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सोमवार, मार्च 7

युद्ध की विभीषिका

युद्ध की विभीषिका 


जो खेल सकते थे 

रंगों की होली   

वे खून की होली खेल रहे हैं 

हथियारों और सत्ता मद में चूर कुछ लोग 

उन्हीं को रौंदते जा रहे 

जिन पर अपना दावा करते हैं 

विनाश की यह दुर्दांत लीला 

दोहरायी गयी है जाने कितनी बार 

नफरत की आग में झुलसता रहा है हर बार प्यार 

जब छिड़ा नहीं था युद्ध 

उकसाया जाता रहा 

परिणाम की परवाह किए बिना 

जोशीले नारों को उछाला जाता रहा 

रक्तरंजित हुई है धरा फिर एक बार 

शांति की हर पहल हुई है नाकाबिल 

एक सैनिक की मौत भी 

धब्बा है मानवता के नाम  

भुगतता पड़ेगा आने वाली पीढ़ियों को 

जिसका अंजाम 

अहिंसा, प्रेम और करुणा ने 

जैसे आज हार मान ली है 

तभी तो एक देश के हर आदमी ने 

बंदूक़ थाम ली है !


सोमवार, दिसंबर 31

नए वर्ष की दास्तान


नए वर्ष की दास्तान

कैसे कहें शुभ हो नव वर्ष
जब की बिछी है सामने
जाते हुए वर्ष की खून से लथपथ देह
पिछले वर्ष भी तो यही कहा था
पर नहीं थमा आतंक
रुका नहीं मौत का तूफान...
लील गया
कभी निर्दोष स्कूली बच्चों को
लुटती रही अस्मत मासूमों की
कभी राजधानी की सड़कों पर
इतना बेरहम हो गया इंसान !
 आज कौन किसकी सुनता है ?
दी, ली, जाती हैं शुभकामनाएँ
पहले से कहीं ज्यादा पर  
कौन किसको सुनता है ?
बादल गरज कर चले गए, मोर नहीं नाचे
कौन रुकता है कूक कोकिल की सुनने 
सड़क पर खून से सने व्यक्ति की
सुनी नहीं पुकार जब किसी ने
कान नहीं दिए पड़ोसी ने
जब मचता रहा हाहाकार...
नहीं सुनती जनता भी जब सच की आवाज
तो नहीं ही सुनते नेता बैठकर
होता जब अत्याचार...
बदल जायेगा कैलेंडर आधी रात को
पर क्या बदल पायेगा नसीब हम मानवों का
जो बने हैं दुश्मन अपनी ही जान के
तो कैसे कहें शुभ हो नव वर्ष...