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शुक्रवार, जुलाई 5

जीवन का यह कलश रीतता

जीवन का यह कलश  रीतता


कितना रस्ता चल कर आया 

फिर भी कहीं नहीं पहुँचा है, 

जाने कब यह राज खुलेगा 

मंज़िल पर ही सदा खड़ा है !


एक सुकून उतरता भीतर 

मधुर परस जब उसका मिलता,

जिसका पता खोजते ही तो 

जीवन का यह कलश रीतता ! 


नेति-नेति के पथ पर चल कर 

उसके द्वारे जाना होगा, 

 तज कर सभी प्रवेश मिलेगा 

सहर्ष सभी लुटाना होगा !


हल्का होकर तभी उड़ेगा 

जैसे कोई  श्वेत पंख हो,

या तुषार  की पावन बूँदें 

फूलों की भीनी सुगंध हो !


होकर अगर न होना आये 

यही राज उसने सिखलाया, 

जैसे विमल  भोर का तारा 

अगले  ही पल नज़र न आया !


बुधवार, सितंबर 13

जाने कब वह घड़ी मिलेगी

जाने कब वह घड़ी मिलेगी 

 
तुमको ही तुमसे मिलना है 
खुला हुआ अविरल मन उपवन, 
जब जी चाहे चरण धरो तुम
सदा गूंजती मृदु धुन अर्चन ! 

न अधैर्य से कंपतीं श्वासें 
शुभ्र गगन से छाओ भीतर, 
दिनकर स्वर्ण रश्मि बन छूओ
कुसुमों की या खुशबू बनकर ! 

कभी न तुमको बिसराया है 
जगते-सोते याद तुम्हारी, 
उठती-गिरती पल में झलके 
मेघों में ज्यों द्युति चमकारी ! 

जाने कब वह घड़ी मिलेगी 
कब ढ़ुलकोगे अमी कलश से, 
टूटेंगी कब सीमाएं सब 
प्रकटोगे श्यामल झुरमुट से ! 

अब जो भी बाधा है पथ में
वह भी दूर तुम्हें करनी है 
सौंप दिया जब शून्य, शून्य में 
तुम्हें कालिमा भी हरनी है !