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शुक्रवार, जुलाई 10

शिवालय

शिवालय 


कोई कहता है 

शिव के भीतर प्रेम है 

जैसे कि शिव और प्रेम हों

 दो अलग-अलग वस्तुएँ 

असल में प्रेम ही शिव है  

जब भीतर जागता है प्रेम 

मन ख़ाली हो जाता है 

सारे भेद मिट जाते हैं 

श्वासें गढ़ती भीतर 

वह मंदिर

 जिसमें शिव विराजमान होते
पूरक देह में स्थान बनाती  

रेचक मन की थिरता को दृढ़ करती 

पूरक है आत्मा का जीवन

रेचक संसार का 

दोनों के मध्य 

शिव का वास है 

जो उसमें जागेंगे 

वे जानेंगे !

 

बुधवार, अगस्त 28

शिवालय

शिवालय


कठिन है यात्रा कैलाश की

जहाँ मानसरोवर के निकट  

शिव का आवास है 

इसलिए उतर आये हैं शिव 

स्वयं काशी में 

गंगा तट पर किया प्रवास है 

सुगम है काशी जाना 

शिव को पाना 

फिर भी यदि कहे कोई 

दूर है काशी 

हर गाँव हर शहर में 

शिव बसते हैं 

मंदिर और शिवालय की चौखट भी 

यदि नहीं लांघी जाती 

तो स्वयं का मस्तक ही 

शिव का घर जान लें 

हर हर गंगे कहते 

सिर पर एक लोटा जल डाल लें 

उतर आएगी कैलाश की शीतलता 

भीतर कोई कहेगा 

ह्रदय गुफा में शिव का वास है 

जहाँ बसता परम उल्लास है !