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बुधवार, जून 17

मंज़िल और रास्ते

मंज़िल और रास्ते

जिसने जाना, जो भी जाना 

वह कहा नहीं जा सकता 

जो कहा गया है 

वह मार्ग की खबर देता है 

मंज़िल की नहीं 

वहाँ तो ख़ुद ही जाना होता है 

कोई चल सकता है जिस मार्ग पर 

वही सौंपा जाता है 

अस्तित्त्व के द्वारा 

हरेक का मार्ग उसका अपना है 

भाग्य भी उसका साथ देता है 

जो चल पड़ा है 

उसका नहीं 

जो अभी सोच में ही पड़ा है 

या रास्ते पर ही खड़ा है 

औषधि है हर रोग की यहाँ 

इलाज हर किसी का होता है 

भगोड़ा बन गया जो जीवन से 

वह बार-बार उसे खोता है !

 

मंगलवार, मई 5

एक रागिनी है मस्ती की

एक रागिनी है मस्ती की


इक ही धुन बजती धड़कन में

इक ही राग बसा कण-कण में,

एक ही मंजिल, एक  रस्ता

इक ही प्यास शेष जीवन में !


इक ही धुन वह निज हस्ती की

एक रागिनी है मस्ती की,

एक पुकार सुनाई देती

दूर पर्वतों की बस्ती की !


मस्त हुआ जाये ज्यों नदिया

पंछी जैसे उड़ते गाते,

उड़ते मेघा संग हवा के

बेसुध छौने दौड़ लगाते !


खुल जायें जैसे नीलगगन 

उड़ती जैसे मुक्त पवन है,

क्यों दीवारों का कैदी है 

उर परम प्रीत की लगे लगन  !


एक अजब सा खेल चल रहा

लुकाछिपी है खुद की खुद से,

ख़ुद ही कहता ढूँढो मुझको

ख़ुद ही बंध दूर है खुद से ! 


 

शनिवार, अप्रैल 25

नई मंजिलें राह देखतीं

नई मंजिलें राह देखतीं

 

जाने कहाँ-कहाँ से आते 

मन दिन-रात गुना करता है,

कई विचारों के गालीचे

यह दिन-रात बुना करता है !

 

सोये-सोये जन्मों बीते ,

 अब तो जगे भाग्य जो खोया, 

वही मिलेगा इस जीवन में 

जो कुछ कल हमने था बोया!

 

रंग भरें सुकल्पनाओं में, 

जीवन का पथ सुंदर होगा

नित्य नया निखार आयेगा, 

पहले से सुंदर कल होगा !

 

ऋतु आने पर बीज पनपते 

भीतर कोई चेता देता,

शुभ संकल्प बीज के सम ही 

सही समय पर ही फल देता!

 

नई मंजिलें राह देखतीं, 

रस्ते कुछ नव बुला रहे हैं

कर्म सदा हों सबके हित में, 

गीत यही तो सुना रहे हैं!


शुक्रवार, अगस्त 22

नई मंज़िल का पता पा

नई मंज़िल का पता पा 


दूर हों अज्ञान से हम 

कामनाएँ मिट रहें, 

स्वयं में ही तृप्त हो मन  

 कोई अभाव न खले !


किसी क्षण में वह परम मिल 

उसी पथ पर ले चले, 

दूर होगी हर इक कलल 

संग उसके मन हँसे !


यज्ञ की ज्वाला उठेगी

मिलन का उत्सव मने, 

नई मंज़िल का पता पा  

ज्योति सा मन खिल उठे !



शनिवार, अगस्त 9

चलते जाना ही है मंज़िल

चलते जाना ही है मंज़िल 


भेद-भाव सारे ऊपर हैं 

नीचे सम-रसता की धारा, 

जाति, धर्म ओढ़े ऊपर से 

नहीं बनें वे दुर्गम कारा !


कलम हाथ में अगर न थामी 

शब्दों को दे कौन सहारा, 

यादों की कंदील जल रही 

पथ पर करती सहज उजारा ! 


