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बुधवार, नवंबर 6

भोर के तारे सा छुप जाएगा जग


भोर के तारे सा छुप जाएगा जग 



बंद आँखों से जमाना देखते हैं हम कहाँ अक्सर हकीकत देखते हैं चाह की चादर ओढ़ायी थी किसी ने यूँही अपना हक समझ कर देखते हैं दोनों हाथों से जकड़ चलते रहे दिल को ही बढ़कर खुदा से देखते हैं जिस राह पर दुश्वारियां मंजिल नहीं ख़्वाब उस के ही दिलों में देखते हैं भोर के तारे सा छुप जाएगा जग पत्थरों में निशां उसके देखते हैं जो सुकूं का, है समंदर प्रीत का भी उसे सदियों दूर से ही देखते हैं आसमां है बदलियां, बारिशें, धूप जो जरूरी जुड़ उसी से देखते हैं

बुधवार, मई 29

उसको खबर सभी की



उसको खबर सभी की

खोया नहीं है कोई भटका नहीं है राह
अपने ही घर में बैठा बस घूमने की चाह

जो दूर से भी दूर और पास से भी पास
ऐसा कोई अनोखा करता है दिल में वास

उसको खबर सभी की जागे वह हर घड़ी
कोई रहे या जाये बाँधे नहीं कड़ी

इक राज आसमां सा खुलता ही जा रहा
वह खुद ही बना छलिया खुद को सता रहा

नजरों से जो बिखरता उसका ही नूर है
कहता दीवाना दिल वह कितना दूर है

कोई फूल फूल जाकर मधुरस बटोरता है
मीठी सी इक डली बन वह राह जोहता है

बुधवार, जून 25

भूलना फितरत हमारी


भूलना फितरत हमारी


हर कदम पर इक चुनौती हर कदम पर इक दोराहा
हर कदम इक होश माँगे दे झलक उसकी जो चाहा

भूलना फितरत हमारी भूल जाते हर खुदाई
पुनः तकते आसमां को रिश्ता हर उसने निबाहा

जाने कैसी फांस भीतर आदमी के दिल में है
गुलशनों को काट उसने मरूथलों को है सराहा

क्या नहीं है पास उसके जाने क्या फिर खोजता
इक ललक सोने न देती बड़ी शिद्दत से कराहा

कैद अपने कब्र में है मौत से पहले हुआ
जिन्दगी जी भी न पाया मृत्यु का आया चौराहा  

सोमवार, अप्रैल 1

आसमां की मौन चादर


आसमां की मौन चादर



श्वेत कंचन खिलखिला कर
तितलियाँ कुछ मुस्कुरा कर
श्याम भंवरे गुनगुना कर
क्या सुनाते हैं ? सुनें हम !

पंछियों की चहचहाहट
पत्तियों की सरसराहट
पवन की सरगोशियाँ ये
क्या बताती हैं ? गुनें हम !

आसमां की मौन चादर
ध्या रही किसको निरंतर
नीलिमा की रश्मियाँ ये
क्यों सजाती है ? कहें हम !

दूब कोमल सिर उठाती
दबी फिर भी महमहाती
राह को सुंदर बनाती
क्यों सुहाती है ? जगें हम !

रंग सूरज ने उकेरे
गंध धरती की बिखेरें,
कुसुम अनगिन रूप वाले
खबर किसकी दें, भजें हम !

एक सुर गूंजे फिजां में
एक गुंजन कहकशां में,
एक मस्ती सी समां में
क्या लुटाती है, भरें हम !

गुरुवार, जुलाई 26

एक बातचीत


एक बातचीत

न आये थे अपनी मर्जी से
न ही जायेंगे...
तू ही लाया..ले भी जाना जब चाहे
हम न आड़े आएँगे
तेरी हवा से धौंकनी चलती है
श्वासों की
तेरी गिजा से देह..
मिला मौका सजदा करने का
तेरी जमीं पर
गुनगुनाने का
तेरे आसमां तले
क्या हम काबिल थे इसके..
तेरी जन्नत को दोजख बनाने के सिवा
क्या आता है हमें...
तेरी रहमत को देखकर भी
सिवा आँखें चुराने के
क्या किया है हमने
तेरी मुहब्बत की परवाह न करें
तुझसे बस शिकवा किया करें
(तेरे बन्दों से शिकवा तुझसे ही हुआ न )
ओ खुदा...बस यही एक बात है
जब तब आ जाता है
तेरा नाम जुबां पर
तेरा ख्याल जहन में
और वही पल होता है
जब सुकून मिलता है
भीतर तेरी याद कौंध जाती है
तू अपना है तभी न अपना सा लगता है
जगत यह दिखता हुआ भी सपना लगता है
छिपा है तू सात पर्दों के पीछे
फिर भी झलक दिख जाती है
झाँकू जब किसी बच्चे की आँखों में
तेरी ही सूरत नजर जाती है...