पशुपतिनाथ सहायक बनते
पशु की नाईं रहता सोया
असुर यही चाहे मानव से,
मानव ने साधा है पशु को
बँधा हुआ जाने किस भय से !
बंद रहे घर के बाड़े में
बस उतने घेरे में घूमें,
दूर ले गई रस्सी जितना
बनी फाँस जो पड़ी गले में !
तन को रोटी मिल जाये बस
विचारों की जुगाली मन को,
ज्ञात हुए को फिर-फिर जाने
पुन: भोगता भोगे हुए को !
जब संतति ने दी सुविधाएँ
उनके पीछे पीछे चलता,
जहाँ नहीं समर्थ वे निकलीं
अपनी क़िस्मत रहे कोसता !
‘मैं’ की रस्सी पड़ी गले में
‘मेरे’ का दायरा बनाया,
अविश्वास का विष है भीतर
भय से भरा हुआ मन रहता !
या आँखों पर पड़ा आवरण
या सुविधाओं का प्रलोभ है,
मद, पाखंड, दिखावा मन में
झूठमूठ ही करे योग है !
पशु की नाईं जीवन जिसका
पशुपतिनाथ सहायक बनते,
वही माँगते हविष अहम् का
अंतर पावन भी वह करते !
ये कविता नहीं ,आईना है पर फिर भी ......
जवाब देंहटाएंपशुपति नाथ साथ हैं तो फिर कैसा फिर भी
जवाब देंहटाएं