराता है 

जो करणीय है वह कल पर टाले जाता है 

हर कोई  क़ैद है 

अपने ही बनाए मायाजाल में

खुद से बिछुड़े हुए हम इक दिन तो जागेंगे 

उस क्षण से पूर्व नहीं हमारे दुःख भागेंगे 

स्वयं की अनंतता का अनुभव ही काम आएगा 

भीतर का प्रकाश ही ज्योति दिखाएगा ! 


सोमवार, फ़रवरी 14

प्रेम पंख देता है मन को



प्रेम पंख देता है मन को
प्रेमिल मस्ती में डोले मन
क्या डोलेगी यह पुरवैया,
प्रेम पुलक बन लहराए तन
शरमाए सागर में नैया !

प्रेम पंख देता है मन को
उड़ने का सम्बल भर देता,
पल में पथ के कंट जाल हर
फूलों कलियों से भर देता !

हृदय गुफा का द्वार खोलता
अमृत घट बना मधु बरसाए,
सहज जगाता दिव्य चेतना
‘कोई है’ जो नजर न आये !

प्रेम से ही सृष्टि का वर्तन
इससे पूरित जग का हर कण,
प्रेम ऊर्जा व्याप रही है
यही सँवारे प्रतिपल जीवन !

एक प्रेम की ही सत्ता थी
जब नहीं था कुछ भी सृष्टि में,
होता एक अनेक प्रेम वश
ज्यों बदली बदले बूँदों में !

जैसे माँ निज अंग से रचे 
बाल को प्रेम सुधा पिलाती,
प्रेम की धार बहती अविरल
जग के कण-कण को नहलाती !

वही कृष्ण राधा बन डोले
प्रेम रसिक बन अंतर खोले
मीरा की वीणा का सुर वह
बिना मोल के कान्हा तोले !

बालक,  युवा, किशोर, वृद्ध हो
हुआ प्रेम से ही पोषित उर  
हर आत्मा की चाहत प्रेम 
खिलती भेंट प्रीत की पाकर  !

गुरुवार, दिसंबर 30

नए वर्ष में नए स्वप्न हों

नए वर्ष में नए स्वप्न हों 


उजाला ही उजाला हर सूँ 

हम आँखें मूँदे बैठे है, 

प्रकृति-पुरुष का नर्तन चलता 

हम अँधियारे में बैठे हैं !


शिव का तांडव लास्य उमा का 

दोनों  साथ-साथ चलते हैं,  

भूकंप कहीं तूफां भीषण 

कहीं सुगंधित वन खिलते हैं !


यह सृष्टि बनी  है क्रीडाँगन 

दिव्य चेतना शुभ मेधा की, 

नित्य नवीन रहस्य खुल रहे 

है अनंत प्रतिभा दोनों की !


हो जाए लय मन इस क्रम में 

श्वास-श्वास यह भरे प्रेम से, 

यही ऊर्जा बिखर चमन में 

भाव तरंग, वाणी, कृत्य से !


नए वर्ष में नए स्वप्न हों 

नव उमंग कुछ नया हर्ष हो, 

छोड़ दिया जिसको  भी पथ में 

साथ उसे लें यह विमर्श हो !


गुरुवार, मई 6

एक दिन

एक दिन  
अनंत है सृष्टि का विस्तार
अरबों-खरबों आकाशगंगाएं हैं अपार
जिनमें अनगिनत तारा मण्डल 

और न जाने कितनी पृथ्वियाँ होंगी 

कितने सौर मण्डल

 जानते हैं इस ब्रह्मांड के बारे में कितना कम 

ब्रह्मांड को छोड़ें तो इस पिंड से भी 

कितने अनभिज्ञ हैं हम 

जैसे जल में मीन 

वैसे हवा में यह तन 

प्राण ऊर्जा जो इस देह को चलाती है 

श्वास के माध्यम से भी भीतर आती है 

शक्ति से भरती है 

भोजन को पचाती 

रक्त को गति देती है 

देह टिकी है जिस पर 

पर आज एक विषाणु ने रोक दिया है 

उसका निर्बाध  विचरण 

फिर भी याद रहे 

ऊर्जा शाश्वत है विषाणु नश्वर 

उसे हराया जा सकता है 

भय को त्याग कर 

स्वयं को सशक्त बनाया जा सकता है 

एक न एक दिन मानवता उससे मुक्ति पा ही लेगी 

उस दिन फिर से गूंजेगी स्कूलों में बच्चों की आवाजें 

और उनके गीतों से फिजा महकेगी ! 


सोमवार, मार्च 15

मानव में खुद छुपा चितेरा

मानव में खुद छुपा चितेरा 


महायज्ञ सृष्टि का अनोखा 

शुभ पंचतत्व आहुति देते,

इक-दूजे में हुए समाहित   

रूप अनेकों फिर धर लेते !


जल में पावक, वायु गगन में 

भू  में रहते सभी समाए, 

भव्य महान प्रपंच रचा है 

पंछी,पशु, प्राणी जनमाये !


