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सोमवार, मई 2

शब्दों के जंगल उग आते

शब्दों के जंगल उग आते


मात्र मौन है जिसकी भाषा

शब्दों से क्या उसे है काम,

अनहद नाद बहे जो निशदिन 

सहज दिलाए परम विश्राम !


कुदरत जड़ अनंत चेतन है 

मेल कहाँ से हो सकता है,

तीजे हम हैं बने साक्षी

कौन हमें फिर ठग सकता है ?


शब्दों के जंगल उग आते

प्रीत, ज्ञान जिसमें खो जाते,

  सुर निजता का भुला ही दिया

माया का इक महल बनाते !


मन शशि सम घटता बढ़ता है 

निज प्रकाश कहाँ उसके पास,

जिसके बिना न सत्ता उसकी

उस चेतन पर नहीं विश्वास !


थम जाये तन ठहरा हो मन

अहंकार को मिले विश्राम,

मेधा विस्मित थमी ठगी सी

झलक दिखायेगा तभी राम !


वही झलक पा मीरा नाची

चैतन्य को वो ही लुभाए,

वही हमारा असली घर है

कबिरा उस की बात सुनाये !




मंगलवार, जून 16

अनगाया यदि रहा गीत

अनगाया यदि रहा गीत 


अनगाया यदि रहा गीत जो 
गाने आये थे हम भू पर, 
खिला नहीं यदि सरसिज उर में 
मिले नहीं उड़ने को दो पर !

मधुऋतु अगर न मन में उतरी 
फूटी नहीं हृदय की गागर, 
सूना रहा घाट उर सर का 
मन्दिर के द्वारे तक जाकर !

अंतर में यदि नहीं लालसा 
चाह नहीं यदि जगी मिलन की,
कैसे कारागार खुलेगा 
कैसे गूँजेंगे अनहद स्वर !

सोमवार, अक्टूबर 25

अनहद नाद

अनहद नाद

ढोल बजें कभी गरजें मेघ

कान्हा की बांसुरिया की धुन,

चहकें पंछी कभी हजारों

मदिर घुंघरूओं की रुनझुन !


कभी बजें इकतारे के सुर

वीणा पर कभी गूँजें राग,

अद्भुत ध्वनियाँ कौन सुनाये

कौन गा रहा  फागुन, विहाग ?


सुनते सुनते मन खो जाये

गहन मौन भीतर छा जाये,

मौन से उपजे है संगीत

सन्नाटा भी गीत सुनाये !


​​दस्तकें दिल द्वार पर देता

मिलने के उसके यही ढंग,

झलक दिखाता छुप जाता फिर

उस अलेख  के अनगिन हैं रंग !


अनहद नाद गूंजता भीतर

उसके ही संदेशे लाता,

शांति, प्रेम के पुष्प खिलाकर

सुरभि अनोखी से भर जाता !


अनंत ज्योतियों की ज्योति वह

एक सुनहला चेतन   प्रकाश,

स्वयं ही स्वयं पर रीझ मुग्ध

स्वयं को दे असीम आकाश !


अनिता निहालानी
२५ अक्टूबर २०१०