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शुक्रवार, दिसंबर 9

सारा जग अपना लगता है


सारा जग अपना लगता है

लगन लगा दे सबको अपनी
प्रियतम निज रंग में बोड़ दे,
भीतर जो भी टूट गया था
सहज प्रेम से उसे जोड़ दे !

विषम कलुष कटुता भर ली थी
परम नाम की धारा धो दे,
जो अभाव भी भीतर काटे
अनुपम धन भर उसको खो दे !

अस्तित्त्व की कृपा हो अनुपम
संतुष्टि से भरे अंतर मन,
अथक हुए पग बढ़ते जायें
सोने सा चमके यह जीवन !

सुख आये या दुःख, प्रसाद हो
तुमसे ही आता है, प्रिय हो,
तू अपने ही निकट ला रहा
जो भी तुझको भाए, प्रिय हो !

छोड़ दिये सभी राग-विराग
सारा जग अपना लगता है,
भीतर से चट्टान उठ गयी
एक खजाना भी दिखता है !

जहाँ प्रेम है वहाँ परम है 
कैसा भेद कैसा अलगाव,
पुलक जग रही जो तृण-तृण में
है चहुँ ओर तेरा ही भाव !

प्रेमिल पाठ पढ़ाते हो तुम
सारे जग को मीत बनाते,
सबके भीतर तुम ही बैठे
कर बहाने पास हो लाते !