मानव में खुद छुपा चितेरा 

जिसने रच डाला यह आलम, 

उसके द्वारा भी करवाता 

बड़े-बड़े अनगिन  आयोजन !


सिर पर छप्पर, अन्न क्षुधा हित 

शिक्षा और स्वास्थ्य के साधन,  

कोई भय से न कंपता हो 

हर कोई पाए अपनापन  !


तन-मन स्वस्थ बनें जन-जन के 

यही परम का इक सपना है  , 

है सामर्थ्यवान जो जग में 

औरों का दुख ही हरना  है !


निज की खातिर बहुत जी लिए 

अब औरों हित जीना सीखें, 

जगती के इस महा हवन में 

स्वयं पावन आहुति सौंपें !

 

सोमवार, जनवरी 18

कोई जानता है

 कोई जानता है
मन के ‘परदे’ पर 
यादों की फिल्म चलती है 
‘वह’ उसी तरह रहता है अलिप्त 
जैसे आँख के पर्दे पर 
चित्र बने अग्नि का तो जलती नहीं 
न ही भीगती समुन्दर की लहरों को घंटों देखते हुए 
स्मृतियों के बीज हमने संभाल कर रखे हैं 
वर्तमान और अनेक जन्मों के 
उन्हें स्वयं ही बोते हैं मन की धरा पर 
फिर यदि बीज हुआ दुख की याद का तो 
काँटों के वृक्ष उगाते हैं 
और देखते हैं जंगल उठते-बढ़ते 
जो हमारी ही संतति है 
उन्हीं से सुखी-दुखी होते हैं 
जब सृष्टि का पालन किया तो संहार से क्यों डरते हैं 
उखाड़ फेंकें यदि उन स्मृतियों के वनों को 
या देखते रहें उस परदे की तरफ 
जो सदा बना रहता है अलिप्त 
 पूर्व फिल्म के, दौरान या बाद में भी ! 

गुरुवार, दिसंबर 31

सांझी धरती गगन एक है

सांझी धरती गगन एक है
है सृष्टि क्रम अनंत काल से 
चाँद-सितारे भी युग-युग से, 
किन्तु पुरातन कभी न होते 
पल-पल खुद को नूतन करते !

जंगल, वन, पर्वत, पठार भी 
मृत होकर नव जीवन धरते, 
सिन्धु पुन: पुन: हो आप्लावित 
बादल नित नव सर्जन करते !

पशु, पंछी, मानव के तन भी
जन्मते, गिरते, पुन: पनपते, 
किन्तु एक से सब दुनिया में 
मन को इक चौखट में रखते ! 

अपना-अपना खुदा लिए हर 
मन न स्वयं को कभी बदलता, 
धर्म-जातियों के नामों  पर 
अब भी भीतर नफरत रखता !

जाने क्या हासिल कर लेगें  
अब भी रक्त बहाया करते, 
नए वर्ष में यही सिखाने 
जगत घिरा सांझी पीड़ा से ! 

सांझे सुख-दुख हैं दुनिया के 
सांझी धरती, गगन एक है,
एक ही रब है एक चेतना 
नाम-रूप धारे अनेक है ! 
 

शुक्रवार, दिसंबर 4

लहराएगा मुक्त गगन में

लहराएगा मुक्त गगन में


अभी खोल में ढका बीज है 
अभी बंद है उसकी दुनिया, 
उर्वर कोमल माटी  पाकर 
इक दिन सुंदर वृक्ष बनेगा !

जल से निर्मल भरे ताजगी
धरती से गर्माहट उर में, 
नृत्य पवन से भर-भर पल्लव  
लहराएगा मुक्त गगन में !

शाखाओं पर पंछी आकर 
बैठेंगे मृदु गान सुनाने,
फूलों के खिलने की आशा 
उस पादप के मन अंकुराने !

वही बीज फिर फूल बना नव
खिल जाएगा रूपरंग में, 
भँवरे तितली कीट अनेकों 
गुनगुन गाकर उसे रिझाएं 

मिलन घटेगा अस्तित्व से 
फल बनकर फिर बीज धरेगा, 
जहाँ से आ क्रीड़ा रची यह 
उस भू में रोपा जाएगा !

छुपा बीज में राज सृष्टि का 
खिलकर मुक्त हास जो बांटे, 
तृप्त हुआ वह उर मुस्काता 
सहज गुजर जाता इस जग से !

बुधवार, दिसंबर 2

पल-पल है चेतना नई सी

पल-पल है चेतना नई सी


ग्रह - नक्षत्र, धरा,रवि, चाँद 

पादप, पशु, नदिया, चट्टान,  

पवन डोलती तूफ़ां उठते 

सृष्टि पूर्ण मानव अनजान !


बंधी एक नियम, ऋत, क्रम में 

नित नूतन यह पुनर्नवा सी, 

अंतर घिरा अतीत धूम्र से 

पल-पल है चेतना नई सी !


