रत्नाकर की थाह कौन ले
सागर ने जिस क्षण से स्वयं को
लहरें होना मान लिया,
बनना, मिटना, आहत होना
उस पल से ही ठान लिया !
माना लहरें भरे ऊर्जा
मीलों दूर चली आती हैं,
खाली सीपों के खोलों को
संग रेत बिखरा पाती हैं !
लहरों से ही जो पहचाने
सागर उसे कहाँ मिलता है,
दूर अतल गहराई में ही
जीवन का मोती खिलता है !
भ्रम ही हो सकता सागर को
लहरों के आकर्षण से,
कहाँ छिपेगी ढेर संपदा
जागे लहर विकर्षण से !
थम जाती हैं लहरें जिस पल
सागर स्वयं में टिक जाता ,
देख चकित होता फिर पल पल
स्वयं की थाह नहीं पाता !
