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बुधवार, जून 5

भूटान की यात्रा -३




आज चौथे दिन भी सुबह हम जल्दी उठे और प्रातः भ्रमण के लिए गये. होटल से उतरकर निचली सड़क पर दायीं ओर एक इमारत थी, जिसके चारों ओर कुछ महिलाएं हाथ में माला लिए जप करती हुई परिक्रमा कर रही थीं. दीवार में समान दूरी पर झरोखे बने थे जिसमें किसी देवी या देवता का चित्र लगा था. यहाँ पर लोगों को माला हाथ में लिए सड़क पर चलते भी देखा जा सकता है. साढ़े आठ बजे 'पुनाखा' के लिए रवाना हुए. पौन घंटे बाद 'डेकुला पास' पहुंचे जो नौ हजार फीट की ऊँचाई पर स्थित है. यहाँ एक सौ आठ स्तूप बनाये गये हैं जो दो हजार तीन में शहीद हुए सैनिकों की स्मृति में हैं. उस समय भारत से आतंकवादी आकर यहाँ छिप गये थे, भारत सरकार के कहने पर भूटान की सेना ने उन्हें देश से भागने पर मजबूर कर दिया था. इसी युद्ध में कितने ही भूटानी सैनिक शहीद हो गये थे. हमारा अगला पड़ाव था फर्टिलिटी टेम्पल, जहाँ सन्तान की चाह व उनकी रक्षा की कामना के लिए लोग आते हैं. बच्चों का नामकरण संस्कार भी वहीं किया जाता है. डेढ़-दो किमी चढ़ाई के बाद हम पहाड़ पर स्थित मन्दिर में पहुँचे. इसके बाद बारी थी 'पुनाखा फोर्ट' की,  जहाँ काफी सीढ़ियाँ चढ़ने के बाद हम किले के मुख्य द्वार पर पहुँचे. सामने ही भूटान का राष्ट्रीय ध्वज लहरा रहा था तथा एक विशाल इमारत थी जिसके मध्य में एक विशाल स्तम्भ था. इमारत में दायीं ओर के भाग में सरकारी कामकाज होता है तथा बायीं ओर धर्मगुरू तथा बौद्ध भिक्षु आदि रहते हैं. भूटान में दोनों को समान आदर दिया जाता है. भूटान के संस्थापक गुरू रिनपोचे का यहाँ बहुत सम्मान किया जाता है. गाइड से उनके बारे में कई बातें सुनीं, यहाँ का इतिहास मिथकों से भरा हुआ है. शाम चार बजे हम होटल पहुंचे. पुनाखा में हमारा होटल ज़िन्ग्खोम एक सुंदर रिजार्ट है, यहाँ स्पा भी है ध्यान कक्ष भी. एक पहाड़ पर स्थित इस रिजॉर्ट में कमरे की बालकनी से भी किला दिखाई दे रहा था, जिसे देखकर हम आये थे. निकट ही हाथी के आकार का एक पर्वत था जिसके दोनों ओर से दो नदियाँ आकर किले के आगे कुछ दूर पर मिल जाती हैं. सूर्यास्त के समय किला व सामने बहती नदी अत्यंत मनमोहक दृश्य का सृजन कर रहे थे. शाम को एक घंटा योग अभ्यास किया. भोजन के समय बिजली चली गयी तो एक महिला कर्मचारी ने मोमबत्ती जला दी. डिनर अपने आप ही कैंडल लाइट डिनर में तब्दील हो गया. तभी वर्षा भी होने लगी और वह बात भी पूरी हो गयी कि भूटान में कभी भी वर्षा हो जाती है.



सुबह उठकर कुछ देर टहलते रहे, एक हल्के भूरे रंग के बालों वाला झबरीला कुत्ता हमारे साथ-साथ चलने लगा. योगाभ्यास के लिए ध्यान कक्ष में गये जो बिलकुल खाली पड़ा था. साढ़े नौ बजे हम 'पारो' के लिए निकल पड़े. डैकुला पास में पुन कुछ देर रुकर दोपहर डेढ़ बजे पारो के 'ले मेरिडियन' होटल में आ गये, जहाँ श्वेत वस्त्र ओढ़ाकर हमारा पारंपरिक ढंग से स्वागत किया गया, सेब और दालचीनी का स्वादिष्ट पेय भी दिया. कमरे की खिड़की से नदी दिखाई देती है. बाहर बगीचे में एक स्तूप बना है. यहाँ फूलों की अनगिनत किस्में हैं. गुलाबों के तो क्या कहने, हर रंग के गुलाब इस होटल के सामने वाले बगीचे में लगे हैं. अभी दो रात्रियाँ हमें यहाँ बितानी हैं. भोजन परोसने वाले बैरे बहुत हंसमुख व मेहमानों का आदर करने वाले हैं. कल 'टाइगर नेस्ट' जाना है, जिसके लिए चार किमी चढ़ाई करनी है. सुबह आठ बजे निकलना होगा.

