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रविवार, सितंबर 14

आज राजभाषा दिवस है

आज राजभाषा दिवस है


यानि हिंदी दिवस 

हिंदी अर्थात करोड़ों की मातृभाषा 

और उनसे अधिक की बोलचाल की भाषा, 

सोचने, लिखने-पढ़ने की भाषा, 

स्वप्नों की भाषा 

दिल की गहराई में बसने वाली,

दिल को छूने वाली भाषा!

पंत, निराला और प्रेमचंद की भाषा,

जैनेंद्र, इलाचंद्र जोशी और नरेंद्र कोहली की भाषा, 

उन जैसे हज़ारों कवियों और लेखकों की 

कविताओं और कहानियों की भाषा, 

हर भाव को वक्त करने की क्षमता रखने वाली भाषा,

प्यार और तकरार की भाषा,

मनुहार और दुलार की भाषा, 

लच्छेदार मुहावरों वाली भाषा, 

अनूठी कहावतों और सूक्तियों की भाषा, 

व्यंग्य और हास्य की भाषा, 

खुसरो की मुकरियों से लेकर नवगीत की भाषा, 

अमर गीतों और भजनों की भाषा, 

राष्ट्र भाषा का दावा करती तथा कथित राजभाषा ! 

चुलबुली सी, अल्हड़ नदी सी बहती जाती, 

तट  से अन्य भाषाओं के कुछ मोती चुनती उदार भाषा, 

लोरियों और लोकगीतों की भाषा, 

भारत को हर ओर से बाँध कर रखने वाली भाषा ! 

माँ संस्कृत के ह्रदय के निकटस्थ भाषा, 

देशज, रूढ़ और विदेशी शब्दों को आत्मसात करने वाली भाषा !  




मंगलवार, सितंबर 14

हिंदी दिवस पर शुभकामनाएँ

हिंदी दिवस पर शुभकामनाएँ


सदियों से चले आ रहे 

अविरल विचार प्रवाह के साथ 

जोड़ती है हमें हमारी भाषा 

जिसे  जीवित रखना है 

तो समृद्ध बनाना होगा 

तकनीक से जोड़कर 

रोजगार लायक सिखाना होगा 

हिंदी दिवस पर जरा रुककर देखें 

मंज़िलें तय की हैं कितनी

  कितना सफ़र और तय करना है इसे 

समय-समय  पर बदला है 

हिंदी का स्वरूप भी

अपभ्रंश से प्रकटी

अमीर खुसरो से भारतेंदु हरिश्चंद्र तक 

हिंदी की गंगा बहती रही है 

अवधी और ब्रज से होती 

खड़ी बोली के रूप में विकसित होती आज 

हिंगलिश के जाल में फंसती जा रही है 

शुद्ध भाषा का स्वरूप 

अब सिर्फ किताबों में मिलता है 

सबकी जबान पर एक खिचड़ी भाषा 

चढ़ती जा रही है  !

सोमवार, सितंबर 13

हिंदी दिवस

हिंदी दिवस 


हिंदी दिवस पर अंग्रेजी में ट्वीट करते लोग

 हिंदी प्रेम होने का दम भरते हैं 

हिंदी के एक वाक्य में 

बस दो-चार अंग्रेजी के शब्द मिलाते 

मॉर्निंग में वाक और इवनिंग को योगा करते हैं 

आँख, नाक, कान से पहले 

जान जाता है शिशु आइज, नोजी और इयर

नौनिहालों को अंग्रेजी में झगड़ते देख 

भीतर तक निहाल होते हैं 

दीवाली और होली तो हैप्पी थी ही 

अब कहीं हिंदी दिवस भी 

हैप्पी बोल देने तक ही सीमित न हो जाये 

अंग्रेजी का जो जादू सर पर चढ़ा है 

नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से दूर न ले जाये 

हिंदी फल-फूल रही है अपने बूते पर 

सर्व को ग्रहण करती है 

शुद्ध रहे, हमें रखना है ध्यान 

दिल बहुत विशाल है उसका 

कैसा भी रूप धरे वह हिंदी 

ही कही जाती है !