सुख की चाह रहे भरमाती 

पीड़ा के वन में ले जाए, 

जितनी दौड़ लगे कम पड़ती 

भोला मन यह समझ न पाए !


जाने कब यह क्रम छूटेगा 

मन पर छाया भ्रम छूटेगा, 

ब्रह्मांड से एक हुआ फिर 

निज महिमा का बोध जगेगा !

 

शनिवार, अक्टूबर 24

व्यक्त वही अव्यक्त हो सके

 व्यक्त वही अव्यक्त हो सके 

हे वाग्देवी ! जगत जननी  

वाणी में मधुरिम रस भर दो, 

जीवन की शुभ पावनता का 

शब्दों से भी परिचय कर दो !


भाषा का उद्गम तुमसे है 

नाम-रूप से यह जग रचतीं,

ध्वनि जो गुंजित है कण-कण में 

नव अर्थों से सज्जित करतीं !


शिव-शिवानी अ, इ में समाए

क से म पंचम वर्गीय सृष्टि,

हर वर्ण में अर्थ भरे कई

मिले शब्दों से जीवन दृष्टि !


कलम उठे जब भी कागज पर 

व्यक्त वही अव्यक्त हो सके, 

निर्विचार से जो भी उपजे 

भाव वही प्रकटाये मानस !


हे देवी ! पराम्बा माता 

कटुता रोष, असत् सब हर ले, 

गंगा की निर्मलधारा सम 

रचना में करुणा रस भर दे !


शुक्रवार, जुलाई 3

द्रष्टा

द्रष्टा 

कवि द्रष्टा है 
उसने सत्य देखे हैं 
भुला देने दो सारे शास्त्र 
वह स्वयं शास्त्र है 
भुला देने तो सारा अतीत 
वह नया इतिहास रचेगा 
उससे झरते हैं शब्दों के झरने 
जहां से बनती है सृष्टि 
उसने चुना है वह 
जो कोई अन्य नहीं चुनता !
राही है वह अनजान राहों का 
अनसुलझे रहस्यों का 
बिना चढ़े ही नापी हैं उसने हिमालय की चोटियां 
रोया है उसका मन 
उस कृषक के साथ 
सुख गए हैं जिसके खेत 
वह मुस्काया है वर्षा की पहली बून्द पर 
उस तरह जैसे मुस्काये न कोई 
कोहिनूर मिलने पर !


गुरुवार, जून 18

तू और मैं

तू और मैं 


जैसे कड़ी से कड़ी जुड़ी है इस तरह 
कि कोई जोड़ नजर नहीं आता 
‘तू’ जुड़ा है’मैं’ से उसे भेद जरा नहीं भाता 
‘मैं’ को यह ज्ञात नहीं 
 निज संसार बसाता है
सृष्टि के अहर्निश गूँजते संगीत में 
अपनी ढपली अपना राग सुनाता है 
कभी सुर मिल जाते हैं संयोग से तो 
फूला नहीं समाता
जब बेसुरा लगता है संगीत तो 
अश्रु बहाता है 
  भुला जड़ें गगन में फूल खिलाता है 
 तज भाव तर्क में प्रवीण हुआ जाता है 
 हो सकती है पृथक सुरभि पुष्प से ?
तपन अगन से या किरण सूर्य से ?
पर ‘मैं’ असंभव को संभव कर दिखाना चाहता है !

शनिवार, अप्रैल 18

देव और मानव


देव और  मानव 


कोटि-कोटि ब्रह्मांडों के सृजन का 
जो है साक्षी 
अरबों-खरबों आकाश गंगाओं की रचना का भी 
जिसके सम्मुख प्रतिक्षण
 जन्मते और नष्ट होते हैं लाखों नक्षत्र 
वही जो कहाता है महानायक ! 
शिव ! तांडव नर्तक !

इस अपार आयोजन का
 एक नन्हा सा अंश है वसुंधरा 
 सागरों, वनों, पशु-पंछियों संग 
जिस पर मानव उतरा
सृष्टि चालन में शिव का सहायक 
चाहता तो देव बन सकता था मानव 
किन्तु काल की इस अनंत धारा में 
बहता हुआ हो गया वह दानव !

स्वयं को शक्तिशाली समझ 
अन्य जीवों के प्राणों की कीमत पर 
दुर्बलों पर बल प्रयोग कर 
अंतहीन क्षुधा को 
तृप्त करने हेतु 
धरा का किया निरंकुश दोहन 
हिंसा की प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया 
कर अनवरत युद्धों का आयोजन !

कृषकों से भूमि छीनी 
बच्चों के मुख से दूध 
प्रसाधनों के लिए 
निरीह पशुओं को सताया 
 लोभ की पराकाष्ठा हुई अब 
अपरिमित साधन सिमटते ही जाते  
हजारों आज भूखे ही सो जाते 
अब मौसम भी अपने समय पर नहीं आते 
समय रहते चेत जाये 
इसी में उसका भविष्य समाया है 
सृष्टि का वह रखवाला सचेत करने आया है !