क्रमशः


रविवार, जून 2

भूटान की यात्रा -२


भूटान की यात्रा -२ 


भूटान में पर्यटकों का आना १९७४ में आरम्भ हुआ, जब यहाँ के चौथे राजा जिग्मी सिंग्वाई वांगचुक का राज्याभिषेक हुआ था. इन्होने ही देश को ग्रॉस नेशनल हैप्पिनेस GNH का सिद्धांत दिया. इस सिद्धांत के अनुसार देश के आर्थिक विकास की तुलना में लोगों की ख़ुशी ज्यादा जरूरी है. भूटान की  विकास की परिकल्पना के आधार पर यूएन ने २० मार्च को 'विश्व प्रसन्नता दिवस' भी घोषित किया है. आज भूटान में वर्ष भर पर्यटक आते हैं, यहाँ का प्राकृतिक वातावरण, शुद्ध हवा और सुन्दरता सभी को आकर्षित करती है. साठ वर्ष की आयु होने पर चौतींस वर्षों के शासन के बाद राजा ने स्वयं ही अपने पुत्र को राजगद्दी पर बैठा दिया. पांचवे राजा जिग्मी खेसर वाम्ग्येल एक दार्शनिक, सुधारक तथा आध्यात्मिक व्यक्ति थे, जिन्होंने देश में कितने ही सुधार कार्य किये. २००८ में प्रजातंत्र की स्थापना करके जनता को देश के विकास में भागीदार ही नहीं बनाया, आत्मनिर्भर बनाया. भूटान की जनता इन्हें ईश्वर की तरह मानती है. भूटान ही विश्व में एकमात्र ऐसा देश है जहाँ लोकतंत्र के लिए कोई आन्दोलन नहीं हुआ, जनता को इसके योग्य बनाया गया और उन्हें उपहार स्वरूप इसे प्रदान किया गया.

आज थिम्फू में तीसरा दिन है, प्रातः भ्रमण, प्राणायाम और स्वादिष्ट नाश्ता करने के बाद हम दर्शनीय स्थल देखने निकले. ड्राइवर नीमा अपनी नई टोयोटा के साथ मौजूद था. निकट स्थित एक अन्य होटल से तीन सहयात्रियों को लेकर हम सबसे पहले भूटान की अति प्राचीन मोनेस्ट्री जिसे यहाँ की भाषा में द्जोंग कहते हैं, देखने गये. मठ के मुख्य कक्ष में संस्थापक की विशाल मूर्ति है. कक्ष को रंगीन झंडियों, चित्रों, पुष्पों आदि से सजाया गया था. एक कक्ष में बुद्ध की विशाल मूर्ति भी वहाँ पर थी. आज बुद्ध का महा परिनिर्वाण दिवस होने के कारण लोगों का एक बड़ा हुजूम दर्शन करने आया था. हमने भी परिक्रमा में भाग लिया. सारा वातावरण उत्सव व प्रसन्नता से भरा था. कुछ लडकियाँ और लड़के सभी को फलों के रस के पैकेट्स मुफ्त बांट रहे थे. इसके बाद हम आधुनिक भूटान के निर्माता तीसरे राजा के स्मरण में बने स्मारक को देखने गये. वहाँ भी हजारों भूटानी अपने-अपने परिवार सहित पूजा कर रहे थे. सभी अपनी पारंपरिक वेश भूषा में थे. पुरुषों के वस्त्र को घो तथा महिलाओं की पोषाक को यहाँ कीरा कहते हैं. कुछ बौद्ध साधक पाठ कर रहे थे. यहाँ घंटो तक लोगों की भीड़ आती रही और परिक्रमा बिना रुके चलती रही.  

