लौट-लौट आती है प्रतिध्वनि
हर पुकार सुनी जाती है
लौट-लौट आती है प्रतिध्वनि
हर मनुहार चुनी जाती है !
यूँ ही तो नहीं गगन सज रहा
तारों से रात्रि मंडित है,
नव रंगों से उषा निखरती
धरा पादपों से सज्जित है !
रोज बहार खिली आती है
स्वागत करने उस प्रियतम का
बन उपहार चली आती है !
मेघ उमड़ते अमृत जल से
करने धरती का अभिनन्दन,
शस्य श्यामला धरा विहंसती
पुष्प कर रहे जैसे वन्दन !
नित इक धार बही आती है
दे जाती संदेशे उसके
कई आकार धरे जाती है !
