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शनिवार, सितंबर 14

हिन्दी दिवस पर

हिन्दी दिवस पर 

हिन्दी मात्र एक भाषा नहीं 

एक पुल है

यह जोड़ती है भारत ही नहीं विश्व को 

इतिहास, पुराण और संस्कृति के 

अनमोल खजानों से 

कबीर, सूर और तुलसी के साथ 

अनगिनत साहित्यकारों के फसानों से  

हिन्दी संस्कार की भाषा है 

अति सरल, मधुर, प्यार की भाषा है 

हाँ, नहीं बन सकी यह 

विज्ञान और व्यापार की भाषा 

या शायद रोज़गार की भाषा 

इसलिए आज अपने ही घर में बेगानी है 

इसकी शुद्धता और मर्यादा की 

कहीं-कहीं हो रही हानि है 

भावनाओं को शब्द देती 

हिन्दी प्रीत सिखाती है 

पोषित करती मनों को 

आगे ले जाती है 

हिन्दी माँ है, समझाती है 

काव्य रस का पान कराती है 

आज़ादी का संघर्ष 

इसके बलबूते लड़ा गया 

उत्तर को दक्षिण से मिलाती है 

 तय किया है एक लंबा सफ़र हिन्दी ने 

अभी और आगे जाना है 

देश विदेश में इसका मान और सम्मान बढ़ाना है 

हिन्दी को उसकी क्षमता की 

पहचान दिलानी है  

शिशुओं को शुद्ध हिन्दी सिखानी है 

क्योंकि हिंदुस्तान की शान है हिन्दी 

भारत की पहचान है हिन्दी !


सोमवार, मार्च 9

विपासना का अनुभव -अंतिम भाग

विपासना का अनुभव 

सुबह आठ बजे से नौ बजे तक, दोपहर ढाई से साढ़े तीन बजे तक तथा शाम छह से सात बजे तक सामूहिक साधना होती थी. जिसमें सभी साधकों का पूरे वक्त उपस्थित रहना आवश्यक था. शेष समय में कभी–कभी पुराने साधकों को अपने निवास स्थान पर ध्यान करने के लिए कहा जाता था और कभी-कभी कुछ नये और पुराने साधकों को शून्यागारों में ध्यान करने के लिए कहा जाता था. गोल पगोड़ा में स्थित शून्यागार एक विशिष्ट आकार के छोटे-छोटे ध्यान कक्ष थे, जिनमें अकेले बैठकर ध्यान करना होता था. एक दिन शून्यागार में ध्यान करते हुए अनोखा अनुभव हुआ, जिसमें एक क्षण के लिए स्वयं को देह से अलग देखा, जैसे मैं पृथक हूँ और देह बैठकर ध्यान कर रही है. जैसे ही इस बात का बोध हुआ, अनुभव जा चुका था.

विपश्यना आरम्भ होने पर चौथे दिन के उत्तरार्ध से गुरूजी ने शरीर में होने वाली संवेदनाओं पर ध्यान देने को कहा. पहले दिन केवल नाक के छल्लों तथा ऊपर वाले होंठ के ऊपर वाले भाग पर ही, बाद में सिर से लेकर पैर तक एक-एक अंग पर कुछ क्षण रुकते हुए वहाँ होने वाली किसी भी तरह की संवेदना को देखना था. यह संवेदना किसी भी प्रकार की हो सकती थी, दर्द, कसाव, खिंचाव, सिहरन, खुजली, फड़कन या अन्य किसी भी प्रकार का शरीर पर होने वाला अनुभव. मुख्य बात यह थी कि संवेदना चाहे सुखद हो या दुखद, उसके प्रति किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया नहीं करनी थी. वे सभी संवेदनाएं स्वतः ही उत्पन्न होकर नष्ट हो जाती हैं, साक्षी भाव से इस अनित्यता के नियम का दर्शन करना था. हमारा अंतर्मन न जाने कितने संस्कार छिपाए है और हर पल हम नये संस्कार बनाते चल रहे हैं. हमसे जाने-अनजाने जो भी गलत-सही हुआ है, उसका हिसाब तो चुकाना ही होगा. औरों को देखकर जो द्वेष का भाव मन में जगता है वह भीतर गाँठ बनकर टिक जाता है. प्रकृति का नियम है विकार जगाया तो व्याकुल तो होना ही पड़ेगा. अतीत में जगाये विकार समय आने पर देह पर किसी न किसी रोग के रूप में आकर प्रकट हो सकते हैं. साक्षी का अनुभव होने के बाद राग, द्वेष व मोह के बंधन नहीं बंधते.
आठवां दिन आते आते तो मन भी जैसे दूर खो गया लगता था, देह पर होने वाले सुख-दुःख जैसे किसी और को हो रहे हैं. मन एक असीम मौन में डूबा हुआ है. लगा, सारा विश्व जैसे एक ही सूत्र में पिरोया हुआ है और वह सूत्र मुझ से होकर भी जाता है, सदा से ऐसा ही था और सदा ऐसा ही रहेगा, यह देह एक दिन गिर जायेगी फिर भी यह चेतना किसी न किसी रूप में तो रहेगी ही. एक दिन गोयनका जी ने कहा, मन और देह दोनों एक नदी की तरह हैं. मौसम बदलते हैं तो नदी भी बदलती है वैसे ही मन और देह के भी मौसम होते हैं. देह का आधार अन्न है और मन का आधार संस्कार हैं जो हर पल बनते-मिटते रहते हैं. मन के किनारे बैठकर जो इसे देखना सीख जाता है वह इससे प्रभावित नहीं होता.

