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मंगलवार, जुलाई 28

घर-बाहर

घर-बाहर 

तुम्हारे भीतर जो भी शुभ है 
वह तुम हो 
और जो भी अनचाहा है 
मार्ग की धूल है 
सफर लंबा है 
चलते-चलते लग गए हैं 
कंटक  भी कुछ वस्त्रों पर 
 मटमैले से हो गए हैं 
पर वे सब बाहर-बाहर हैं 
धुल जायेंगे 
एक बार जब पहुंचे जाओगे घर !

मार्ग में दलदल भी थे लोभ के 
थोड़ा सा कीचड़ लगा है पैरों पर 
गुजरना पड़ा होगा कभी जंगल की आग से भी 
धुआँ और कालिख चिपक गयी होगी 
कभी राग के फल चखे होंगे 
मधुर जिनका रस-रंग भी टपक गया है 
कभी द्वेष की आंच में तपा होगा उर 
सब कुछ बाहर ही उतार देना 
घर में प्रवेश करने से पूर्व !

घर में शीतल जल है 
प्रक्षालन के लिए
तुम्हारा जो भी शुभ है स्वच्छ है 
नजर आएगा तभी 
मिट जाएगी सफर की थकान 
और पाओगे सहज विश्राम 
घर बुलाता है सभी को 
पर जो छोड़ नहीं पाते मोह रस्तों का 
भटकते रहते हैं 
अपने ही शुभ से अपरिचित 
 वे कुछ खोजते रहते हैं !

शुक्रवार, अक्टूबर 4

जब कभी भारी हो मन


जब कभी भारी हो मन

जब कभी भारी हो मन
लगे, न जाने कैसा बोझ रखा है मन पर
कारण कुछ भी हो....तब यही सोचना होगा
शायद पूर्व के संस्कार जागृत हुए हैं
या कोई कर्म अपना फल देने को उत्सुक है
अथवा तो बोये थे जो बीज अतीत में.. वे अंकुरित हो रहे हैं  
जब जीवन कुछ सवाल लेकर सम्मुख खड़ा हो
हल्का था जो मन भारी बड़ा हो
शिरायें तन गयी हों मस्तिष्क की
आघात कर रहा हो हृदय पर कोई
हो कंधों में तनाव और उत्साह की कमी
चाहिए जब एक विश्राम गहरा... एक नींद सुकून भरी !
एक मस्ती भीतर... एक शांति अचाह भरी !
पर सिर्फ चाहने भर से कहाँ कुछ होता है ?
उसके लिए सतत प्रयासरत रहना पड़ता है
जो हो रहा है उसे पूरे मन से स्वीकारना होता है
या फिर छोड़ देना है सब कुछ अनाम के चरणों में
हर नकारात्मक विचार एक नये दु:स्वप्न की तैयारी है
पर इन सबको देखने वाला साक्षी तो वैसा का वैसा है
यह सब कुछ घट रहा है उसकी ऊर्जा से ही
जो कभी खत्म होने में नहीं आती... वह ऊर्जा अनंत है
युगों-युगों से काँप रहे हैं अर्जुनों के गांडीव
पर कृष्ण अचल... निर्द्वन्द्व है !

सोमवार, अक्टूबर 9

लीला एक अनोखी चलती



लीला एक अनोखी चलती 


सारा कच्चा माल पड़ा है वहाँ
अस्तित्त्व के गर्भ में....
जो जैसा चाहे निर्माण करे निज जीवन का !

महाभारत का युद्ध पहले ही लड़ा जा चुका है
अब हमारी बारी है...
वहाँ सब कुछ है !
थमा दिये जाते हैं जैसे खिलाडियों को
उपकरण खेल से पूर्व
अब अच्छा या बुरा खेलना निर्भर है उन पर !

