शनिवार, अक्टूबर 3

खोकर ही पा सकता कोई

खोकर ही पा सकता कोई 


अपने भीतर उतर सको तो 

स्वाद स्वयं का अगर छको तो, 

अंत नहीं पाओगे उसका 

मन-राहों से गुजर सको तो !


मीठी-मीठी सी इक पीड़ा 

भर लेती आग़ोश में सहज, 

स्वपनों का हर जाल टूटता 

संग रह जाती इक याद महज़ !


मिट जाने का सुख अनुपम है 

मिट कर ग़र यह जान सको तो, 

खोकर ही पा सकता कोई 

सूत्र अनोखा मान सको तो !


सावन झरता मधु ऋतु आती 

मन के मौसम हुए सुहाने,

कल्प वृक्ष नंदन वन उगते 

तिल भर भी अभाव कब जानें !