गहराई
चेतना जुड़ती है जगत में
इससे-उससे
लोगों, विचारों
क्रिया और वस्तुओं से
शायद कुछ भरना चाहती है
नहीं जानती
भीतर अंतहीन गहराई है
जो नहीं भरी जा सकती
किसी भी शै से
इसी कोशिश में
कुछ न कुछ पकड़ लेता है मन
और जिसे पकड़ता
वह जकड़ लेता है
फिर छूटने उस जकड़न से
साधता है वैराग्य
ऐसे ही बनता है
मानव का भाग्य !
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