शब्दों के जंगल उग आते
मात्र मौन है जिसकी भाषा
शब्दों से क्या उसे है काम,
अनहद नाद बहे जो निशदिन
सहज दिलाए परम विश्राम !
कुदरत जड़ अनंत चेतन है
मेल कहाँ से हो सकता है,
तीजे हम हैं बने साक्षी
कौन हमें फिर ठग सकता है ?
शब्दों के जंगल उग आते
प्रीत, ज्ञान जिसमें खो जाते,
सुर निजता का भुला ही दिया
माया का इक महल बनाते !
मन शशि सम घटता बढ़ता है
निज प्रकाश कहाँ उसके पास,
जिसके बिना न सत्ता उसकी
उस चेतन पर नहीं विश्वास !
थम जाये तन ठहरा हो मन
अहंकार को मिले विश्राम,
मेधा विस्मित थमी ठगी सी
झलक दिखायेगा तभी राम !
वही झलक पा मीरा नाची
चैतन्य को वो ही लुभाए,
वही हमारा असली घर है
कबिरा उस की बात सुनाये !
.jpeg)

