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शुक्रवार, सितंबर 25

ॐ शांति ! शांति !! शांति !!!


ॐ शांति ! शांति !! शांति !!!


 भीतर साधें शांति, संतुलन   

हो गतिमय बाहर का जीवन,

  ज्यों शिव शांत रहें अंतर में 

बाहर करते तांडव नर्तन !


ज्यों वृक्ष टिका भीतर भू के 

लिए शांत जड़ों का आधार, 

बाहर झूम रहीं शाखाएँ

नित लेकर हवाओं का साथ !


शांत जिस तरह तल नदिया का

जिस पर दौड़ लगाती जाती, 

अविचल, अनथक शताब्दियों से 

लहरें गीत विजय के गातीं ! 


ऐसे रहे शांत अंतर्मन 

हाथ कर्म में लगें निरन्तर

मीलों की दूरियाँ नाप लें  

लेकिन हो अचलता भीतर ! 


जिह्वा से वाणी का प्रयोग  

 देखें नैन सौंदर्य जग का, 

टूटे नहीं शांति भीतर की 

क्या हम नहीं चाहते ऐसा ?


प्रभु से हर प्रार्थना में नित्य 

 पूर्ण शांति क्या नहीं माँगते ?

 जो हीरे जैसी अकाट्य हो

ऐसी समता नहीं चाहते !