चलते जाना ही है मंज़िल 

दूर कहाँ है? निकट किनारा 

दिल की दिल में ही रह जाती  

देखो किसी ने पुन: पुकारा !


बटन दबाते आती बिजली 

जगमग जैसे घर हो सारा, 

याद ह्रदय में पावन जिसने 

दिपदिप मन का आँगन बारा ! 


रविवार, जुलाई 6

अब

अब 


चीजें अब साफ़ हो गयीं 

 अंधेरा छँटने लगा है

 पहचान रहा मन मंज़िल को

जो भ्रमित करता रहा है 

 पकड़ी है प्रकाश की डोरी

जीवन जैसे एक किताब कोरी 

जिसमें लिखा जाना है 

हर पल एक शब्द नया

 हो चाह कोई भी 

मन सरवर कर देती है गंदला

चीजें जैसी हैं 

वैसी बहुत सुंदर हैं 

 अंतर सहलाती 

भोर की शीतल पवन

तृप्त करे पंछियों का कलरव 

आकाश सब ओर घेरे है 

और धरती में  

फैल गई हैं जड़ें नीचे तक 

जब सरल हो जाये जीना 

तब मरने का भय नहीं ! 


रविवार, अप्रैल 20

घर इक मंज़िल

घर इक मंज़िल 

 इन वक्तों का यही तक़ाज़ा

 रहे ह्रदय का ख़्वाब अधूरा, 


बनी रहे मिलने की ख्वाहिश 

जज़्बा क़ायम कुछ पाने का !


है स्वयं पूर्ण, जगत अधूरा

मिथ्या स्वप्न, सत्य है पूरा, 

 

 क्षितिज कभी हाथों ना आता

चलता राही थक सो जाता !


 फूलों के दर्शन हो सकते

मंज़िल कहाँ मिलेगी मग में, 


लौट जरा अपने घर आना 

वहीं मिलेगा सरस ठिकाना !


मंगलवार, फ़रवरी 18

चाह

चाह


स्वयं को केंद्र मानकर

दूसरे को चाहना 

पहली मंजिल है

जो हर कोई पा लेता है 

दूसरे को केंद्र मानकर

स्वयं को समर्पित कर देना 

दूसरी मंज़िल है 

जिसकी तलाश पूरी होने में

 समय लगता है 

न स्वयं, न दूसरे को 

अस्तित्त्व को केंद्र मान

मुक्त हो जाना है

अंतिम सोपान 

खुद से पार चला जाये जब कोई

तब सिद्ध होता है अभिप्राय

काश ! सबके जीवन में

जल्दी ही ऐसा दिन आए !



गुरुवार, अक्टूबर 24

जीवन यही तो माँगता

जीवन यही तो माँगता


हम कौन हैं ? यह याद है ?

गर याद,  दिल आबाद है 

आबाद है इक ख़्वाब से 

मंज़िल यहीं, इस बात से  !

 

 है याद? हमको क्या मिला?

गर याद है तो क्या गिला !

पग धरने को धरती मिली 

उड़ने को आसमां मिला !


साँसे मिलीं, इक मन मिला 

 मन में बसा प्रियतम मिला, 

 यह याद है ? क्या भेंट दी 

गर याद है तो क्या किया ? 


माँगा सदा चाहा सदा 

सिमटा ह्रदय बाँटा कहाँ,

जो पास अपने गर लुटा 

रोशन रहे दिल का जहाँ  !


सुख-चैन बरसेगा अगर 

चलता रहे दिन-रात बस 

हम कौन?हमको क्या मिला? 

से क्या दिया? का सिलसिला !


शुक्रवार, जुलाई 5

जीवन का यह कलश रीतता

जीवन का यह कलश  रीतता


कितना रस्ता चल कर आया 

फिर भी कहीं नहीं पहुँचा है, 

जाने कब यह राज खुलेगा 

मंज़िल पर ही सदा खड़ा है !


