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रविवार, जनवरी 11

नये साल की कविता

नये वर्ष के लिए हार्दिक शुभकामनाएँ 


नये साल में निर्दोष न मारे जायें 

 हो नहीं अन्याय का शिकार भी कोई, 

बंद हों युद्ध, करें  निर्माण देशों का 

हो हितैषी ‘ए आइ’ न छल करे कोई !


मिटे विषमता, हर भेद मिटे दुनिया से 

हर इंसान, इंसान की क़ीमत जाने, 

दिल की गहराई में झांक सके मानव 

नहीं किसी को, कभी भी पराया माने !


एक ही लौ, जल रही है हरेक दिल में 

 संग शीतलता के जो उजाला देती, 

नूतन वर्ष  में बने वही पथ प्रदर्शक 

युगों-युगों से जो सदा हौसला देती !


बुधवार, मार्च 16

कश्मीर गाथा


कश्मीर गाथा 


कश्मीर को धरती का स्वर्ग कहा जाता है 

पर इसने नरक से भी बदतर हालात देखे हैं 

जहाँ ऋषियों की वाणी गूंजती थी 

जहाँ के संस्कार, आचार, विहार 

गवाही देते थे एक विकसित सभ्यता की 

साहित्य, संगीत, कला और अध्यात्म की 

ऊँचाइयों को छुआ था जिसने 

शिव की वह पावन भूमि 

जहाँ ज्ञान की अविरल सरिता बहती आ रही थी युगों से 

हिमालय के उत्तंग शिखरों के सान्निध्य में 

जहाँ अनेक ग्रंथों की रचना हुई 

पर जिसे नरक बना दिया चंद लुटेरों ने 

तलवार के बल पर धर्मांतरण कराया 

कट्टरपंथी शैतानों ने 

बेइंतहा दहशत फैलायी 

दरिंदगी और हैवानियत का सुबूत दिया 

धर्म के नाम को रुसवा किया

कश्मीर  का इतिहास 

निर्दोष शांति प्रिय पंडितों के खून से रंगा है 

जिसके धब्बे आज भी वहाँ की वादियों से  मिटे नहीं हैं 

मुखर हुई इस सच्चाई को देखकर 

किसका दिल नहीं दहल जाएगा 

किसकी रूह नहीं काँपेगी भीतर तक 

कौन खून के आँसू नहीं रोएगा 

सम्पूर्ण मानवता का दर्द समाया है इसमें 

आज शामिल हुआ है 

हर भारतीय का दिल भी उनके दर्द में 

जिनकी आवाज़ को दबा दिया गया 

जो अपने ही घरों से भागने  पर मजबूर किए गये 

जिन्हें अपने ही वतन में जलावतन होना पड़ा 

यह पीड़ा दिनों, हफ़्तों, महीनों शायद जीवन बाहर रुलाती रहे 

जगाए ज़मीर उनका जो ज़िम्मेदार हैं इसके लिए 

या उनका जो कुछ कर सकते थे, पर नहीं किया 

कहाँ थी भारतीय सरकार उस काली रात को 

कहाँ थे कानून के रखवाले 

कितना बेबस नज़र आता था हर कोई 

शायद तब कमजोर था देश 

हर तरह से कमजोर 

जो आज तक छिपाए रहा अपने दर्द को 

पर आज दिखा सकता है हर कटु सत्य को 

 हर विरोध का सामना करने की ताक़त है आज

आज पूरा देश खड़ा है 

अन्याय के ख़िलाफ़ इस युद्ध में 

कम पड़ते हैं शब्द कहने को वह पीड़ा 

जो भीतर टीस जगाती है 

जिन पर गुजरी उनकी याद करके 

कैसा  हौल उठता है  

एक चुप सी भर जाती है कभी 

और कभी रह-रह कर 

दिल काँप उठता है 

लेकिन यह दर्द मरहम बनेगा 

यकीनन कश्मीर का हाल बदलेगा 

फिर से गूँजेगीं वहाँ वेद की ऋचाएँ 

और घरों से सुर संगीत की धारा बहेगी 

हम देखंगे 

हाँ ऐसा होगा, हम देखेंगे !


शुक्रवार, जून 5

मन और दुनिया

मन और दुनिया 

दुनिया वही है 
पर हर पल नयी है 
मन वही है 
पर चेतना नयी है 
क्षण-क्षण कुछ बढ़ती हुई 
मन अहंकार पर पलता है 
कंस और रावण की तरह आज भी जलता है 
दुनिया आज भी अन्याय, अशिक्षा, 
भय और गरीबी से जूझ रही है 
साथ ही हर पल पुराना कुछ झरता 
और नवीन उभर आता है 
जो जानता है वह द्रष्टा 
कभी पुराना नहीं होता 
वह कुछ भी नहीं है 
जो हो तो घटे या बढ़े 
मन हिसाब लगाता है
आत्मा आप्तकाम है 
वह भी ‘न होना’ जानती है 
सो सदा सन्तुष्ट है 
दुनिया आनी-जानी है  
पर बड़ी मानी है 
जो कहीं जाये न आये 
वह अनामी है ! 