एक रात्रि स्वप्न में स्वयं को किसी दुःख से छुड़ाने के लिए रोकर पुकार लगाते सुना, फिर अपने ही मुँह से एक धातु का उपकरण निकालकर हाथ में रखा, स्पष्ट था कि पीड़ा का कारण यही था. तब जैसे किसी ने कान में फुसफुसा कर कहा, अपने आप को स्वयं ही क्यों दुखी बनाती हो? फिर नींद खुल गयी. एक स्वप्न में देखा, उठना चाहती हूँ पर आँखें हैं कि खुलने का नाम नहीं लेतीं, बंद आँखों से ही चल पड़ती हूँ तो सामने दीवार आ जाती है, दिशा बदल कर सडक पर आ जाती हूँ और आँखें खोलने में समर्थ हो जाती हूँ. एक स्वप्न में खुद को निरंतर ७८६ को उच्चारित करते हुए पाया. एक और स्वप्न में भगवान शंकर का जयकार करते हुए. ये सारे स्वप्न यही तो बता रहे थे कि न जाने कितने बार यह चक्र घूम चुका है अब कहीं तो इसे रुकना होगा. कभी-कभी ऐसे व्यर्थ के विचार भी आते कि हँसी आती, पर जो जो भीतर रिकार्ड किया है वह तो निकलेगा ही, सारी साधना समता भाव बनाये रखने की है. कोई भी अनुभव कितना भी सुंदर क्यों न हो समाप्त हो जाता है, पर भीतर की समता एक चट्टान की तरह अडिग रहती है.

अंतिम दिन का पाठ भी अतुलनीय था, जिसमें मंगल मैत्री सिखायी गयी. प्रतिदिन सुबह व शाम की साधना के बाद सारे विश्व के लिए मंगल कामना करने को कहा गया अपने सारे पुण्य केवल स्वयं की शुद्धि के लिए समाप्त न हो जाएँ सब दिशाओं में उन्हें प्रसारित करना होगा. सबके मंगल में ही अपना मंगल छिपा है, भगवान बुद्ध की यह मंगल भावना कितनी पावन है. धरा पर यदि कोई जगा हुआ न हो तो इसकी रौनक कोई देख ही न पाए, उस तरह, जिस तरह यह वास्तव में है ! जो दिखायी नहीं देता, वह उससे ज्यादा सुंदर है जो दिखायी देता है. ‘शील, समाधि और प्रज्ञा’ भगवान बुद्ध के बताये इस मार्ग पर चलकर न जाने कितने लोग दुखों से मुक्ति का अनुभव कर चुके हैं, और अनेक भविष्य में भी करते रहेंगे.  

