विश्व महिला दिवस पर
राह अब भी बहुत शेष है
बनने लगे हैं कितने ही बिंब
मन की आँखों के सम्मुख
छा जाते बन प्रतिबिंब
कौंध जाते कितने ही ख़्याल हैं
आख़िर यह विश्व की
आधी आबादी का सवाल है
ऐसा लगता है दुनिया
एक पहिये पर ही
आज तक चलती रही है
तभी शायद इधर-उधर
लुढ़क सी रही है
किंतु अब समाचार सुनें ताजे
घुट-घुट कर जीने के दिन गये
उठने लगी हैं आवाजें
उन्हें भी भागीदार बनाओ
बराबरी का हक़ दिलाओ
कम से कम जीने तो दो
बुनियादी अधिकारों को
अब बन रही है ऐसी दुनिया
जहाँ पक्षपात नहीं होगा
मौक़ा मिलेगा हरेक को
हुनर दिखाने का
सजग है आज की महिला
कि वह शक्ति का पुंज है
और होकर रहेगी वह
जो होना चाहती है
उसे अनुसरण मात्र नहीं करना है
अपने सपनों में स्वयं रंग भरना है
इसलिए आज का दिन विशेष है
पर राह अब भी बहुत शेष है
हाशिये पर खड़ी हैं अनगिनत महिलाएँ
वे भी आगे आयें, ताकि
युद्ध में झोंकी जा रही है जो दुनिया
फिर से हँसे और गुनगुनाए !