शनिवार, अक्टूबर 24

व्यक्त वही अव्यक्त हो सके

 व्यक्त वही अव्यक्त हो सके 

हे वाग्देवी ! जगत जननी  

वाणी में मधुरिम रस भर दो, 

जीवन की शुभ पावनता का 

शब्दों से भी परिचय कर दो !


भाषा का उद्गम तुमसे है 

नाम-रूप से यह जग रचतीं,

ध्वनि जो गुंजित है कण-कण में 

नव अर्थों से सज्जित करतीं !


शिव-शिवानी अ, इ में समाए

क से म पंचम वर्गीय सृष्टि,

हर वर्ण में अर्थ भरे कई

मिले शब्दों से जीवन दृष्टि !


कलम उठे जब भी कागज पर 

व्यक्त वही अव्यक्त हो सके, 

निर्विचार से जो भी उपजे 

भाव वही प्रकटाये मानस !


हे देवी ! पराम्बा माता 

कटुता रोष, असत् सब हर ले, 

गंगा की निर्मलधारा सम 

रचना में करुणा रस भर दे !


रविवार, अप्रैल 26

भेद - अभेद

भेद - अभेद 


शब्दों को मार्ग दें तो वे 
भावनाओं के वस्त्र पहन 
 बाहर चले आते हैं 
यदि राह में कण्टक न हों 
बेहिसाब इच्छाओं के 
प्रमाद के पत्थर न रोक लें उनका मार्ग 
तो विमल सरिता से वे बहते चले आते हैं 
धोते हुए अंतर्जगत 
और बाहर भी उजास फैलाते हैं 
शब्दों में छुपा है ऋत
और वाग्देवी ने उन्हें तराशा है 
मानव के पास अस्तित्त्व का 
अनुपम उपहार उसकी भाषा है 
इन्हें मैला न होने दें  
इन्हें तोड़ने का नहीं जोड़ने 
का साधन बनाएं 
मानवता को सुलाने के लिए लोरी न बनें ये 
इनमें क्रांति की चिंगारी सुलगाएँ
कि गिर जाएँ मिथ्या दीवारें 
खो जाएँ सारे भेद 
एक गुलदस्ते की तरह 
नजर आये दुनिया 
घटे अभेद !

सोमवार, फ़रवरी 24

मौन

मौन

मन मौन हुआ जाता है 
मुखर हुआ था सदियों पहले 
शब्दों की चादर ओढ़े, 
घर से निकला... घूम रहा था 
अब लौटना चाहता है 
शब्द काफी नहीं उसके लिए 
जो बयान करना चाहे 
मन अब मौन कहा चाहता है 
शब्द नहीं जिसको कहने के लिए 
दुनिया की किसी भाषा में 
ओस कोई कैसे लिखे 
जो रात  बरस जाती है 
हरियाली को तृप्त करती 
बारिश कोई कैसे लिखे 
जो झर-झर, झर जाती है ! 
खत्म हो गयी है शब्दों की पूंजी 
सब खर्च हो गए जितने मिले थे 
दुनिया की उलझन को बयान करते 
अब न उलझनें बचीं न शब्द 
अब इस नाटक पर 
पर्दा डालना चाहता 
खोजना चाहता है उस स्रोत को ही 
जहाँ से शब्द उतरते हैं 
है 

मंगलवार, जनवरी 23

सारा आकाश मिला है




सारा आकाश मिला है


शब्दों के पंख मिले हैं
सारा आकाश मिला है,
दिल में इक विरह अनोखा
रब में विश्वास मिला है !

पलकों में मोती पलते
नयनों में दीप संवरते,
अधरों पर गीत मिलन के
राहों में रहे बिखरते !

