बुधवार, नवंबर 17

अकुलाहट

अकुलाहट

उस चाहत की चाहत की है

जो अंतर को बेसुध कर दे,

कुछ कहने, कुछ भी मत कहने

दोनों का हर अंतर भर दे !


इक बेचैनी माँगी उर ने

जो भीतर तक भरती जाये,

वह सब जो आतुर आने को

निर्बाधा बाहर आ जाये !


इक बेआरामी सी हर पल

इस दिल में सुगबुग करती हो,

आकुल रीते अंतर्मन का

थोड़ा खालीपन भरती हो !


इक अकुलाहट हो प्राणों में

गहरी प्यास हृदय में जागे,

सीधे सपाट उर मरुथल में

फिर चंचल हरिणी सी भागे !



अनिता निहालानी
१७ नवम्बर २०१०   


शनिवार, नवंबर 6

उत्सव के बाद

उत्सव के बाद


रह-रह कर मस्ती की गागर

जाने किसने भीतर फोड़ी,

अनजानी सी कुछ अनछूई

खुशियों की चादर है ओढ़ी !


नेह पगा मन टपकाए जो

रस की मधुरिम धार नशीली,

बिन कारण अधरों पर अंकित

कोमल सी मुस्कान रसीली !


स्मृतियाँ नहीं स्वप्न ही कोई

भीतर एक खाली आकाश,

उसी शून्य से झर झर झरता

मदमाता शुभ स्नेहिल प्रकाश !


कदमों में थिरकन भर जाता

हाथों में क्षमता वह अभिनव,

नयनों में जल प्रीत है भरा

मन अंतर में उल्लास प्रणव !


गुनगुन करता कोई विचरे

चिर चिन्मय का गान गूंजता,

तार जुड़ें जब हों अदृश्य से

ध्यान बिना साधे है लगता  !


उत्सव के उजास में डूबा

जाने कौन पाहुना आया,

मन जब अपने घर को लौटा

चैन जहाँ भर का फिर पाया !


अनिता निहालानी
६ नवम्बर २०१०    
  

बुधवार, नवंबर 3

दीवाली के दीपक


दीवाली के दीपक



उजाला बिखेरा धरा पर दियों ने,
दिलों को भी रोशन किया चाहते हैं !

मिटी कालिमा रात जगमग हुई ज्यों,
ज्ञान दीपक हृदय में बसा चाहते हैं !

श्रद्धा जहाँ गहरी रचबस गयी हो,
दीये उस उर में रहा चाहते हैं !

जल उठी जिस तरह लौ से लौ  झूम कर,
उजाले दिलों के बहा चाहते हैं !

जहाँ स्वच्छता हो वहीं वास सुख का,
दीवाली के दीपक कहा चाहते हैं !

अनिता निहालानी
३ नवम्बर २०१०      

सोमवार, नवंबर 1

आयी जगमग दीवाली



पूर्ण हुआ वनवास राम का
सँग सीता के लौट रहे हैं,
अचरज हुआ लक्ष्मण को लख
द्वार अवध के नहीं खुले हैं !

अब क्योंकर उत्सव यह हो
दीपमालिका नृत्य करे,
रात अमावस की दमके  
मंगल, बन्दनवार सजे !

हमने भी तो द्वार दिलों के
कर दिये बंद ताले डाले
राम हमारे निर्वासित हैं
पर अंतरदीप नहीं बाले !

राम विवेक, प्रीत सीता है
दोनों का तो मोल नहीं,
शोर, धुआँ ही नहीं दीवाली
उल्लास का कोई बोल नहीं !

धूम-धड़ाका, जुआ, तमाशा
उत्सव का नहीं करें सम्मान  
पीड़ित, दूषित वातावरण है
 देव संस्कृति का अपमान !

जलें दीप जगमग हर मग हो
अव्यक्त ईश का भान रहे
मधुर भोज, पकवान परोसें
मनअंतर में रसधार बहे !

शनिवार, अक्टूबर 30

हरसिंगार के फूल झरे

हरसिंगार के फूल झरे

हौले से उतरे शाखों से
बिछे धरा पर श्वेत केसरी
हरसिंगार के फूल अनूठे !

