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शुक्रवार, अप्रैल 27

नहीं, अब और नहीं


नहीं, अब और नहीं

अब त्रिशंकु नहीं रहेंगे हम
अधर में लटके
बीसवीं मंजिल पर.
बंद कमरों में कैद
हम जायेंगे जमीन पर
धरा की गोद में एक आशियाना बनाएंगे....

चाँदनी रातों को सोयेंगे
खुले गगन के नीचे
अमावस को ओढ़ेंगे तारों की चादर

नहीं, हमें नहीं खोलना डरते हुए द्वार
अतिथि के लिये
द्वार की आँख से झांक कर
हम घर के बाहर चबूतरे पर खुले में बतियाएंगे...

धूप को नहीं तरसेंगे
छोटी सी बालकनी में
अपने आंगन में धान सुखायेंगे

नींबू, अमरुद और बेर की झाडियों पर
जब पकेंगे फल, उनकी
मदमस्त गंध में डूबेंगे उतरायेंगे
गिलहरियों की आंखमिचौली देखते  
हमारे दिन संझियारे हो जायेंगे

नहीं हमें नहीं रहना
नकाब पहने, धूल और धुएं से घिरे
नहीं ठूंसना हमें अँगुलियों को कानों में
कर्णभेदी शोर को सुन के
हम तो कोयल के साथ आल्हा गुनगुनायेंगे

पालीथीन बैग में लाए नहीं
घर की फुलवारी से तोड़
चढ़ाएंगे मंदिर में फूल

डालेंगे पेड़ की सबसे ऊँची डाल पर झूला
और सँग हवा के
आकाश तक हो आयेगे

कच्चे फर्श पर जब बरसात में
चला आयेगा कोई केंचुआ
सांप कहकर दादी को डराएंगे

नहीं खाना हमें डब्बा बंद खाना
हम रोज ताजा ही बनाएंगे

जमीन से आती खुशबू को समेटे
दिन दोपहरी चटाई पर ही सो जायेंगे
नहीं बनना हमें त्रिशंकु
हम धरती पर ही भले..