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शुक्रवार, सितंबर 25

ॐ शांति ! शांति !! शांति !!!


ॐ शांति ! शांति !! शांति !!!


 भीतर साधें शांति, संतुलन   

हो गतिमय बाहर का जीवन,

  ज्यों शिव शांत रहें अंतर में 

बाहर करते तांडव नर्तन !


ज्यों वृक्ष टिका भीतर भू के 

लिए शांत जड़ों का आधार, 

बाहर झूम रहीं शाखाएँ

नित लेकर हवाओं का साथ !


शांत जिस तरह तल नदिया का

जिस पर दौड़ लगाती जाती, 

अविचल, अनथक शताब्दियों से 

लहरें गीत विजय के गातीं ! 


ऐसे रहे शांत अंतर्मन 

हाथ कर्म में लगें निरन्तर

मीलों की दूरियाँ नाप लें  

लेकिन हो अचलता भीतर ! 


जिह्वा से वाणी का प्रयोग  

 देखें नैन सौंदर्य जग का, 

टूटे नहीं शांति भीतर की 

क्या हम नहीं चाहते ऐसा ?


प्रभु से हर प्रार्थना में नित्य 

 पूर्ण शांति क्या नहीं माँगते ?

 जो हीरे जैसी अकाट्य हो

ऐसी समता नहीं चाहते !


बुधवार, जुलाई 1

एक सनातन वृक्ष जगत है

एक सनातन वृक्ष जगत है

क़ुदरत में ही सदा अवस्थित

सुख-दुख रूपी फल लगते हैं,

त्रिगुण रूपी मूल अति  गहरी 

एक सनातन वृक्ष जगत है !

 

पंच भूत, मन, बुद्धि, अहंता  

सदा अष्ट शाखाओं वाला

सप्त धातुएँ छाल बनी हैं

एक सनातन वृक्ष जगत है !

 

नौ द्वारों के कोटर इसमें 

दस प्राण बने पत्ते जिस पर

रस देता पुरुषार्थ रूप में

एक सनातन वृक्ष जगत है !

 

पंच इन्द्रियों से हम जानें  

उत्पन्न होकर बढ़े व मिटे

दो पंछी रहते हैं जिस पर

एक सनातन वृक्ष जगत है !


बुधवार, अगस्त 13

प्रकृति के सान्निध्य में

प्रकृति के सान्निध्य में 

भोर की सैर 


श्रावण पूर्णिमा की सुहानी भोर 

 छाये आकाश पर बादल चहूँ ओर 

प्रकृति प्रेमी एक छोटे से समूह ने 

कब्बन पार्क में एक साथ कदम बढ़ाये 

जो दिल में एक नये अनुभव का 

सपना संजोकर थे आये !


हरियाली से भरे झुरमुट 

और पंछियों के कलरव में 

एक सुंदर कविता से आगाज़ हुआ 

हर दिल में सुकून जागा 

और कुदरत के साथ होने का अहसास हुआ ! 


सम्मुख था आस्ट्रेलियन पाम

जिसे कैप्टन कुक पाइन ट्री भी कहते हैं 

जो झुक जाते हैं भूमध्य रेखा की ओर 

दुनिया में चाहे कहीं भी रहते हैं 

हर किसी ने जब उसके तने को छुआ था

शायद उस पल में  

एक अनजाना सा रिश्ता उससे बन गया था !


फिर बारी आयी आकाश मल्लिका की 

जिसकी भीनी ख़ुशबू से सारा आलम महका था !


वृक्षों में मैं पीपल हूँ, कृष्ण ने कहा था 

इसके नीचे ही बुद्ध को ज्ञान हुआ था 

पीपल में इतिहास और पुराण छिपे हैं 

बरगद के पैर चारों दिशाओं में बढ़े हैं 

घेर लेता यह भूमि को, अपनी जटाओं से 

कभी उग जाता किसी अन्य पेड़ की शाखाओं पे 

मिट जाता शरण देने वाला 

बस जाता मेहमान

बनियों की बैठकें 

हुआ करती रही होंगी इसके नीचे 

तभी नाम पाया है बैनियान !


ब्रह्मा ने किया था विश्राम 

सट शाल्मली के तने से, 

सेमल की कोमल रूई का 

जन्मदाता है ये !


जलीय भूमि के पौधों की दुनिया अलग थी 

हरियाली चप्पे-चप्पे पर 

जल को ढके थी !


चीटियों के घोसलें शाख़ों पर लगे देखे 

जब रोमांच से भरे उनके किस्से सुने 

 अनोखे राज जाने तब कुदरत के !


अरबों वर्ष पुरानी चट्टानें भी वहाँ हैं 

डायनासोर के विलुप्त होने की जो गवाह हैं 

श्वेत मकड़ियाँ श्वेत तने पर 

नज़र नहीं आती हैं 

शायद इस तरह शिकार होने से

 ख़ुद को बचाती हैं 

वृक्षों और कीटों का संसार निराला है 

जिसने जरा झाँका इसके भीतर 

मन में हुआ ज्ञान का उजाला है ! 


सोमवार, मार्च 10

आया मार्च

आया मार्च 


आया मार्च ! हरी आभा ले

वृक्षों ने नव पल्लव धारे, 

धानी चमकीले रंगों से 

तरुवर ने निज गात सँवारे !


आया मार्च ! अरुण आभा ले 

फूला पलाश वन प्रांतर में, 

चटक शोख़ रक्तिम पल्लव से 

डाली-डाली सजी वृक्ष में !


आया मार्च ! मौसम रंगीन 

फागुन की आहट कण-कण में, 

बैंगनी फूलों वाला पेड़ 

बस जाता मन में नयनों से !


