जीवन
इतनी शिद्दत से जीना होगा
जैसे फूट पडती है कोंपल कोई
सीमेंट की परत को भेदकर,
ऊर्जा बही चली आती है जलधार में
चीर कर सीना पर्वतों का
या उमड़-घुमड़ बरसती है
बदली सावन की !
न कि किसी जलते-बुझते
दीप की मानिंद
या अलसायी सी
छिछली नदी की तरह पड़े रहें
और बीत जाये जीवन... का यह क्रम
लिए जाए मृत्यु के द्वार पर
खड़े होना पड़े सिर झुकाए
देवता के चरणों में चढ़ाने लायक
फूल तो बनना ही होगा
इतनी शिद्दत से जीना होगा…!



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