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रविवार, जनवरी 22

सच में

सच में 


हम सच को स्वीकार नहीं करते 

वरना साफ़-साफ़ कह देते

 हम मंदिर आते हैं खुद के लिए 

हे ईश्वर ! हम तुमसे प्रेम नहीं करते 

शब्दों को एक-दूसरे के साथ बिठाकर 

गढ़ लेते हैं प्रार्थनाएँ 

जिनमें हमें भी यक़ीन नहीं होता 

तू हमारा कुशल-क्षेम रखेगा 

वरना क्या इस बात पर करते नहीं भरोसा

नहीं है अहम् हममें रत्तीभर भी

कहकर, अहंकार को ही फूल चढ़ाते 

जो पाठ खुद नहीं पढ़ पाए 

वह औरों को पढ़ाते 

स्वयं को कटघड़े में खड़े करके 

खुद वकील बन जाते 

फिर बनते न्यायाधीश और 

फ़ैसला भी अपने ही हक़ में सुनाते !