आया मार्च ! महक अमराई 

छोटी-छोटी अमियाँ फूटीं, 

भँवरे डोला करें बौर पर 

दूर नहीं रस भरे आम भी !


आया मार्च ! कहीं बढ़ा  ताप 

कहीं अभी भी शीत व्यापता, 

कुदरत  की लीला पर मानव 

चकित हुआ सा रहे भाँपता !



मंगलवार, मई 7

सदा रहे उपलब्ध वही मन

सदा रहे उपलब्ध वही मन 


यादों का इक बोझ उठाये 

मन धीरे-धीरे बढ़ता है, 

भय आने वाले कल का भर 

ऊँचे वृक्षों पर चढ़ता है !


वृक्ष विचारों के ही गढ़ता

भीति भी केवल एक विचार, 

ख़ुद ही ख़ुद को रहे डराता 

ख़ुद ही हल ढूँढा करता है !


कोरा, निर्दोष, सहज, सुंदर 

ऐसा इक मन लेकर आये, 

जीवन की आपाधापी में 

कहाँ खो गया, कौन बताये ?


पुन: उसको हासिल करना है 

शिशु सा फिर विमुक्त हँसना है, 

फूलों, तितली के रंगों को 

बालक सा दिल से तकना है !


आदर्शों को नव किशोर सा 

जीवन में प्रश्रय देना है, 

युवा हुआ मन प्रगति मार्ग पर 

ले जाये, संबल देना है !


इर्दगिर्द  लोगों की पीड़ा 

प्रौढ़ हुआ मन हर ले जाये,

वृद्ध बना मन आशीषों से 

सारे जग को भरे, हँसाये !


वर्तमान में रहना सीखे 

ऐसा ही मन मिट सकता है, 

सदा रहे उपलब्ध वही मन 

इस जग में कुछ कर सकता है !


रविवार, मई 5

प्रेम

प्रेम 


जिस पर फूल नहीं खिल रहे थे 

उसने उस वृक्ष को 

पास जाकर ऐसे छुआ 

जैसे कोई अपनों को छूता है 

और अचानक कोई हलचल हुई 

पेड़ सुन रहा था 

चेतना हर जगह है 

आकाश में तिरते गुलाबी बादलों  

और लहराती पवन में भी 

 प्रकट हो जाती है 

एक नई दुनिया ! 

जब विस्मय से भर जाता है मन

जैसे कदम-कदम पर कोई 

मंदिर बनता जा रहा हो 

और हर शै उसमें रखी मूरत 

कभी सुख-दुख बनकर 

जिसने हँसाया-रुलाया था 

  शाश्वत बन जाता है वही मन

इतना कठोर न बने यदि 

कि प्रेम भीतर ही भीतर 

घुमड़ता रह जाये 

बंद गलियों में उसकी 

और न इतना महान 

कि प्रेम मिले किसी का 

तो अस्वीकार कर दे 

प्रेम जीवंत है 

वही बदल रहा है 

सागर की लहरों की तरह 

वही यात्री है वही मंज़िल भी !


मंगलवार, मार्च 16

कंचन से इल्तजा

कंचन से इल्तजा


ऐ कंचन के वृक्ष ! 

तू क्यों नहीं खिलता 

क्या इस दुनिया से तेरा दिल नहीं मिलता 

तेरे ही साथ जन्मा हरसिंगार अब तक 

हजारों फूल खिला चुका 

तू न खिलने के कारण अपनी टहनियाँ 

कई बार कटवा चुका 

हर बार यही सोचा कि इस बार फूल आएंगे 

पर पत्तों से भर जाती हैं डालियाँ 

जाने कब फूल मुस्काएंगे 

तू नहीं जानता क्या दुनिया की रीत 

जो उपयोगी नहीं उसे हटा दिया जाता  

कई कह चुके, क्यों न इसे गिराकर 

दूसरा लगा लिया जाता  

 इस बरसात में तू समेट ले 

सावन की सारी नमी अपनी शिराओं में 

भर ले इंद्रधनुष से लेकर रंग 

और जी भर के झूम ले फिजाओं में 

 अगले बसंत में तुझे है खिलना 

तितलियों और भँवरों को निमंत्रण अभी से भिजवा देना 

चाँद और सूरज से लेकर ऊष्मा और ठंडक 

 खिलने की चाह जगा लेना

सूनी-सूनी सी तेरी डालियाँ अब देखी नहीं जाती 

रंगीन फूलों की स्मृति क्या तुझे नहीं सताती 

जहाँ से जन्मा था तेरा बीज 

वह वृक्ष भी तो खिला होगा 

तभी उसने तुझे आँचल में भरा होगा 

तुझे भी इस जगत को नए बीज देकर जाना है 

आकाश में धरती की गंध व सूरज के रंगों को बिखराना है ! 

 

मंगलवार, अक्टूबर 27

हम और अस्तित्व

हम और अस्तित्व

 

हम वह वृक्ष बन सकें

जो हजारों का भला करता है

छाँव देता और उनकी क्षुधा हरता है

या बनें बाँसुरी जो खाली है भीतर से

पर अस्तित्व के अधरों से लगकर

मधुर संगीत जिससे उपजता है

हमारे भीतर से हम जब लुप्त हो जाते हैं

सारा संसार समा  जाता है

हवाएं बहने लगती हैं

शक्ति का प्रवाह ऊपर से गिरता है

जैसे शंकर की जटाओं में सिमट जाती है गंगा

बहती है वह जग की तृषा हरने

गौरी धरती है भीषण काली का रूप

सहना होगा जिसे असुरों का आक्रमण

हजार विरोध भी, पर वहाँ कोई नहीं होगा

जो अपमानित हो सके तिल भर

हमें भी बनना होगा मसीहा

छोटा या बड़ा  

क्योंकि अंतरिक्ष समेटे है हर कोई अपने भीतर !