शरद पूर्णिमा हर जीवन में
एक दशहरा ऐसा भी हो
जल जाए हर कलुष हृदय से,
अहंकार का मुकुट गिरे फिर
भूमि पर श्री राम के शर से !
राम आत्मा का शासन हो
धी सीता घर वापस आये,
सजग चेतना ज्योति बने फिर
दीवाली सा उर सज जाए !
मृत हो सारी पूर्व धारणा
पूर्वाग्रही कुंभकर्ण हत,
अंधानुकरण हर विस्मृत हो
नित्य नवीन चेतना जागृत !
गिरें खंडहर हर विकार के
प्रलय बरसे नूतन सृष्टि हित,
आसक्ति मोह डोर तोड़कर
उड़े गगन में मानव का चित !
क्रांति घटे हर घर आँगन में
भय के बादल छँटे गगन से,
नीरव विमल व्योम का दर्शन
शरद पूर्णिमा हर जीवन में !
