खोकर ही पा सकता कोई
अपने भीतर उतर सको तो
स्वाद स्वयं का अगर छको तो,
अंत नहीं पाओगे उसका
मन-राहों से गुजर सको तो !
मीठी-मीठी सी इक पीड़ा
भर लेती आग़ोश में सहज,
स्वपनों का हर जाल टूटता
संग रह जाती इक याद महज़ !
मिट जाने का सुख अनुपम है
मिट कर ग़र यह जान सको तो,
खोकर ही पा सकता कोई
सूत्र अनोखा मान सको तो !
सावन झरता मधु ऋतु आती
मन के मौसम हुए सुहाने,
कल्प वृक्ष नंदन वन उगते
तिल भर भी अभाव कब जानें !