ॐ शांति ! शांति !! शांति !!!
भीतर साधें शांति, संतुलन
हो गतिमय बाहर का जीवन,
ज्यों शिव शांत रहें अंतर में
बाहर करते तांडव नर्तन !
ज्यों वृक्ष टिका भीतर भू के
लिए शांत जड़ों का आधार,
बाहर झूम रहीं शाखाएँ
नित लेकर हवाओं का साथ !
शांत जिस तरह तल नदिया का
जिस पर दौड़ लगाती जाती,
अविचल, अनथक शताब्दियों से
लहरें गीत विजय के गातीं !
ऐसे रहे शांत अंतर्मन
हाथ कर्म में लगें निरन्तर
मीलों की दूरियाँ नाप लें
लेकिन हो अचलता भीतर !
जिह्वा से वाणी का प्रयोग
देखें नैन सौंदर्य जग का,
टूटे नहीं शांति भीतर की
क्या हम नहीं चाहते ऐसा ?
प्रभु से हर प्रार्थना में नित्य
पूर्ण शांति क्या नहीं माँगते ?
जो हीरे जैसी अकाट्य हो
ऐसी समता नहीं चाहते !