शनिवार, मार्च 9

सत्यमेव जयते


सत्यमेव जयते


कहा जा रहा है
जो भी कहा जाना चाहिए
न ही छिपा है और न ही थमा है
हो रहा है विरोध
जो किया जाना चाहिए
हर जुल्म के खिलाफ खड़ा है कोई न कोई डटकर
जिसका गुलशन है नहीं रह सकता कभी वह बेखबर
सुन लेता है चींटी की आवाज भी जो
भर देता है वही शोले किसी कलम में
सुलगती ज्वालायें किन्हीं दिलों में
जो निगल जाएँगी हर अन्याय को
तुम बढ़ते रहो अपनी डगर पर
होकर निडर
और नहीं सोचो एक क्षण के लिए भी
कि इंसाफ की इस राह पर तुम अकेले हो
अस्तित्त्व का हर कण भी लड़ रहा है वही युद्ध
जो किसी सुदूर कोने में लड़ा जा रहा है
किसी बेबस माँ द्वारा अपने शिशु की रक्षा के लिए
अथवा किसी खेतिहर द्वारा जमीन की रक्षा हित
उठ रही हैं आवाजें हर कोने में
और नहीं दबाया जा सकता उन्हें
पहरे कितने ही संगीन हों और
दीवारें कितनी ही अजेय
झूठ कितने ही सजीले वेश धरें
सच की ही होगी विजय !

शुक्रवार, अप्रैल 21

नई कोंपलें जो फूटी हैं


नई कोंपलें जो फूटी हैं

कोकिल के स्वर सहज उठ रहे
जाने किस मस्ती में आलम,
मंद, सुगन्धित पवन डोलती
आने वाला किसका बालम !

गुपचुप-गुपचुप बात चल रही
कुसुमों ने कुछ रंग उड़ेले,
स्वर्ग कहाता था जो भू पर
उसी भूमि पर नफरत डोले ?

कैसा विषम काल आया है
लहू बहाते हैं अपनों का,
जिनसे अम्बर छू सकते थे
कत्ल कर रहे उन स्वप्नों का !

महादेव की धरती रंजित
कब तक यह अन्याय सहेगी,
बंद करें यह राग द्वेष का
सहज नेह की धार बहेगी !

भूल हो चुकी इतिहासों में
कब तक सजा मिलेगी उसकी,
नई कोंपलें जो फूटी हैं
क्यों रोकें हम राहें उनकी !

काश्मीर है अपना गौरव
हर भारतवासी मिल गाये,
एक बार फिर झेलम झूमे
केसर बाग़ हँसे, मुस्काए !


शुक्रवार, जुलाई 19

यह कैसी विरासत

यह कैसी विरासत


बच्चा प्रेम से भरा आता है जग में
कोमल भावनाओं से ओत-प्रोत
अक्सर दबा ही रह जाता है
भीतर प्रेम का बीज
जिसे सींचना था स्नेहिल स्पर्श से
झोंक दिया जीता है प्रतिस्पर्धा की आग में
उसे जल्दी ही....
कभी खा जाती है अभावों की आग
कभी अन्याय और असामनता का जहर
मिला दिया जाता है
उसके भोजन और पानी में
मारो, काटो की भाषा सिखाई जाती है
 मारो कीटों को
काटो जंगलों को, जानवरों को
नहीं सिखाते भाषा सह-अस्तित्व की
नहीं पढ़ाते
सहयोग की रीति और सुनीति
प्रकृति से दूर होते ही
आदमी जैसे बदल जाता है
और अपनी ही संतति को
विरासत में मृत्यु दिए जाता है...  

शुक्रवार, मार्च 9

हम जा कहाँ रहे हैं...


हम जा कहाँ रहे हैं...

कांगो में हुआ भीषण विस्फोट
एक नन्हें बच्चे को दिया अमानवीय दंड
कांप जाता है समाचार पढ़ के मन
ईरान चाहता है बम बनाना
चीन सैन्य शक्ति को बढाना
कहाँ गयी है मानवी बुद्धि
और क्षमता विवेक की
किसके खिलाफ युद्ध छेड़ा है हमने
हम जा कहाँ रहे हैं...

टीवी का स्विच बंद कर देती हूँ
पलट देती हूँ अखबार को उल्टा
पर हत्या और हिंसा की घटनाएँ तो कम नहीं होतीं
पूर्व अधिकारी के यहाँ मिलते हैं करोडों
 दूर के रिश्तेदारों के नाम जब फ़्लैट लिखा जाता है  
तब ठंड में ठिठुर कर मर जाता है
कोई बच्चा, बेघर ठंडी सड़क पर
सर्दियों की रात में.....
जब सेना की साज-सज्जा में धन लुटाया जा रहा है
गरीब, बेरोजगार किसान आत्महत्या करने पर विवश हैं
क्यों है इतनी विषमता
इतना अन्याय
समझ नहीं पाता मन
किशोरों के हाथों तक पहुँच गये हैं हथियार
और गिलास जिसमें भरा है जहर नशे का
जो हाथ मंदिर की घंटियाँ बजाने को उठा करते थे
आज भटक गए हैं...
परिवर्तन की यह आंधी कहाँ ले जाएगी
हमें... हम जा कहाँ रहे हैं...

हर संवेदन शील मन की यह चिंता है
और बेबुनियाद तो नहीं है न यह चिंता..?