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बुधवार, नवंबर 5

चाह जब जागे मिलन की

चाह जब जागे मिलन की 


निज आत्म में जागना है 

न कि जगत से भागना है, 

मिला बाहर, वही भीतर 

नहीं अब कुछ माँगना है !


भाव अपना शुद्ध हो जब 

प्रेम रस भीतर रिसेगा, 

मधुर प्रकाश ज्योत्सना का 

सहज उर से छन बहेगा !


श्रद्धा की भूमि ह्रदय में 

पुष्प कोमल भावना के, 

चाह जब जागे मिलन की 

भाव हों आराधना के !


वह अदेखा, वह अजाना 

निकट से भी निकट लगता, 

सुरभि सुमिरन की अनोखी 

पोर-पोर प्रमुदित होता ! 


माँग जो भी, वह मिला है  

तुझसे न कोई गिला है, 

कभी कुम्हलाया न अंतर 

जिस घड़ी से यह खिला है !


बुधवार, मार्च 5

हमको हमसे मिलाये जाता है


 हमको हमसे मिलाये जाता है 

हर शुबहे को गिराए जाता है 

वह हर इक पल उठाये जाता है 


खुदी को सौंप कर जिस घड़ी देखा 

वह ख़ुद जैसा बनाये जाता है 


न दूरी न कोई भेद है उससे 

 हमको हमसे मिलाये जाता है 


 चाह जब घेरने लगती हृदय को 

 भँवर से दूर छुड़ाए जाता है 


घेरा हवा औ' धूप की मानिंद

ज्यों आँचल में छुपाये जाता है 


 हो रहो उसके महफ़ूज़ रहोगे 

 सबक़ यह रोज़ सिखाये जाता है  


मंगलवार, फ़रवरी 18

चाह

चाह


स्वयं को केंद्र मानकर

दूसरे को चाहना 

पहली मंजिल है

जो हर कोई पा लेता है 

दूसरे को केंद्र मानकर

स्वयं को समर्पित कर देना 

दूसरी मंज़िल है 

जिसकी तलाश पूरी होने में

 समय लगता है 

न स्वयं, न दूसरे को 

अस्तित्त्व को केंद्र मान

मुक्त हो जाना है

अंतिम सोपान 

खुद से पार चला जाये जब कोई

तब सिद्ध होता है अभिप्राय

काश ! सबके जीवन में

जल्दी ही ऐसा दिन आए !



शुक्रवार, जुलाई 12

चाह

चाह 



वह तैरना चाहती है नीले स्वच्छ जल में 

मीन की भाँति 

(पर जल अब विमल शेष ही कहाँ है ?)


वह दौड़ाना चाहती है सर्राटे से 

कार भीड़ भरी सड़कों से निकालते हुए 

या खुले वाहन विहीन मार्गों पर 

(पर ऐसे रास्ते बचे कहाँ है और प्रदूषण बढ़ाने का उसे क्या हक़ है ? )


वह लिखना चाहती है कई बेस्ट सेलर पुस्तकें 

प्रसिद्ध लेखकों की तरह 

( ज्ञान तो पहले से ही बहुत है, उस पर चलना भर  शेष है, फिर 

अहंकार को मोरपंख लगाने से तो मार्ग और लंबा हो जाएगा )


वह बोलना चाहती है फ़र्राटे से कन्नड़, अंग्रेज़ी और कई भाषाएँ 

( पर मौन और मुस्कान की भाषा लोग भूल गये हैं )


वह चित्र बनाना चाहती है 

चटख, चमकीले रंगों से 

( पर आकाश और धरती रंगे जा रहा है कोई अदृश्य कलाकार प्रतिपल) 


वह जो है, जहां है, जैसी है 

वैसी ही जीना चाहती है 

अपने आप में तृप्त 

(आत्मा का साम्राज्य वहाँ है !)


मंगलवार, नवंबर 8

चाह या अनुभव

चाह या अनुभव 

चाह यानी इच्छा

या कामना !

मोहित कर लेती है आत्मा को 

जुट जाती है जो

उसे पूर्ण करने के प्रयास में !

हाथ लगता है एक और अनुभव 

और हर अनुभव

कुछ न कुछ सिखाता है 

कुछ रंग भरता  

कुछ जोड़ता  

कुछ तोड़ता भी है 

हर अनुभव एक कदम

आगे ले जाता है 

एवरेस्ट चढ़ने की चाह भी तो चाह है !