वहाँ शब्द हैं अनंत
जिनसे रची जा सकती हैं कवितायें
या लड़े जा सकते हैं युद्ध,

वहाँ बीज हैं
रुप ले सकते हैं जो मोहक फूलों का
 बदल सकते हैं मीठे फलों में
परिणित किया जा सकता है जिन्हें उपवन में
या यूँ ही छोड़ दिया जा सकता है
सड़ने को !

उस महासागर में मोती पड़े हैं
जिन्हें पिरोया जा सकता है
मुक्त माल में
अनजाने में की गयी हमारी कामनाओं की
पूर्ति भी होती है वहाँ से
हम ही चुन लेते हैं कंटक....
जानता ही नहीं जो, उसे जाना कहाँ है
अस्तित्त्व कैसे ले जायेगा उसे और कहाँ ?
जो जानता ही नहीं खेल के नियम
वह खेल में शामिल नहीं हो पायेगा
लीला चल रही है दिन-रात
उसके और उसके अपनों के मध्य

हमारे तन पहले ही मारे जा चुके हैं
आत्माएं अमर हैं नये-नये कलेवर धर.... 

शनिवार, मार्च 1

वर्षा को भी मची है जल्दी

वर्षा को भी मची है जल्दी


टिप-टिप बूंदें दूर गगन से
ले आतीं संदेश प्रीत के,
धरा हुलसती हरियाली पा
खिल हँसती ज्यों बोल गीत के !

शिशिर अभी तो गया नहीं है
 रुत वसंत आने को है,
मेघों का क्या काम अभी से
 फागुन माह चढ़ा भर है !

वर्षा को भी मची है जल्दी
उधर फूल खिलने को आतुर,
मोर शीत में खड़े कांपते
 अभी नहीं जगे हैं दादुर !

मानव का ही आमन्त्रण है
उथल-पथल जो मची गगन में,
बेमौसम ही शाक उगाता
बिन मौसम फल-फूल चमन में !


शुक्रवार, अप्रैल 27

नहीं, अब और नहीं


नहीं, अब और नहीं

अब त्रिशंकु नहीं रहेंगे हम
अधर में लटके
बीसवीं मंजिल पर.
बंद कमरों में कैद
हम जायेंगे जमीन पर
धरा की गोद में एक आशियाना बनाएंगे....

चाँदनी रातों को सोयेंगे
खुले गगन के नीचे
अमावस को ओढ़ेंगे तारों की चादर

नहीं, हमें नहीं खोलना डरते हुए द्वार
अतिथि के लिये
द्वार की आँख से झांक कर
हम घर के बाहर चबूतरे पर खुले में बतियाएंगे...

धूप को नहीं तरसेंगे
छोटी सी बालकनी में
अपने आंगन में धान सुखायेंगे

नींबू, अमरुद और बेर की झाडियों पर
जब पकेंगे फल, उनकी
मदमस्त गंध में डूबेंगे उतरायेंगे
गिलहरियों की आंखमिचौली देखते  
हमारे दिन संझियारे हो जायेंगे

नहीं हमें नहीं रहना
नकाब पहने, धूल और धुएं से घिरे
नहीं ठूंसना हमें अँगुलियों को कानों में
कर्णभेदी शोर को सुन के
हम तो कोयल के साथ आल्हा गुनगुनायेंगे

पालीथीन बैग में लाए नहीं
घर की फुलवारी से तोड़
चढ़ाएंगे मंदिर में फूल

डालेंगे पेड़ की सबसे ऊँची डाल पर झूला
और सँग हवा के
आकाश तक हो आयेगे

कच्चे फर्श पर जब बरसात में
चला आयेगा कोई केंचुआ
सांप कहकर दादी को डराएंगे

नहीं खाना हमें डब्बा बंद खाना
हम रोज ताजा ही बनाएंगे

जमीन से आती खुशबू को समेटे
दिन दोपहरी चटाई पर ही सो जायेंगे
नहीं बनना हमें त्रिशंकु
हम धरती पर ही भले..