आशा फिर भी पलती भीतर
राहें कितनी भी
मुश्किल हों
होता कुछ भी ना
हासिल हो,
आशा फिर भी पलती
भीतर
चाहे टूट गया यह
दिल हो !
प्यार की लौ
अकम्पित जलती
गहराई में कलिका
खिलती,
नजरें जरा घुमा
कर देखें
अविरल गंगा पग-पग
बहती !
महादेव रक्षक हों
जिसके
रोली अक्षत हों
मस्तक पे,
किन विपदाओं से
हारे वह
भैरव मन्त्र जपा
हो मन से !
सृष्टि लख जब याद
वह आये
बरबस मन अंतर
मुस्काए,
अपनेपन की ढाल
बना है
बाँह थाम वह पार
लगाये !
सुख-दुःख में
समता जो साधे
मन वह बोले
राधे-राधे,
हँसते-हँसते कष्ट
उठाये
सदा समर्पित जो
आराधे !
