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गुरुवार, नवंबर 12

लो फिर आयी विमल दीवाली

 लो फिर आयी विमल दीवाली 

जगमग दीप जले पंक्ति में 

बन्दनवार लगे हर द्वारे 

सजी दिवाली महके जन पथ 

तोरण सजे गली चौबारे 

उठी सुगन्ध गुजिया, मोदक की 

वस्त्र नए देहों पर सरसर

लगी झालरें जली बत्तियां 

थाल सजे पूजा के मनहर 

सजे विनयाक, धान्य लक्ष्मी 

राग जगाती सुख बरसाती 

लो फिर आयी विमल दीवाली 

स्वच्छ हुए सबके घर आंगन 

भर उमंग से चहके सब मन 

कोमल भाव भरे अंतर में 

निकले बाल, युवा, सजधज कर 

नहीं अभाव सताता कोई 

देने का संकल्प जगा है 

दूर हुआ अँधियारा सारा 

रससिक्त हर भाव पगा है 

सुख की लहर उठी सागर में 

पावन पवन देवता बहते

दिग-दिगन्त में करुणा बसती

सूर्यदेव भी सुखमय लगते 

ऋतु मोहक माह शरद कार्तिक 

हरा रोग आरोग्य सफल है 

भारत भू का पर्व अनोखा 

ज्योतिपर्व यह अति मंगल है !


शुक्रवार, अक्टूबर 30

शरद पूर्णिमा हर जीवन में

शरद पूर्णिमा हर जीवन में

एक दशहरा ऐसा भी हो

जल जाए हर कलुष हृदय से,

अहंकार का मुकुट गिरे फिर

भूमि पर श्री राम के शर से !


राम आत्मा का शासन हो

धी सीता घर वापस आये,

सजग चेतना ज्योति बने फिर

दीवाली सा उर सज जाए !


मृत हो सारी पूर्व धारणा

पूर्वाग्रही कुंभकर्ण हत,

अंधानुकरण हर विस्मृत हो

नित्य नवीन चेतना जागृत !


गिरें खंडहर हर विकार के

प्रलय बरसे नूतन सृष्टि हित,

आसक्ति मोह डोर तोड़कर

उड़े गगन में मानव का चित !


क्रांति घटे हर घर आँगन में

भय के बादल  छँटे गगन से,

नीरव विमल व्योम का दर्शन

शरद पूर्णिमा हर जीवन में !


मंगलवार, अक्टूबर 30

जगमग दीप दीवाली के


जगमग दीप दीवाली के


कुछ कह जाते
 कुछ दे जाते
सरस पावनी
ज्योति बहाते
जगमग दीप दीवाली के !

संदेसा गर
कोई सुन ले
कही-अनकही
भाषा पढ़ ले
शीतल मधुरिम 
अजिर उजाला
कोने-कोने
में भर जाते
जगमग दीप दीवाली के !

पंक्ति बद्ध
सचेत प्रहरी से
तिमिर अमावस
का हर लेते
खुद मिट कर
उजास बरसाते
रह अकम्प
थिरता भर जाते
जगमग दीप दीवाली के !

सोमवार, अक्टूबर 20

पर्वों का मेला दीवाली

पर्वों का मेला दीवाली



याद दिलाने सिया-राम की
भरने उर में रस उजास का,
जगमग करता घर चौराहे
आया उत्सव फिर प्रकाश का !

दीपों की ये दीर्घ कतारें
गगन उतर आया ज्यों भू पर,
तमस मिटाने अंतरतम् का
आया है दीपों का उत्सव !

कोना-कोना अपने घर का
स्वच्छ करें, चमचम चमकाते ,
रंगोली, तोरण, ध्वज, लड़ियाँ
भर उर में उल्लास सजाते  !

अंधकार में लख प्रकाश को
लक्ष्मी भूलोक पर आतीं,
देख उजाला जगमग राहें
यहीं अटक कर वह रह जातीं !  

धनतेरस दो दिन पहले है
पर्वों का मेला दीवाली,
एक आस्था युगों-युगों से
बन इक धारा बहती आती !

नरकासुर का अंत हुआ था  
नरसिंह रूप धरा विष्णु ने,
धनवंतरि भी जन्मे इस दिन
लक्ष्मी प्रकटी थीं सागर से !

एक दीप तुलसी के चौरे
याद उसी की कर रख आते,
मीलों तक वैभव हो शोभित,
द्वारे द्वारे दीप जलाते !

यम पूजा छोटी दीवाली
खील, बताशे, खाँड, मिठाई,
गुंजित होता नभ शुभ स्वर से
पूजित हों गणपति, लक्ष्मी !

काली थी जो रात अमावस
पूनम से भी ज्यादा रोशन,
याद कृष्ण की हमें दिलाये
अगले दिन पूजित गोवर्धन !

भाईदूज चला आता फिर
स्नेह बढ़ाता सहोदरों में
अंधकार की हुई पराजय
छा जाती उमंग हर दिल में !  





बुधवार, अक्टूबर 12

एक बार दीवाली ऐसी


एक बार दीवाली ऐसी


बाहर दीप जलाये अनगिन
भीतर रही अमावस काली,
ज्योति पर्व मने कुछ ऐसा
मन अंतर छाये उजियाली !

तन का पोर-पोर उजला हो
फूट-फूट कर बहे ऊर्जा,
सुगठित, स्वच्छ, स्वस्थ देह में
दीप जले इक नव उमंग का !

प्राण में न कम्पन होता हो
सधा, सहज वह आये जाए,
श्वासों की सुंदर माला से
हृदय गुफा में देव रिझाएँ !

मन प्रांगण को भाव से लीपें
तृप्ति का अमृत जल छिडकें,
सत्य शिला पर शिव बैठे हों
सुंदर गीत रचें भक्ति के !

प्रज्ञा की इक बेल उगी हो
शील, समाधि के फल आयें,
भीतर इक उजास बिखरी हो
वाणी में भी जो छलकाए !

तब बिखरेगी हँसी फुलझड़ी
आनंद का अनार फूटेगा,
मुस्कानों के दीप जलेंगे
झर-झर कर आलोक बहेगा !

सिहर-सिहर जायेगी कालिमा
तमस रात्रि उजियारी होगी,
प्रेम सुरभि महका कर शोभित
ज्योति की फुलवारी होगी !

नयनों से फूटेंगी किरणें
अधरों से इक खनक नशीली,
मन से प्रेम प्रकाश बहेगा
वाणी से इक दुआ रसीली !

दीवाली का अर्थ यही है
मन का तमस विदा हो जाये,
तृष्णा कीट जलें अग्नि में
अंतर से अकुलाहट जाये !

पंचकोश पावन हों भीतर
नव द्वार फिर आलोकित हों,
दशम द्वार से परिचय पालें
उस पाहुन का स्वागत हो !

एक बार दीवाली ऐसी
जगमग जग अपना कर देगी,
सदा-सदा को मन मंदिर में
ज्योतिर्मय सपना भर देगी !