अगला पड़ाव था 'बुद्धा पॉइंट' जो एक विशाल पर्वत को काटकर पन्द्रह वर्ष पूर्व ही बनना आरम्भ हुआ है. हांगकांग. चीन तथा सिंगापुर की सहायता से बना यह विशाल स्थल दूर से ही नजर आता है. लोगों की विशाल भीड़ यहाँ भी थी. दोपहर के भोजन के बाद हम 'टाकिन जू' देखने गये. बकरी का सिर और बैल का धड़ मिलाकर जैसे यह अद्भुत प्राणी बना है. इसके जन्म की अनोखी कथा यहाँ प्रचलित है. होटल के निकट ही एक बुद्धा पार्क में कुछ समय बिताकर हम होटल लौट आये. कल सुबह पुनाखा के लिए रवाना होना है.
क्रमशः

शनिवार, जून 1

भूटान की यात्रा


भूटान की यात्रा- १ 

आज 'थिम्फू' में हमारा पहला दिन है. सुबह साढ़े छह बजे जब कोलकाता हवाई अड्डे पहुँचे, तब तक ड्रुक एयर का काउन्टर नहीं खुला था. कुछ देर बाद हलचल आरम्भ हुई और औपाचारिक कार्यविधियों के बाद नौ बजे जहाज ने उड़ान भरी. एक घंटे की आरामदायक यात्रा के बाद भूटान के 'पारो' नामक स्थान पर पहुँचे, उस समय स्थानीय समय था साढ़े दस, यानि यहाँ की घड़ियाँ भारत की घड़ियों से  आधा घंटा आगे हैं. हवाई अड्डा काफी खुला है और इसकी साज-सज्जा किसी बौद्ध मन्दिर जैसी है. बाहर निकलने से पूर्व ही हमने मोबाईल फोन में स्थानीय सिमकार्ड डलवा लिया था. 'मेक माय ट्रिप' की तरफ से गाइड एक बड़ी गाड़ी लेकर आया था. हम दोनों के अलावा एक बौद्ध दम्पति तथा उनकी पुत्री, जो मेडिकल की छात्रा है, भी हमारे साथ थे. एक घंटे की सड़क यात्रा के बाद हम भूटान की राजधानी 'थिम्फू' पहुंच गये. सहयात्रियों को उनके होटल में उतार कर हम 'मिगमार' नाम के होटल पहुँचे, जिसकी दीवारें पीले रंग से रंगी हैं, सुंदर चित्र व बेलबूटों से सजी हैं. बाहर फूलों का बगीचा है, और होटल काफी बड़ा है. दोपहर का भोजन हल्का व सुपाच्य था, कुछ देर विश्राम करके हम स्थानीय बाजार देखने गये. यहाँ हस्तकला के सामानों से भरी अनेकों दुकानें हैं.

आज दूसरे दिन हम 'थिम्फू' के दर्शनीय स्थलों को देखने गये, उससे पूर्व सुबह जल्दी उठकर होटल की दायीं ओर प्रातः भ्रमण के लिए निकले. यहाँ पैदल चलने वाले यात्रियों के लिए काफी चौड़े मार्ग बने हैं, जिसपर सुबह-सुबह कुछ लोग दौड़ भी रहे थे. हवा ठंडी थी, जैकेट को कान तक ढककर हम चारों ओर के सुन्दर पर्वतों को देखते हुए आगे बढ़ते रहे. साढ़े नौ बजे गाइड 'पेलडन' के साथ ड्राइवर अपनी गाड़ी लेकर आ गया. हमारा पहला पड़ाव था, राष्ट्रीय ‘आर्ट एंड क्राफ्ट सेंटर’. गाइड ने बताया कक्षा दस उत्तीर्ण करने के बाद कोई भी विद्यार्थी इस संस्था में आकर चित्रकला, मूर्ति कला, कढ़ाई, काष्ठ कला आदि सीख सकता है. कुछ कोर्स तीन वर्ष के हैं तथा कुछ कोर्स छह वर्ष के लिए हैं. यहाँ से दक्षता प्राप्त करने के बाद छात्र-छात्राएं अपना निजी व्यवसाय आरम्भ कर सकते हैं. भूटान की हस्तकला विश्वप्रसिद्ध है. बौद्ध चित्रकला तथा वास्तुकला अपनी सूक्ष्म कारीगरी, सुंदर आकृतियों तथा रंगों के लिए जानी जाती है. हमने कई छात्रों को काम करते हुए देखा. इसके बाद हम बौद्ध साधिकाओं की एक संस्था देखने गये. जहाँ युवा तथा वृद्ध साधिकाएँ तथा बौद्ध साधक भी मन्त्र जाप आदि धार्मिक क्रियाकलापों में व्यस्त थे. वहाँ का वातावरण एक विचित्र उल्लास से भरा था. कुछ वृद्ध भिक्षुओं की तस्वीरें हमने उतारीं, उनके मुस्कुराते हुए चेहरे भूटान के बढ़े हुए हैप्पिनेस इंडेक्स  की गवाही दे रहे थे. टेक्स्टाईल म्यूजियम तथा क्राफ्ट बाजार हमारे अगले पडाव थे.

क्रमशः