और पड़ोस की दुकान से

भीषण गर्मी में बर्फ

ख़रीद कर लाना भी 

जीवन अनुभवों की

एक दीर्घ शृंखला ही तो है 

जो जितने निर्दोष होते जाएँगे 

आत्मा का द्वार खुलने लगेगा 

उसको पाने की चाह में 

फिर सिमट जाएँगी सब चाहें 

केवल एक वही शेष रह जाएगी !


गुरुवार, जून 16

भेद - अभेद

भेद - अभेद 

यह चाह कि कोई देखे 

फूल को खिलने नहीं देगी 

वह तो अच्छा है कि 

किसी फूल को यह चाह नहीं होती 

बड़ा फ़ासला है तेरे मेरे बीच 

इसी चाह के कारण 

वरना यह मुहब्बत कब की 

परवान चढ़ गयी होती 

पलकें उठा के देखते हैं वह 

 नज़रें किसी की टिकी हैं या नहीं 

अपनी सीरत पे यक़ीन नहीं आता 

हसीनों को भी 

ज़िंदगी जैसी भी है 

खूबसूरत है 

लाइक्स की चाह ने इसे 

क्या से क्या न बना दिया 

देखने वाला भी वही

 देखा गया भी वही 

क्यों भेद की दीवार कोई 

बीच में  उठा गया !


गुरुवार, सितंबर 16

चाह और प्रेम


चाह 


हर चाह नश्वर की होती है 

शाश्वत को नहीं चाहा जा सकता  

वह आधार है चाहने वाले का 

हर याचक आकाश से उपजा है 

और पृथ्वी की याचना करता है 

पृथ्वियां बनती-बिगड़ती हैं 

आकाश सदा एक सा है 

याचक नहीं जानता खुद का स्रोत 

वह अंधकार में टटोलता है 

प्रकाश का नहीं उसे बोध 

पृथ्वी घूम रही है 

इसका भी नहीं प्रबोध ! ​​


प्रेम 


प्रेम की डोर 

जो हमें बांधती है 

एक दूजे से 

टूटने न पाए 

यही आधार है 

प्रेम पंख देता है 

उड़ने को तो सारा आकाश है 

विश्वास की आंच में 

इसे पकना होता है 

और समर्पण की छाँव में 

पलना होता है 

प्रेम की डोर बांधे रहे परिवार 

समाज और राष्ट्रों को 

तभी जीवन का फूल महकता है !

शनिवार, जुलाई 3

दिल को अपने क्यों नहीं राधा करें

दिल को अपने क्यों नहीं राधा करें


जिंदगी ने नेमतें दी हैं हजारों 

आज उसका शुक्रिया दिल से करें, 

चंद लम्हे ही सदा हैं पास अपने 

क्यों न इनसे गीत खुशियों के झरें !


दिल खुदा का आशियाना है सदा से 

ठहर उसमें दर्द हर रुखसत करें, 

आसमां हो छत धरा आंगन बने 

इस तरह जीने का भी जज्बा भरें !


वह बरसता हर घड़ी जब प्रीत बन 

मन को अपने क्यों नहीं राधा करें, 

दूर जाना भी, बुलाना भी नहीं 

दिल के भीतर साँवरे नर्तन करें !


झुक गया यह सिर जहाँ भी सजदे में 

वह वही है, क्यों उसे ढूंढा  करें, 

मांगना है जो भी उससे माँग लें 

मांगने में भी भला क्यों दिल डरें !


उर खिलेगा जब उठेगी चाह उसकी 

फूल बगिया में अनेकों नित खिलें, 

शब्द का क्या काम जब दिल हो खुला 

भाव उड़के सुरभि सम महका करें !

 

शुक्रवार, सितंबर 25

भोर में कोई जगाये

 भोर में कोई जगाये 

चैन नींदों में समाए 

स्वर्ग स्वप्नों में दिखाए,

भोर में कोई जगाये 

बस यही तुम मांग लेना ! 


बैन में मधुरा भरी हो 

नैन सूरत साँवरी हो, 

जगत की पीड़ा हरी हो 

बस यही आशीष लेना !


पग कभी रुकने न पाएँ

हाथ अनथक श्रम उठायें, 

अधर पल-पल मुस्कुराएं 

बस यही वरदान लेना !


रिक्त हो उर चाह से अब

सिक्त हो रस रास से जब,  

पूर्णता का भास हो तब 

बस यही सुख जान लेना !


श्वासों में भी कंप न हो 

देह-हृदय में द्वंद्व न हो, 

सुरताली स्वच्छंद न हो 

बस यही संकल्प लेना ! 


