खत
किसी सूनी शाम को
हथेलियों पर ठोड़ी टिकाये
लिखने वाली मेज पर बैठे
कोई बात फड़फड़ायी होगी तुम्हारे मन में
लिखो फिर काट दो
तकते रहो निरुद्देश्य दीवार को
अपनी आवाज को
सुनने का प्रयत्न करते
आँखों से दो कतरे शबनम के ढुलक कर
बैठ गए होंगे कापी पर
कैसा सम्बोधन ! अनोखा भीगा सम्बोधन
अभिवादन के लिए सारा शब्दकोश
ढूंढ आया होगा तुम्हारा मस्तिष्क
कि बाहर से अकेले पक्षी की
हूक सिमट आयी होगी कमरे में
.. उस कागज में
और एक लिफाफा तैयार !