रूप-रंग, गंध की निधियां
लुटा रहे, मस्त, वैरागी
शेफाली के पुष्प नशीले !

प्रथम किरण ने छुआ भर था
शरमा गए, झर झर बरसे
सिउली के ये कुसुम निराले !

कोमल पुष्प बड़े शर्मीले
नयन खोलते अंधकार में
उगा रवि घर छोड़ चले !

नन्हीं सी केसरिया डंडी
पांच पंखुरी श्वेत वर्णीय
खिल तारों सँग होड़ करें !  

मदमाती खुशबू के तोहफे
बाँट रहे हैं मुक्त हृदय से
 मीलों तक फिजां महकाते !

अनिता निहालानी
३० अक्टूबर २०१०

शुक्रवार, अक्टूबर 29

कौन है वह

कौन है वह

वह इक एल्केमिस्ट विलक्षण !


अहंकार लोहे सा भारी

पिघला उसको कुंदन करता,

ओंकार गुंजन से दिल का

कोना-कोना मंडित करता !


इक निराला कैटेलिस्ट भी !


होने से जिसके सब होता

कुछ करे न सप्रयास वह,

अनायास ही कृपा बरसती

मन ख़ुद  ही परिवर्तित होता !


सबसे बड़ा पारखी भी वह !


आरपार सब दिल का परखे

झूठी आशा नहीं दिलाता,

कितना पानी चढ़ा हृदय पर 

सच्चे मोती सा चमकाता !


गोता खोरी सीखें उससे !


मन सागर में उतरे  गहरे

मणियों, रतनों को फिर पाएँ,

भीतर के प्रांगण को झिलमिल

ज्योति बिन्दुओं से दमकाएं !


एक यात्री दूर देश का !


वाहन बिना सृष्टि में घूमे

अम्बर में डेरा है उसका,

सूर्य चन्द्र हैं सजे थाल में

नित्य वन्दन होता है जिसका !


कुशल है माली बहुत सुजान !


चिदाकाश का बीज गिराता

कृपा वारि से उसे सींचता,

खाद ज्ञान की प्रेम ऊष्मा

देकर पौधा खूब बढ़ाता !


वीणा वादक हृदय वाद्य का !


अंतर्मन को झंकृत करता

देह को चिन्मय और उर्जित,

भाव पुष्प सम सुरभित होते

मेधा  जिसको देख चमत्कृत !


अनिता निहालानी
२९ अक्तूबर २०१०    
   



बुधवार, अक्टूबर 27

कहाँ खो गयी

कहाँ खो गयी

कहाँ खो गयी

लुप्त हो गयी

प्रेम बाँसुरी की धुन प्यारी !


चैन ले गया

वैन दे गया

गोकुल का छलिया गिरधारी !


देने में सुख

चाह ही दुःख

सीख दे रही हर फुलवारी !


मौन हुआ मन

अविचल स्थिर तन

बरसी भीतर रस पिचकारी !


अगन विरह की

तपन हृदय की

जल जाये हर भूल हमारी !


अनिता निहालानी
२७ अक्तूबर २०१०  

सोमवार, अक्टूबर 25

अनहद नाद

अनहद नाद

ढोल बजें कभी गरजें मेघ

कान्हा की बांसुरिया की धुन,

चहकें पंछी कभी हजारों

मदिर घुंघरूओं की रुनझुन !


कभी बजें इकतारे के सुर

वीणा पर कभी गूँजें राग,

अद्भुत ध्वनियाँ कौन सुनाये

कौन गा रहा  फागुन, विहाग ?


सुनते सुनते मन खो जाये

गहन मौन भीतर छा जाये,

मौन से उपजे है संगीत

सन्नाटा भी गीत सुनाये !


​​दस्तकें दिल द्वार पर देता

मिलने के उसके यही ढंग,

झलक दिखाता छुप जाता फिर

उस अलेख  के अनगिन हैं रंग !


