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रविवार, फ़रवरी 16

गहराई

गहराई 


चेतना जुड़ती है जगत में 

इससे-उससे 

लोगों, विचारों 

क्रिया और वस्तुओं से 

शायद कुछ भरना चाहती है 

नहीं जानती 

भीतर अंतहीन गहराई है 

जो नहीं भरी जा सकती 

किसी भी शै से 

इसी कोशिश में 

कुछ न कुछ पकड़ लेता है मन 

और जिसे पकड़ता 

वह जकड़ लेता है 

फिर छूटने उस जकड़न से 

साधता है वैराग्य 

ऐसे ही बनता है

 मानव का भाग्य !



मंगलवार, दिसंबर 17

मन से कुछ बातें

मन से कुछ बातें



मन ! निज गहराई में पा लो, 

एक विशुद्ध हँसी का कोना 

 बरबस नजर प्यार की डालो 

बहुत हुआ अब रोना-धोना !


किस अभाव का रोना रोते 

 उपज पूर्ण से नित्य पूर्ण हो, 

 सदा संजोते किस कमी को

खुद अनंत शक्ति का पुंज हो !


स्वयं ‘ध्यान’ तुम ‘ध्यान’ चाहते 

लोगों का कुछ ‘ध्यान’ बँटाकर 

निज ताक़त को भुला दिया है 

इधर-उधर से माँग-माँग कर !


आख़िर कब तक झुठलाओगे 

अपनी महिमा के पर्वत को, 

नज़र उठाकर ऊपर देखो 

उत्तंग शिखर छूता नभ को !


रोज-रोज का वही पुराना 

छोड़ो भी अब राग बजाना, 

कृष्ण बने सारथी तुम्हारे 

कैसे  कोई चले  बहाना !




बुधवार, अप्रैल 11

भीतर एक यात्रा चलती



भीतर एक यात्रा चलती


जीवन एक सफर है सुंदर
चलते ही जाना है नियति,
जन्म पूर्व ही शुरू हुआ जो
न मृत्यु में भी पूर्णाहुति !

चलते जाना बने सार्थक
नए अनूठे रंग भरें नित,
जीवन की गहराई छू लें
सँग भी चलें अपनों के हित !

श्वासें लेना नहीं है काफ़ी
बिखरे, बंटे सदा यह जीवन
प्रेम, समर्पण, शांति, आस्था
महकाए नित मन का उपवन !

भीतर एक यात्रा चलती
बाहर, ज्यों-ज्यों कदम बढाते,
ऊँचाई सँग, गहराई भी
स्नेहिल नाते ज्यों गहराते !  

जड़ता या प्रमाद न आये
मन में कभी दुराव न छाये,  
निर्मल जल सा सदा बहे यह
दौड़ कभी खुद से न छुड़ाए !

स्वयं से शुरू हुआ सफर यह
स्वयं पर ही आकर थमता है,
गुनगुन करतीं राहें मिलतीं
भीतर जब दीया जलता है !