माँ शारदे
तू ही तो है पहली शिक्षक
भाषाविद् व ज्ञान प्रदायिनी,
मौन सृष्टि में गूँज उठी थी
स्वर-अक्षर भर तेरी वाणी !
गायन-वादन का दिया ज्ञान
मनुज का किया दूर अज्ञान,
परा शक्ति से बन पश्यंती
मध्यमा हुई, वैखरी दान !
परम कृपा के हम अभिलाषी
वाणी मधुर, शुद्ध हो जाये,
भाषा का विकास हो प्रतिपल
शब्दों में भी मौन समाये !
शुभकामनाएं |
जवाब देंहटाएंस्वागत व आभार!
हटाएंशानदार रचना
जवाब देंहटाएंआभार
वंदन
स्वागत व आभार!
हटाएंअति सुन्दर।
जवाब देंहटाएंस्वागत व आभार!
हटाएंबहुत बहुत आभार रवींद्र जी!
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर !
जवाब देंहटाएंस्वागत व आभार!
हटाएंबेहद सुंदर भावपूर्ण अभिव्यक्ति
जवाब देंहटाएंस्वागत व आभार!
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