अंतर में अभिलाषा है
खिलने की शुभ आशा है,
बाहर आने को आतुर
बचकानी सी भाषा है ! 

गुरुवार, सितंबर 14

हिंदी दिवस पर

हिंदी दिवस पर


उन अनगिनत साहित्यकारों को विनम्र नमन के साथ समर्पित जिनके साहित्य को पढ़कर ही भीतर सृजन की अल्प क्षमता को प्रश्रय मिला है. जिनके शब्दों का रोपन वर्षों पहले मन की जमीन पर हुआ और आज अंकुरित होकर वाक्यों और पदों के रूप में प्रकटा है.

स्मृतियों का एक घना अरण्य है भीतर..
हाँ, अरण्य, उपवन नहीं.. जहाँ सब कुछ सजा संवरा है
अपनी-अपनी क्यारी में सिमटे हैं गेंदा और गुलाब..
यहाँ तो एक ओर प्रेमचन्द का होरी और हीरा-मोती हैं
दूसरी और महादेवी की नीर भरी बदली का साया
प्रसाद की कामायनी के मनु और इड़ा का वार्तालाप चल ही रहा है
अज्ञेय का शेखर भी अपनी कहानी सुनाता है
गोर्की की माँटालस्टाय की अन्ना भी जीवित है यादों में
टैगोर की आँख की किरकिरी और कोलकाता की भीषण बरसात में भीगता हुआ गोरा
श्रीकांत को कोई भूल सकता है क्या शरतचन्द्र के अनगिनत पात्रों के मध्य
पन्त का कौसानी भी बसा है और इलाचंद्र जोशी के गढ़वाल के ऊंचे-नीचे पर्वत
खिली है शिवानी की कृष्णकली और अमृता प्रीतम के लफ्जों की दास्ताँ
नाच्यो बहुत गोपाल और खंजन नयन के अध्याय सुना रहे हैं अद्भुत गाथा
कबीर और रहीम के शब्दों के तीर भी दिल में चुभे हैं जो आज तक नहीं निकले
गहन हैं बहुत गहन इस अरण्य के रास्ते...


बुधवार, अगस्त 20

फिर भी अनछूया ही रहता



फिर भी अनछूया ही रहता



बन मलयज वन-वन डोल रहा
शशि मुख से बदली खोल रहा
तू पुहिन बिंदु बन कर ढुलका

जल में जीवन रस घोल रहा !

साँझ-सवेरे, विपिन घनेरे
पंकज पादप, मानुष चेहरे,
सब तेरी ही कथा सुनाते


दिवस मनोहर घोर अँधेरे !

हर शब्द तुझे इंगित करता
हर भाव तुझे मन में भरता,
हर भाषा तुझको ही गाती 
फिर भी अनछूया ही रहता !







शुक्रवार, मई 25

जीवन की आपाधापी सच


जीवन की आपाधापी सच

जब दुःख की वीणा छेड़ी थी
पीछे चल रहा जमाना था,
अब सुख का राग उठा जब से
सँग अपने अब वीरानी है !

दुःख ही बोये दुःख ही काटे
सुख की भाषा बेगानी सी,
जीवन की आपाधापी सच
उसकी न कोई निशानी है !

जब बरस रहा सुख का बादल
दुःख की छतरी को ओढ़े हैं,
जब सारा आलम है अपना
तिनके जोड़ें क्यों ठानी है !

कुछ मन को ही सब कुछ मानें
कुछ देह सजाने में शामिल,
कुछ रोग मिलें, कुछ कुंठाएं
क्या व्यर्थ नहीं यह रवानी है !

कोई मांग रहे भिक्षा सुख की
रिश्तों की सांकल खटकाए,
जो स्वयं की प्यास बना घूमे
नयनों से बहता पानी है !

जो नहीं है अपने पास यहाँ
आशा औरों से करते क्यों,
अपने दामन में छिद्र हुए
दोहराई वही कहानी है !