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सोमवार, जुलाई 7

अब



अब

बहुत हुआ खेल, अब चलो
कुछ काम की बातें कर लें
उससे पहले कि पर्दा उठ जाये
उससे दोस्ती बना लें
कहीं ऐसा न हो, खो जाये
एक श्वास व्यर्थ ही
अनंत के इस गह्वर में
या फिर चूक जाये एक बार फिर
कोई गीत रचे जाने से एक क्षण पूर्व
खो जाये कोई उजास जलने से पूर्व ही
या कली की मौत हो फूल बनने से पहले
और उससे दोस्ती बनाने के बाद
जो हो सो हो
 जो होना है सो हो जाये ! 

सोमवार, मार्च 31

बन जाये मन स्वयं उजास

बन जाये मन स्वयं उजास




झर जाता है कुम्हलाया पुष्प
 धरा पर आहिस्ता से जैसे
बिखर जाती है पाँखुरी-पाँखुरी
सहजता से विलग हो डाली से
पिघल जाये वैसे ही सारी उदासी
मन रहे निर्मल.. पल पल..
यही प्रार्थना है !

हर बादल बरस जाता है जैसे
निज भार से हो पीड़ित
बिखर जाती है बूँद बूँद
सहजता से धरा पर
खो जाये हर छोटी बड़ी कामना
 खिला रहे मन का आकाश..
निरभ्र नील वितान सा
यही अर्चना है !

उजाला भर जाता है जैसे
नन्हा सा एक दीया..
जल जाये दुःख के तेल में
बाती अहंकार की
बन जाये मन स्वयं उजास
यही वन्दना है !



शुक्रवार, अक्टूबर 1

रह-रह कर भीतर वंशी धुन

रह-रह कर भीतर वंशी धुन

बिखरा है बन कर उजास
मिलता है तू श्वास-श्वास
कहाँ समेटूँ कहाँ समोऊँ
पूछ रहा मन ले उच्छ्वास !

पलकों में मुस्कान छिपी
अश्रु रस्ता भूल गए हैं
अधरों पर नित गीत सजे
पुष्प प्रीत के झूल गए हैं I

मौसम मस्त हुआ मन भाए
फागुन जीवन से न जाये
थिरके कदम चाल बहकी सी
नाम खुमारी जब चढ़ जाये I

पोर-पोर में गंध उठ रही
कोर-कोर में सुलगे अग्नि
रह-रह कर भीतर वंशी धुन
पंछी स्वर वीणI सुर ध्वनि I

लूट मची है ले लो राम
जग में न कोई दूजा काम
सत्य का दामन थामा जिसने
मिलता उसको ही विश्राम I

सुख सरिता में डूब रहा मन
भीतर उग आये हैं उपवन
कितना सुंदर क्रम जीवन का
नेह पगा है मन का कण कण I

अनिता निहालानी
१ अक्तूबर २०१०