बुधवार, मार्च 4

विपासना का अनुभव

विपासना का अनुभव

ग्यारह फरवरी की एक शांत दोपहरी को दो बजे कोलकाता के IIM से सोदपुर स्थित विपासना केंद्र ‘धम्म गंगा’ के लिए रवाना हुई. तीन दिन पहले ही हम वहाँ आए थे. पतिदेव की ट्रेनिंग दो दिन पहले ही शुरू हो चुकी थी और मुझे अगले दस दिनों के लिए मन की ट्रेनिंग के लिए जाना था. विपासना के बारे में कई वर्षों से सुनती आ रही थी. यह ध्यान की एक गहन प्रक्रिया है जिसमें मन को गहराइयों तक जाकर देखते हैं और भीतर छिपे संस्कारों में परिवर्तन सम्भव होते हैं. गोयनका जी को वर्षों पहले टीवी पर सुना था, तब से इस कोर्स के बारे में एक छवि मन में बसा ली थी और जब ऐसा अवसर आया कि दो हफ्तों के लिए कोलकाता में रहना था तो झटपट नेट पर कोर्स के स्थान के बारे में आवश्यक जानकारी लेकर अपना नाम लिखवा दिया था. जाने से पहले एक अनजाना सा भाव मन में था, पर विश्वास था कि कठिन नहीं होगा दस दिनों का यह साधना काल. कोलकाता से लगभग तीस किमी दूर गंगा के तट पर स्थित केंद्र तक पहुंचने में दो-ढाई घंटे लग गये. वहाँ पहुँचकर एक मूढ़तापूर्ण कार्य किया, जिसने सिद्द कर दिया कि इस कोर्स को करने की कितनी अधिक जरूरत है. ड्राइवर को बाहर छोड़कर लोहे के गेट के बायीं तरफ से अंदर पता करने के लिए चली गयी कि कार अंदर जा सकती है या नहीं, लौटी तो कार नदारद थी, जिस गली से हम आये थे, उसमें कहीं नजर नहीं आ रही थी. मन के भीतर छिपा भय का संस्कार सामने आ गया, गोयनका जी कहते हैं कोई भी विकार जगा कि दुख का कारण ही बनता है. अब भय जगा तो झट प्रतिक्रिया हुई, पतिदेव को फोन कर दिया बिना यह सोचे कि इतनी दूर से वह क्या सहायता करेंगे, खैर उनके आशाजनक शब्दों ने विश्वास दिलाया, ड्राइवर दूसरी गली में जाकर गाड़ी मोड़ने चला गया था. वह वापस आया तो मन ही मन उससे क्षमा मांगी. धैर्य का दामन छोड़कर जो मन झट प्रतिक्रिया करने में जुट जाता है वह गलत निर्णय पर ही पहुंचता है. यह पाठ आते ही सीख लिया था.

खैर, भीतर पहुंच कर काफी समय औपचारिकताओं में बीतता गया. फार्म भरवाया गया, प्यास भी लग रही थी और लम्बे सफर से सिर में हल्का दर्द भी था. आखिरकार कमरा मिला, कमरे का नम्बर आठ था, जो अगले दस दिनों के लिए आवास बनने वाला था. एक युवा बंगाली लड़की जो बैंगलोर में रहकर जॉब करती है, पर उसका घर कोलकाता में है, उस कमरे में पहले से ही थी. उसने दो-चार बातें ही की होंगी कि पता चला ऑफिस में जाकर मोबाइल व अन्य कीमती सामान लॉकर में रखवाने हैं. वहीं पता चला छह बजे घंटा बजेगा तब नाश्ता व चाय मिलेगी, जो आज का अंतिम भोजन होगा. शाम का वक्त था, सूर्यास्त का समय. केंद्र का बगीचा जहाँ खत्म होता था, वहाँ बरगद के एक विशाल वृक्ष के चारों तरफ एक बड़ा चबूतरा था. जिसपर चढ़कर गंगा का चौड़ा पाट देखा. नदी का शांत पानी और उस पर नाचती हुई छोटी-छोटी लहरें, सूर्य की लाल रश्मियाँ उन लहरों के साथ नृत्य करती हुई बहुत आकर्षक लग रही थीं. अगले कुछ दिनों तक रोज ही शाम को बल्कि दिन में कई बार गंगा को निहारना मेरा प्रिय कार्य बन जायेगा यह उस वक्त मालूम नहीं था. उसी वृक्ष के नीचे तितलियों से गुफ्तगू भी रोज का हिस्सा बन जाएगी यह भी नहीं जानती थी. जैसे ही शाम के वक्त वहाँ जाती, हवा चल रही होती और जाने कहाँ से उड़ती-उड़ती दो काली तितलियाँ आ जातीं और कभी सिर कभी बांह पर बैठ जाती थीं, आश्चर्य होता था, भरोसा भी होता था कि परमात्मा ही उनके द्वारा संदेश भेजता है. कुछ पंक्तियाँ तभी एक दिन जेहन में आई थीं-

तितलियाँ परमात्मा की दूत होती हैं
पुष्प उसके चरणों की शोभा बढ़ाते हैं
उन पुष्पों पर मंडराती हैं
तितलियाँ परमात्मा का संदेश ले आती हैं

क्रमशः