बुधवार, नवंबर 17
शनिवार, नवंबर 6
उत्सव के बाद
जाने किसने भीतर फोड़ी,
अनजानी सी कुछ अनछूई
खुशियों की चादर है ओढ़ी !
नेह पगा मन टपकाए जो
रस की मधुरिम धार नशीली,
बिन कारण अधरों पर अंकित
कोमल सी मुस्कान रसीली !
स्मृतियाँ नहीं स्वप्न ही कोई
भीतर एक खाली आकाश,
उसी शून्य से झर झर झरता
मदमाता शुभ स्नेहिल प्रकाश !
कदमों में थिरकन भर जाता
हाथों में क्षमता वह अभिनव,
नयनों में जल प्रीत है भरा
मन अंतर में उल्लास प्रणव !
गुनगुन करता कोई विचरे
चिर चिन्मय का गान गूंजता,
तार जुड़ें जब हों अदृश्य से
ध्यान बिना साधे है लगता !
उत्सव के उजास में डूबा
जाने कौन पाहुना आया,
मन जब अपने घर को लौटा
चैन जहाँ भर का फिर पाया !
बुधवार, नवंबर 3
दीवाली के दीपक
सोमवार, नवंबर 1
आयी जगमग दीवाली
शनिवार, अक्टूबर 30
हरसिंगार के फूल झरे
शुक्रवार, अक्टूबर 29
कौन है वह
वह इक एल्केमिस्ट विलक्षण !
अहंकार लोहे सा भारी
पिघला उसको कुंदन करता,
ओंकार गुंजन से दिल का
कोना-कोना मंडित करता !
इक निराला कैटेलिस्ट भी !
होने से जिसके सब होता
कुछ करे न सप्रयास वह,
अनायास ही कृपा बरसती
मन ख़ुद ही परिवर्तित होता !
सबसे बड़ा पारखी भी वह !
आरपार सब दिल का परखे
झूठी आशा नहीं दिलाता,
कितना पानी चढ़ा हृदय पर
सच्चे मोती सा चमकाता !
गोता खोरी सीखें उससे !
मन सागर में उतरे गहरे
मणियों, रतनों को फिर पाएँ,
भीतर के प्रांगण को झिलमिल
ज्योति बिन्दुओं से दमकाएं !
एक यात्री दूर देश का !
वाहन बिना सृष्टि में घूमे
अम्बर में डेरा है उसका,
सूर्य चन्द्र हैं सजे थाल में
नित्य वन्दन होता है जिसका !
कुशल है माली बहुत सुजान !
चिदाकाश का बीज गिराता
कृपा वारि से उसे सींचता,
खाद ज्ञान की प्रेम ऊष्मा
देकर पौधा खूब बढ़ाता !
वीणा वादक हृदय वाद्य का !
अंतर्मन को झंकृत करता
देह को चिन्मय और उर्जित,
भाव पुष्प सम सुरभित होते
मेधा जिसको देख चमत्कृत !
बुधवार, अक्टूबर 27
कहाँ खो गयी
कहाँ खो गयी
लुप्त हो गयी
प्रेम बाँसुरी की धुन प्यारी !
चैन ले गया
वैन दे गया
गोकुल का छलिया गिरधारी !
देने में सुख
चाह ही दुःख
सीख दे रही हर फुलवारी !
मौन हुआ मन
अविचल स्थिर तन
बरसी भीतर रस पिचकारी !
अगन विरह की
तपन हृदय की
जल जाये हर भूल हमारी !
सोमवार, अक्टूबर 25
अनहद नाद
ढोल बजें कभी गरजें मेघ
कान्हा की बांसुरिया की धुन,
चहकें पंछी कभी हजारों
मदिर घुंघरूओं की रुनझुन !
कभी बजें इकतारे के सुर
वीणा पर कभी गूँजें राग,
अद्भुत ध्वनियाँ कौन सुनाये
कौन गा रहा फागुन, विहाग ?
सुनते सुनते मन खो जाये
गहन मौन भीतर छा जाये,
मौन से उपजे है संगीत
सन्नाटा भी गीत सुनाये !
दस्तकें दिल द्वार पर देता
मिलने के उसके यही ढंग,
झलक दिखाता छुप जाता फिर
उस अलेख के अनगिन हैं रंग !
अनहद नाद गूंजता भीतर
उसके ही संदेशे लाता,
शांति, प्रेम के पुष्प खिलाकर
सुरभि अनोखी से भर जाता !
अनंत ज्योतियों की ज्योति वह
एक सुनहला चेतन प्रकाश,
स्वयं ही स्वयं पर रीझ मुग्ध
स्वयं को दे असीम आकाश !
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