अनहद नाद गूंजता भीतर

उसके ही संदेशे लाता,

शांति, प्रेम के पुष्प खिलाकर

सुरभि अनोखी से भर जाता !


अनंत ज्योतियों की ज्योति वह

एक सुनहला चेतन   प्रकाश,

स्वयं ही स्वयं पर रीझ मुग्ध

स्वयं को दे असीम आकाश !


अनिता निहालानी
२५ अक्टूबर २०१०    


शुक्रवार, अक्टूबर 22

मन छोटा सा

मन छोटा सा

चाह मान की जिसे जिलाए
वह है अपना छोटा सा तन,
कुछ पाने की आस लगाये
वह है अपना छोटा सा मन !

अमन हुआ जब मुक्त हो गया
त्यागी तृष्णा रिक्त हो गया,
लाखों हैं मेधा में बढ़ कर
जाना जब तब सिक्त हो गया !

मान की आशा ले डूबती
मदकी नैया सदा टूटती,
ख़ुदसे ही आगे जाना है
दुइ की गागर सदा फूटती !

सहज रहें जैसे हैं बादल
पंछी, पुष्प, चाँद औ'तारे,
भीतर जाकर उसको देखें
जिससे निकले हैं स्वर सारे !


अनिता निहालानी
२२ अक्तूबर २०१०

 

गुरुवार, अक्टूबर 21

जितना दौड़ो कम पड़ता है

यह कविता मेरी छोटी बहन के लिये है और यह उन सब कामकाजी महिलाओं के लिये भी है जो वर्षों से अपने प्रोफेशन के साथ साथ घर की जिम्मेदारी बिना शिकायत के निभाती आ रही हैं, किन्तु अब उम्र के उस पडाव पर आ पहुंची हैं, जहाँ खुद से खुद की मुलाकात होती है, प्रौढावस्था तक आते आते तन व मन तनाव से ग्रस्त हो चुके होते हैं जीवन में सभी उपलब्धियां हासिल कर चुकने के बाद भी एक खालीपन सा लगता है... एक नयी तलाश शुरू होती है खुद की तलाश....  
जितना दौड़ो कम पड़ता है
सुंदर मुखड़ा, गोरी रंगत
नन्हीं-मुन्नी एक परी थी,
घुंघराले थे काले कुंतल
घर भर में सबसे छोटी थी I

पढ़ने में भी थी होशियार
नृत्य कला सौंदर्य विचार,
हँसती तो गालों में गढ्ढे
आँखों में थे स्वप्न हजार !

कब वह इतनी बड़ी हो गयी
निज पैरों पर खड़ी हो गयी,   
मेहनत कर वह बनी डॉक्टर
ड्यूटी की संभाला भी घर I

जो चाहा पाया जीवन में
बच्चों को संस्कार दिया,
सँग मरीजों के अपनों सा
सदा प्रेम व्यवहार किया I

आज उम्र के दोराहे पर
जग में कुछ कर के दिखलाए
 थक कर बैठी रही सोचती
या फिर मानव धर्म निभाए ?

मानव होने का अर्थ क्या
निज के भीतर खुद को पाना,
तोड़ के मन, बुद्धि के घेरे
आत्म शक्ति से प्रीत लगाना I

जितना दौड़ो कम पड़ता है
यह जग अंधा एक कुआँ है,
कभी तृप्त ना हो सकता यह
सदैव अधूरा ही हुआ है I

युगों युगों से यही कहानी
दोहराती स्वयं को आयी है,
जग यह माया जाल घना है
भीतर ही खुशियाँ पायीं हैं I

दो पल थम कर खुद सँग हो ले
जिसने पाया, भीतर पाया,
नहीं छोड़ना कुछ भी बाहर
जिसको तृष्णा तजना आया I

कर कर के भी जो न मिलता
शांत हुए से सहज मिलेगा,
कुछ भी नहीं शांति के आगे
भाव सधे तो प्रेम खिलेगा I

जीवन का है यही रहस्य
जिसने छोड़ा उसने पाया,
सहज रहा जो जैसा भी है
उसने साथ स्वयं का पाया I

अनिता निहालानी
२१ अक्तूबर २०१०