मंगलवार, जुलाई 7

जिंदगी खुद राज अपने

जिंदगी खुद राज अपने 

व्यर्थ जो भी छूट जाये 
सार्थक हृदय को लुभाये, 
जिंदगी खुद राज अपने 
खोल मंजिल पर बिठाये !

बस यही इक प्रार्थना हो
मौन गीतों में गुजाएँ, 
चाह का हर बीज जलकर 
रिक्त हो मन गुनगुनाये !

जो तुम्हारी कामना हो 
हाथ से वह कर्म हो अब, 
जो नचाता था अभी तक 
हुक्म मन तेरा बजाए !

विमल गंगा बन बहा है 
ज्ञान गीता का कहा है, 
धर्म तुझसे पल रहा है 
सत्य का यह ध्वज बताये !

शुक्रवार, मई 29

चाह -अचाह

चाह -अचाह 

‘वह’ क्या चाहता है 
‘वह’ चाहता भी है क्या ?
जब तक चाह शेष है भीतर 
तब तक ‘वह’ है नहीं 
‘वह’ सन्तुष्ट है अपने होने मात्र से 
जैसे कोई फूल क्या चाहता है 
वह बस होता है 
शेष सब घटता है उसके आसपास 
न भी घटे तो होता नहीं उसकी तरफ से 
थोड़ा सा भी प्रयास 
लोग ठिठकते हैं पल भर को उसे निहार 
भँवरे गीत सुनाते हैं
तितलियाँ तृप्त होती हैं पराग से 
वह किसी घड़ी चुपचाप झर जाता है !

गुरुवार, मई 21

वह अनंत पथ खुद से जाता

वह अनंत पथ खुद से जाता 


उस अनन्त पथ के हो राही
बाधाओं से क्या घबराना, 
जन्मों की जो चाह रही है 
उसे थाम कर बढ़ते जाना !

गह्वर भी हैं सँकरे रस्ते 
भय के बादल घोर अँधेरे,
कर्मों की जंजीर पड़ी है 
अपना ही मन देगा धोखे !

किन्तु नहीं पल भर को इनकी 
व्यर्थ व्यथा में जकड़ो खुद को, 
एक उसी की लगन लगी हो
बल देंगी राहें कदमों को !   

प्रतिपल नीलगगन से आतीं 
लहरें सिंचित करतीं मन को, 
नीचे धरती माँ सी थामे 
दृष्टि टिकी हो मात्र लक्ष्य पर !

भाव जगें पल-पल शुभता के 
उनकी आभा में लिपटा तन,  
वह अनंत पथ खुद से जाता 
क्यों संशय में सिमटा है मन !

शुक्रवार, मार्च 6

चाह-अचाह


चाह-अचाह

हर चाह रिझाती है पहले 
फिर वही भगाती है 
मन-सागर में लहरों की 
एक पंक्ति जगाती है 
मन के सूने पनघट पर ही 
उसके आने की सम्भावना है 
भीड़ में मिलन असंभव है 
जब तक अटका है एक तार भी चाहत का 
उसकी बांसुरी की धुन अनसुनी रह जाती है 
जो बज रही है अहर्निश 
उसकी याद में बहाया हर अश्रु 
पोंछ डालता है मन के रस्तों पर 
पड़ी धूल के कणों को 
जो हर चाह लिए आती है अपने संग 
अनन्त प्रतीक्षा करने का साहस है जिसमें 
भीतर लौट गयी मन की उस धारा(राधा)को ही 
कृष्ण मिला करते हैं 
कान जब कुछ और सुनना न चाहें 
पलकें मुंद जाएँ निहार  अपना ही रूप 
रिक्त हुआ ठहर जाये 
ऐसे ही किसी क्षण में 
उसकी झलक आये ! 

शनिवार, जून 29

मन बेचारा




मन बेचारा


तोड़ डाला महज खुद को
चाह जागी जिस घड़ी थी,
पूर्ण ही था भला आखिर
कौन सी ऐसी कमी थी !

बह गयी सारी सिखावन
चाह की उन आँधियों में,
खुदबखुद ही कदम जैसे
बढ़ चले उन वादियों में !

एक झूठी सी ख़ुशी पा
स्वयं को आजाद माना,
चल रहा चाह से बंधा
राज यह मन ने न जाना !

स्वयं ही उलझन रचाता
स्वयं रस्ता खोजता था,
दिल ही दिल फिर फतेह की
गलतफहमी पालता था !

उसी रस्ते पे न जाने
लौट कितनी बार आया, 
जा रहा है स्वर्ग खुद को
नित नया सपना दिखाया !