एक सुकून उतरता भीतर 

मधुर परस जब उसका मिलता,

जिसका पता खोजते ही तो 

जीवन का यह कलश रीतता ! 


नेति-नेति के पथ पर चल कर 

उसके द्वारे जाना होगा, 

 तज कर सभी प्रवेश मिलेगा 

सहर्ष सभी लुटाना होगा !


हल्का होकर तभी उड़ेगा 

जैसे कोई  श्वेत पंख हो,

या तुषार  की पावन बूँदें 

फूलों की भीनी सुगंध हो !


होकर अगर न होना आये 

यही राज उसने सिखलाया, 

जैसे विमल  भोर का तारा 

अगले  ही पल नज़र न आया !


शनिवार, दिसंबर 23

मेघा ढूँढें आसमान को

मेघा ढूँढें आसमान को 


मंज़िल पर ही बैठ पूछता 

और कहाँ ? कितना जाना है ?

क्यों न कहें उर को दीवाना 

अब तक भेद नहीं जाना है !


सागर में रहकर ज्यों लहरें 

घर का पता पूछती मिलतीं,

मेघा ढूँढें आसमान को 

घोर घटाएँ नीर खोजतीं !


लिए प्रेम का एक सरोवर 

प्यासा उर प्यासा रह जाता, 

पनघट तीर खड़ा है राही 

इधर-उधर तक टोह लगाता !


भीतर एक आँख जगती है 

कोई साथ चला करता है, 

देख न पाये चाहे उसको 

योग-क्षेम धारण करता है !


आराध्य बना लेगा अंतर 

मस्तक जिस दिन झुक जाएगा, 

गीत समर्पण के फूटेंगे  

प्राणों में बसंत छायेगा !


गुरुवार, मार्च 30

एक आभा मय सवेरा



एक आभा मय सवेरा

नींद टूटे, जोश जागे 
हृदय से हर सोग भागे, 
याद में हो मन टिका जब 
टूटते हैं मोह धागे !

प्रेम का सूरज दमकता 
ज्योत्सना बन शांति छाए, 
एक आभा मय सवेरा 
तृप्ति की हर रात लाए !

मुक्त उर से गीत फूटे 
कर्म की ज़ंजीर बिखरे,
मिले जग को प्राप्य उसका 
रिक्त मन की गूंज उतरे !

आस का  दीपक न बुझता 
सहज सम्मुख मार्ग दिखता, 
नहीं मंज़िल दूर कोई 
हर घड़ी वह मीत मिलता !

हर कहीं मौजूद है वह
समय केवल एक भ्रम है, 
कल वही था आज भी है 
वहाँ था जो यहाँ भी है !

गुरुवार, अगस्त 26

एक मंजिल एक रस्ता

एक मंजिल एक रस्ता 

तुम्हीं से  मधुमास मेरा

तुम्हीं से  संसार है

तुम न हो तो व्यर्थ सारा, 

यह मधुर  श्रृंगार है !


मन अभी खिलने न पाया 

जब नया था यह सफर,

जिस घड़ी यह हाथ  थामा  

चल पड़े हम इस डगर !


सदा तब से इस हृदय को 

प्रेम का आधार है,

तुम न हो तो व्यर्थ सारा, 

यह मधुर  श्रृंगार है !


जिंदगी में ज्वार-भाटे, 

सरिता सुख-दुःख भरी,

धूप-छांव से हैं रस्ते, 

सूखतीं डालें हरी !


किन्तु रहता एक सा ही

बस तुम्हारा प्यार है,

तुम न हो तो व्यर्थ सारा

यह मधुर  श्रृंगार है !


एक मंजिल एक रस्ता 

एक ही अपना चल,

चाँदनी ओढ़ी बदन पर  

संग सूरज की तपन !


पुलकित  हो अधर कंपते, 

नयन में मनुहार है,

तुम न हो तो व्यर्थ सारा, 

यह मधुर  श्रृंगार है !



२६ अगस्त २०१०