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शनिवार, मार्च 9

सत्यमेव जयते


सत्यमेव जयते


कहा जा रहा है
जो भी कहा जाना चाहिए
न ही छिपा है और न ही थमा है
हो रहा है विरोध
जो किया जाना चाहिए
हर जुल्म के खिलाफ खड़ा है कोई न कोई डटकर
जिसका गुलशन है नहीं रह सकता कभी वह बेखबर
सुन लेता है चींटी की आवाज भी जो
भर देता है वही शोले किसी कलम में
सुलगती ज्वालायें किन्हीं दिलों में
जो निगल जाएँगी हर अन्याय को
तुम बढ़ते रहो अपनी डगर पर
होकर निडर
और नहीं सोचो एक क्षण के लिए भी
कि इंसाफ की इस राह पर तुम अकेले हो
अस्तित्त्व का हर कण भी लड़ रहा है वही युद्ध
जो किसी सुदूर कोने में लड़ा जा रहा है
किसी बेबस माँ द्वारा अपने शिशु की रक्षा के लिए
अथवा किसी खेतिहर द्वारा जमीन की रक्षा हित
उठ रही हैं आवाजें हर कोने में
और नहीं दबाया जा सकता उन्हें
पहरे कितने ही संगीन हों और
दीवारें कितनी ही अजेय
झूठ कितने ही सजीले वेश धरें
सच की ही होगी विजय !

गुरुवार, जुलाई 26

एक बातचीत


एक बातचीत

न आये थे अपनी मर्जी से
न ही जायेंगे...
तू ही लाया..ले भी जाना जब चाहे
हम न आड़े आएँगे
तेरी हवा से धौंकनी चलती है
श्वासों की
तेरी गिजा से देह..
मिला मौका सजदा करने का
तेरी जमीं पर
गुनगुनाने का
तेरे आसमां तले
क्या हम काबिल थे इसके..
तेरी जन्नत को दोजख बनाने के सिवा
क्या आता है हमें...
तेरी रहमत को देखकर भी
सिवा आँखें चुराने के
क्या किया है हमने
तेरी मुहब्बत की परवाह न करें
तुझसे बस शिकवा किया करें
(तेरे बन्दों से शिकवा तुझसे ही हुआ न )
ओ खुदा...बस यही एक बात है
जब तब आ जाता है
तेरा नाम जुबां पर
तेरा ख्याल जहन में
और वही पल होता है
जब सुकून मिलता है
भीतर तेरी याद कौंध जाती है
तू अपना है तभी न अपना सा लगता है
जगत यह दिखता हुआ भी सपना लगता है
छिपा है तू सात पर्दों के पीछे
फिर भी झलक दिख जाती है
झाँकू जब किसी बच्चे की आँखों में
तेरी ही सूरत नजर जाती है...